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अजनबी पड़ोसन की चु@@ई

अजनबी पड़ोसन की चु@@ई—>समीर ने अभी दो दिन पहले ही इस नए शहर के पॉश इलाके में एक छोटा सा फ्लैट किराए पर लिया था। वह पेशे से एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर था और अपनी नौकरी की वजह से यहाँ शिफ्ट हुआ था। उसके फ्लैट के ठीक सामने वाले दरवाजे पर एक नेमप्लेट लगी थी जिस पर ‘निशा’ लिखा था। निशा एक बहुत ही आकर्षक और शालीन महिला थी जिसकी उम्र लगभग तैंतीस साल रही होगी। समीर ने उसे पहली बार तब देखा जब वह अपनी बालकनी में खड़ी होकर पौधों को पानी दे रही थी। उसने एक सफेद रंग की पारदर्शी साड़ी पहनी थी जिसने उसके बदन के हर उतार-चढ़ाव को बखूबी बयां कर रखा था। समीर की नजरें उसके उन भारी और रसीले तरबूजों पर जाकर टिक गईं जो ब्लाउज के अंदर कैद होने के लिए छटपटा रहे थे। उन तरबूजों का आकार इतना मुकम्मल था कि समीर का मन किया कि बस एक बार उन्हें छूकर देख ले कि वे कितने नरम होंगे। निशा ने जैसे ही समीर की तरफ देखा, उसने एक हल्की सी मुस्कान दी जिसने समीर के दिल की धड़कनें तेज कर दीं।

निशा का शरीर किसी अनुभवी मूर्तिकार की कलाकृति जैसा था। उसकी कमर पतली थी लेकिन उसके नीचे का हिस्सा यानी उसका पिछवाड़ा काफी चौड़ा और मांसल था जो चलते समय एक अजीब सी लय में डोलता था। समीर जब भी उसे देखता, उसके मन में अजीब सी हलचल होने लगती थी। निशा के चेहरे पर एक गजब की कशिश थी और उसकी आँखों में एक ऐसी गहराई थी जिसमें कोई भी डूब सकता था। उसके तरबूजों के ऊपर छोटे-छोटे मटर जैसे दाने साड़ी के पतले कपड़े के ऊपर से भी अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे। समीर ने महसूस किया कि निशा भी उसे उतनी ही शिद्दत से देख रही थी। दोनों के बीच शब्दों का आदान-प्रदान कम था लेकिन आँखों ही आँखों में एक मूक संवाद शुरू हो चुका था। समीर अक्सर अपनी खिड़की से उसे देखता रहता और कल्पना करता कि उस रेशमी त्वचा का अहसास कैसा होगा जब वह उसके करीब आएगा।

उस दिन शनिवार की शाम थी और अचानक पूरी बिल्डिंग की बिजली चली गई। समीर अपने कमरे में अकेला बैठा था तभी उसके दरवाजे पर दस्तक हुई। उसने दरवाजा खोला तो सामने निशा खड़ी थी, उसके हाथ में एक मोमबत्ती थी जिसकी मद्धम रोशनी उसके चेहरे को और भी कामुक बना रही थी। निशा ने कहा कि उसके फ्लैट का इन्वर्टर काम नहीं कर रहा है और उसे अंधेरे से डर लगता है। समीर ने उसे अंदर आने के लिए कहा और वह बिना किसी झिझक के अंदर आ गई। कमरे में हल्की रोशनी और बाहर हो रही हल्की बूंदाबांदी ने माहौल को बेहद रोमांटिक बना दिया था। निशा समीर के पास सोफे पर बैठ गई और उनके बीच बातों का सिलसिला शुरू हुआ। समीर ने महसूस किया कि निशा की सांसें थोड़ी तेज चल रही थीं और उसके जिस्म से आने वाली मोगरे की खुशबू उसे मदहोश कर रही थी। समीर ने धीरे से अपना हाथ निशा के हाथ पर रखा, निशा कांप उठी लेकिन उसने हाथ हटाया नहीं।

समीर ने महसूस किया कि निशा के हाथ ठंडे थे लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी गर्मी थी। समीर ने धीरे से अपनी उंगलियां निशा की मखमली बांहों पर फेरनी शुरू कीं। निशा ने एक गहरी आह भरी और अपनी आँखें बंद कर लीं। समीर अब उसके और करीब आ गया और अपनी नाक उसकी गर्दन के पास ले जाकर उसकी खुशबू को गहराई से महसूस करने लगा। निशा का पूरा बदन थरथरा रहा था। समीर ने धीरे से अपने होंठ निशा के कानों के पास ले जाकर फुसफुसाया कि वह कितनी खूबसूरत है। निशा ने मुड़कर समीर की आँखों में देखा और फिर खुद ही अपनी बाहें समीर के गले में डाल दीं। समीर ने बिना देर किए निशा के होंठों को अपने होंठों में भर लिया और उसके मुंह को मीठा करने लगा। यह एक ऐसा अहसास था जैसे दो प्यासी आत्माएं एक-दूसरे में समा जाने के लिए बेताब हों। समीर के हाथ अब निशा के उन भारी तरबूजों पर पहुँच चुके थे जिन्हें वह अपनी मुट्ठियों में भरकर धीरे-धीरे भींचने लगा।

निशा के मुंह से एक दबी हुई कराह निकली जब समीर ने उसके तरबूजों के ऊपर मौजूद मटर को अपनी उंगलियों से सहलाया। वह मटर अब पूरी तरह से सख्त हो चुके थे जो समीर की उत्तेजना को और बढ़ा रहे थे। समीर ने धीरे से निशा की साड़ी का पल्लू नीचे गिरा दिया और उसके ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोलने लगा। जैसे ही ब्लाउज खुला, निशा के सफेद और दूधिया तरबूज आज़ाद होकर समीर की आँखों के सामने आ गए। वे इतने बड़े और सुडौल थे कि समीर की हथेलियों में भी नहीं समा रहे थे। समीर ने अपना चेहरा उन तरबूजों के बीच फंसा दिया और उन्हें पागलों की तरह चूमने लगा। निशा ने समीर के सिर को अपने सीने से और जोर से सटा लिया। समीर ने अब अपनी जीभ से उन रसीले मटरों को सहलाया जिससे निशा का पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया। वह बार-बार समीर का नाम लेकर उसे और पास बुला रही थी।

समीर ने अब निशा को धीरे से बेड पर लेटा दिया और खुद उसके ऊपर आ गया। उसने निशा के नीचे के वस्त्रों को धीरे-धीरे उतारना शुरू किया। जैसे ही वह पूरी तरह निर्वस्त्र हुई, समीर की नजरें उसकी उस रहस्यमयी खाई पर पड़ीं जो काले घने बालों से ढकी हुई थी। वह खाई पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और वहां से एक मदहोश कर देने वाली गंध आ रही थी। समीर ने अपनी उंगलियां उस खाई के मुहाने पर रखीं और उसे सहलाने लगा। निशा ने अपनी कमर ऊपर उठा ली और जोर-जोर से सिसकारियां लेने लगी। समीर ने अब अपना सिर नीचे झुकाया और अपनी जीभ से उस खाई को चाटना शुरू किया। निशा का शरीर बेकाबू हो रहा था, उसने समीर के बालों को अपनी उंगलियों में जकड़ लिया और अपनी खाई को समीर के मुंह पर रगड़ने लगी। समीर उस खाई के रस को अमृत की तरह पी रहा था।

अब समीर की बारी थी, उसने अपने कपड़े उतारे और अपना लंबा और सख्त खीरा निशा के सामने पेश किया। निशा ने जैसे ही उस विशाल खीरे को देखा, उसकी आँखें फटी की फटी रह गई। उसने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और उस खीरे को पकड़ लिया। वह खीरा लोहे की रॉड की तरह सख्त और गर्म था। निशा ने अपना मुंह खोला और उस खीरे के अगले हिस्से को अपने मुंह में ले लिया। वह बड़ी ही कोमलता से उस खीरे को चूसने लगी जैसे कोई बच्चा लॉलीपॉप चूसता है। समीर की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा, उसे इतना सुख मिल रहा था कि वह खुद को रोक नहीं पा रहा था। उसने निशा के सिर को पकड़ा और अपने खीरे को उसके मुंह की गहराई तक ले जाने लगा। निशा की आंखों से आंसू निकलने लगे लेकिन वह रुकना नहीं चाहती थी, वह उस खीरे का पूरा आनंद लेना चाहती थी।

समीर ने अब निशा को सीधा लेटाया और उसके दोनों पैरों को अपने कंधों पर रख लिया। उसने अपने खीरे की नोक को निशा की उस गीली और तंग खाई के मुहाने पर रखा। निशा ने समीर की आँखों में देखा और धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, ‘प्लीज समीर, मुझे अपनी खुदाई से भर दो।’ समीर ने एक जोरदार धक्का लगाया और उसका आधा खीरा उस तंग खाई के अंदर समा गया। निशा के मुंह से एक तेज चीख निकली और उसने समीर की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए। वह खाई इतनी तंग थी कि समीर को अपना खीरा अंदर ले जाने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही थी। समीर ने धीरे-धीरे छोटे-छोटे धक्के लगाने शुरू किए ताकि निशा उस दर्द और आनंद के मिश्रण को महसूस कर सके। जैसे-जैसे वह खाई समीर के खीरे को रास्ता देने लगी, समीर की रफ्तार भी बढ़ती गई।

कमरे में अब सिर्फ थपथप की आवाजें गूँज रही थीं। समीर पूरी ताकत से निशा की खाई की खुदाई कर रहा था। हर धक्के के साथ समीर का खीरा गहराई तक जा रहा था और निशा के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे। निशा हर धक्के पर जोर से आहें भरती और समीर को और जोर से खोदने के लिए कहती। समीर ने अब निशा की पोजीशन बदली और उसे घुटनों के बल बैठाकर पीछे से खुदाई शुरू की। पिछवाड़े से देखते हुए वह नजारा और भी कामुक लग रहा था। समीर ने निशा के दोनों तरबूजों को पीछे से पकड़ लिया और पागलों की तरह उसे पीछे से खोदने लगा। निशा का पूरा शरीर पसीने से तरबतर था और वह बिस्तर की चादर को अपने हाथों में भींच रही थी। समीर की सांसें अब उखड़ने लगी थीं, वह अपने रस को निकलने से ज्यादा देर तक नहीं रोक सकता था।

समीर ने निशा को फिर से सीधा लेटाया और अपनी रफ्तार को चरम पर पहुँचा दिया। अब वह बिना रुके लगातार धक्के मार रहा था। निशा भी अपनी कमर ऊपर उठाकर समीर का पूरा साथ दे रही थी। अचानक निशा का शरीर कांपने लगा और उसकी खाई से गरम रस का फव्वारा छूट गया। उसके ठीक कुछ सेकंड बाद समीर ने भी एक आखिरी गहरा धक्का लगाया और अपना सारा गरम रस निशा की खाई की गहराई में उड़ेल दिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए बिस्तर पर गिर पड़े। समीर का खीरा अब भी निशा की खाई के अंदर ही था। दोनों की सांसें बहुत तेज चल रही थीं और पूरा कमरा उनकी उत्तेजना की गंध से भरा हुआ था। निशा ने समीर के माथे को चूमा और उसे अपनी बाहों में कस लिया। वह एक ऐसी रात थी जिसने दो अजनबियों को हमेशा के लिए एक अटूट बंधन में बांध दिया था।

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