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अजनबी संग लिफ्ट में चु@@ई


अजनबी संग लिफ्ट में चु@@ई—>

रात के ग्यारह बज चुके थे और मुंबई की उस आलीशान गगनचुंबी इमारत में सन्नाटा पसरा हुआ था। कविता अपने ऑफिस के काम से थकी-हारी घर लौट रही थी। उसने गहरे नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी हुई थी, जो उसके सुडौल और कामुक शरीर पर बिल्कुल फिट बैठी थी। जैसे ही वह लिफ्ट के पास पहुंची, वहां एक अजनबी खड़ा था। उसका नाम समीर था, जो हाल ही में ऊपर वाले फ्लोर पर रहने आया था। समीर काफी लंबा और कसरती शरीर का मालिक था, उसकी हल्की बढ़ी हुई दाढ़ी और गहरी आंखों में एक अजीब सी कशिश थी जो किसी भी महिला को अपनी ओर आकर्षित कर ले।

कविता की शारीरिक बनावट किसी अप्सरा से कम नहीं थी। साड़ी के नीचे से उभरते उसके बड़े और गोल तरबूज हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए काफी थे। साड़ी के टाइट ब्लाउज में उसके तरबूज इस तरह कसे हुए थे जैसे वो अभी बाहर निकल आएंगे। उसकी कमर पतली थी और उसके पिछवाड़े का घेराव काफी चौड़ा और मांसल था, जो चलते समय एक लय में हिलता था। समीर ने उसे तिरछी नजरों से देखा और मन ही मन उसकी खूबसूरती का कायल हो गया। लिफ्ट के अंदर जाते ही सन्नाटा और गहरा गया, और दोनों के बीच एक अदृश्य तनाव महसूस होने लगा।

अचानक एक तेज झटका लगा और लिफ्ट बीच में ही रुक गई। लाइटें बंद हो गईं और सिर्फ एक हल्की सी लाल इमरजेंसी लाइट जलने लगी। कविता डर के मारे लड़खड़ाई और सीधे समीर की मजबूत बाहों में जा गिरी। समीर ने उसे संभाला, और उस पल दोनों के शरीर एक-दूसरे से पूरी तरह सट गए। कविता के नरम और उभरे हुए तरबूज समीर की चौड़ी छाती से टकरा रहे थे। समीर की सांसों की गर्माहट कविता की गर्दन पर महसूस हो रही थी, जिससे उसके शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। कविता की साड़ी का पल्लू सरक गया था और समीर की नजरें उसके गोरे और चमकदार शरीर पर जम गई थीं।

समीर ने बहुत ही धीमे स्वर में पूछा, ‘क्या आप ठीक हैं?’ कविता ने धड़कते दिल के साथ हां में सिर हिलाया, लेकिन उसने खुद को समीर की बाहों से अलग नहीं किया। दोनों की आंखों में एक-दूसरे के प्रति बढ़ती हुई इच्छा साफ देखी जा सकती थी। उस छोटी सी बंद जगह में हवा भारी होने लगी थी। समीर का हाथ धीरे से सरकते हुए कविता की नग्न कमर पर गया, जहां उसकी छुअन ने कविता के भीतर सोई हुई कामुकता को जगा दिया। कविता ने एक गहरी आह भरी और अपनी आंखें मूंद लीं। यह झिझक और मन के बीच चल रहे संघर्ष का अंत था, अब सिर्फ प्यास बाकी थी।

समीर ने अपनी उंगलियों से कविता के चेहरे को छुआ और फिर धीरे से उसके गुलाबी होंठों पर अपने होंठ रख दिए। यह पंखुड़ियों का एक ऐसा मिलन था जिसने दोनों के भीतर आग लगा दी। कविता ने समीर के गले में अपनी बाहें डाल दीं और उसे और करीब खींच लिया। समीर का हाथ अब साड़ी के ब्लाउज के ऊपर से कविता के भारी तरबूजों को सहला रहा था। उसने ब्लाउज के हुक खोले और उन रसीले तरबूजों को आजाद कर दिया। उन तरबूजों के ऊपर लगे छोटे-छोटे मटर अब ठंड और उत्तेजना से पूरी तरह सख्त हो चुके थे। समीर ने उन मटरों को अपने मुंह में लिया और धीरे-धीरे चूसना शुरू किया।

कविता की कराह पूरी लिफ्ट में गूंजने लगी, ‘ओह समीर… ऐसे ही… और जोर से।’ समीर अब और नहीं रुक सकता था। उसने अपनी पैंट खोली और अपना कड़क और लंबा खीरा बाहर निकाला। कविता ने जब उस विशाल खीरे को देखा तो उसकी आंखें फटी रह गई। समीर ने कविता को लिफ्ट की दीवार से सटा दिया और उसकी साड़ी को ऊपर उठा दिया। कविता की रसीली और तंग खाई अब समीर के सामने थी। समीर ने अपनी उंगलियों से खाई को टटोलना शुरू किया, जो पहले से ही गीली और चिपचिपी हो चुकी थी। कविता ने समीर के खीरे को अपने हाथों में पकड़ा और उसे सहलाने लगी।

समीर ने अब कविता के खीरा चाटने की इच्छा जताई और वह नीचे झुककर उसकी खाई के पास बैठ गया। उसने अपनी जीभ से कविता की खाई को चाटना शुरू किया। कविता का पूरा शरीर झटके लेने लगा और वह समीर के बालों को अपनी उंगलियों में जकड़ने लगी। ‘समीर… तुम बहुत अच्छा खोद रहे हो… मुझे और चाहिए,’ वह सिसकते हुए बोली। इसके बाद समीर ने कविता को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदने वाली पोजीशन में कर दिया। उसने पीछे से अपना कठोर खीरा कविता की तंग खाई के मुहाने पर रखा और एक ही झटके में उसे अंदर उतार दिया।

कविता के मुंह से एक चीख निकली, लेकिन वह दर्द की नहीं बल्कि चरम सुख की थी। समीर अब पूरी ताकत से खुदाई कर रहा था। लिफ्ट के अंदर थप-थप की आवाजें गूंज रही थीं। समीर के हर धक्के के साथ कविता के तरबूज जोर-जोर से उछल रहे थे। समीर ने कविता के बालों को पीछे से पकड़ा और उसके कानों में फुसफुसाया, ‘तुम्हारी खाई बहुत तंग है कविता, इसे खोदने में बहुत मजा आ रहा है।’ कविता भी अपनी कमर पीछे की तरफ झटककर समीर के खीरे का पूरा आनंद ले रही थी। खुदाई की यह प्रक्रिया बहुत लंबी और दमदार थी, दोनों के शरीर पसीने से नहा चुके थे।

कुछ देर बाद समीर ने कविता को सामने से खोदने के लिए सीधा किया। उसने कविता की दोनों टांगें अपने कंधों पर रखीं और फिर से गहराई तक खुदाई शुरू की। समीर का खीरा बार-बार कविता की खाई की गहराई को नाप रहा था। ‘मैं निकलने वाली हूँ समीर… मेरा रस छूटने वाला है,’ कविता ने चिल्लाते हुए कहा। समीर ने भी अपनी गति बढ़ा दी और कुछ ही पलों में दोनों का रस एक साथ निकल गया। समीर का गर्म रस कविता की खाई के भीतर भर गया, जिससे उसे एक असीम शांति का अनुभव हुआ। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए लिफ्ट के फर्श पर ही बैठ गए।

लिफ्ट की लाइट वापस आ गई और लिफ्ट चलने लगी। दोनों ने जल्दी-जल्दी अपने कपड़े ठीक किए। जब लिफ्ट खुली, तो दोनों के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी। कविता ने समीर की ओर देखा और मुस्कुराते हुए अपने फ्लैट की ओर बढ़ गई। समीर भी अपने घर चला गया, लेकिन उस रात की खुदाई की यादें और लिफ्ट की वो नमी उनके दिलों में हमेशा के लिए बस गई। वह सिर्फ एक अजनबी से मुलाकात नहीं थी, बल्कि दो जिस्मों का रूहानी और कामुक मिलन था जिसने उन्हें एक-दूसरे का हमेशा के लिए मुरीद बना दिया था। अब हर रात लिफ्ट का वो सफर उनके लिए एक नई उम्मीद लेकर आने वाला था।

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