>समीर, अपने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी की तलाश में बड़े भाई और भाभी आरती के साथ उनके घर में रह रहा था। शहर के इस छोटे से अपार्टमेंट में तीनों की ज़िंदगी गुजर रही थी। भाई सुबह काम पर निकल जाता, और समीर दिन भर किताबों और कंप्यूटर में उलझा रहता, लेकिन उसकी नज़रें अक्सर घर के कामों में जुटी आरती भाभी पर ठहर जातीं। भाभी की मौजूदगी से घर में एक अजीब-सी गर्माहट और ताजगी महसूस होती थी। उनकी हर चाल, हर मुस्कान, यहाँ तक कि उनकी रसोई से आती पकवानों की खुशबू भी समीर को भीतर तक छू जाती थी। समीर उन्हें अपनी बड़ी बहन मानता था, लेकिन कहीं गहरे में एक ऐसी भावना पनप रही थी, जिसे वो खुद भी समझ नहीं पाता था और न ही स्वीकारने की हिम्मत जुटा पाता था। यह भावना एक ऐसे सूखे रेगिस्तान में पानी की बूँद जैसी थी, जो सिर्फ़ प्यास बढ़ाती थी।
आरती भाभी बत्तीस साल की थीं, और उनका शरीर जैसे किसी देवी की मूर्ती की तरह तराशा गया था। उनकी लंबी गर्दन, भरे हुए तरबूज जो अक्सर साड़ी या ढीले टॉप के नीचे से भी अपनी मौजूदगी का एहसास कराते थे, और फिर उनकी पतली कमर, जो किसी भी कपड़े में दिखते ही समीर की सांसें अटका देती थी। उनका पिछवाड़ा भी भरा हुआ और सुडौल था, जो उनकी चाल में एक खास लचक पैदा करता था। जब वह घर के काम करतीं, झुकतीं या सामान उठातीं, तो उनके कपड़ों की सलवटों से उभरते उनके अंगों के उभार समीर की नजरों को अपनी ओर खींच लेते। समीर, एक युवा लड़के की भाँति, चोरी-छिपे उन्हें निहारता, और फिर खुद को झिड़क कर नज़रें हटा लेता, एक अजीब-सी शर्म और बेचैनी से उसका चेहरा लाल हो उठता था। वह इस विचार से भी डरता था कि कहीं उसकी भावनाएं किसी को पता न चल जाएं, खासकर भाभी को।
भाई के दफ्तर जाने के बाद, घर में अक्सर समीर और आरती भाभी ही अकेले होते थे। यह अकेलापन धीरे-धीरे उनके रिश्ते में एक नई गहराई ला रहा था। भाभी समीर को सिर्फ़ देवर ही नहीं, बल्कि एक छोटे भाई और दोस्त की तरह भी देखती थीं। वह उससे उसकी पढ़ाई, नौकरी की तलाश और भविष्य की योजनाओं के बारे में बातें करतीं। समीर भी अपनी बातें उनसे साझा करता। कभी-कभी वे साथ बैठकर चाय पीते, या टीवी देखते हुए हल्की-फुल्की बातें करते। भाभी उसकी बहुत देखभाल करतीं, उसके लिए पसंदीदा खाना बनातीं, और उसकी हर ज़रूरत का ध्यान रखतीं। इस भावनात्मक जुड़ाव में एक अदृश्य डोर थी, जो दोनों को धीरे-धीरे एक-दूसरे के और करीब ला रही थी। समीर को उनकी आवाज़ में, उनके स्पर्श में एक अनोखी ममता और अपनत्व महसूस होता, जो उसे भीतर तक सुकून देता।
यह आकर्षण सिर्फ़ शारीरिक नहीं था, बल्कि भावनात्मक भी था, जो धीरे-धीरे एक कामुक मोड़ ले रहा था। एक दिन जब समीर अपने कमरे से निकला, तो देखा कि बाथरूम का दरवाज़ा थोड़ा खुला था और आरती भाभी अंदर से कपड़े बदल रही थीं। उसने अनजाने में एक झलक देख ली – भाभी अपने ढीले कपड़े उतार रही थीं, और उनके भरे हुए तरबूज की एक झलक समीर को दिखी। वह तुरंत शर्मिंदा होकर पीछे हट गया, लेकिन उस क्षणिक दृश्य ने उसके मन में एक आग लगा दी। भाभी की खुशबू, जो अक्सर उनके कपड़ों और शरीर से आती थी, अब उसे और भी मदहोश करने लगी थी। कभी-कभी जब भाभी कोई चीज़ पकड़ातीं, तो उनका हाथ समीर के हाथ से अनजाने में छू जाता। उस हल्के से स्पर्श में एक ऐसी गर्माहट होती, जो समीर की रगों में बिजली दौड़ा देती। वह अपनी बढ़ती हुई इच्छाओं से डरता था, पर उन्हें रोकना उसके बस में नहीं था।
मन में एक तीव्र झिझक और संघर्ष चल रहा था। समीर बार-बार खुद को समझाता, “यह गलत है, वो मेरे भाई की पत्नी हैं!” लेकिन उसकी बढ़ती हुई इच्छाएं उसे बार-बार भाभी की ओर खींचती थीं। वह उनके करीब रहने के बहाने ढूंढने लगा। भाभी भी शायद इस बदलाव को महसूस कर रही थीं। उनकी आँखों में कभी-कभी एक शरारती चमक दिखती, और वह समीर को हल्के-फुल्के अंदाज़ में छेड़ देतीं। कभी वह जानबूझकर समीर के करीब आकर खड़ी हो जातीं, जब वह कुछ पढ़ रहा होता, और उसकी पीठ पर उनका तरबूज हल्का सा छू जाता। उस स्पर्श से समीर का पूरा शरीर सिहर उठता। दोनों के बीच एक अनकहा तनाव और एक मूक इच्छा का वातावरण बनने लगा था। हर दिन उनके बीच की दीवार पतली होती जा रही थी, जैसे कि एक तूफान से पहले की खामोशी हो।
एक दोपहर, जब समीर रसोई में पानी लेने गया, तो देखा आरती भाभी ऊपर अलमारी से कुछ उतारने की कोशिश कर रही थीं। उनका हाथ नहीं पहुंच रहा था। समीर तुरंत उनकी मदद के लिए आगे बढ़ा। जैसे ही उसने अलमारी से चीज़ निकालने के लिए हाथ बढ़ाया, भाभी की नरम देह उसके बिल्कुल करीब आ गई। उनके तरबूज उसकी पीठ से हल्के से सट गए और उनकी खुशबू से समीर का दिमाग घूम गया। जब उसने चीज़ उन्हें पकड़ाने के लिए पलटा, तो उनका हाथ उसके हाथ से पूरी तरह से लिपट गया। उस स्पर्श में एक बिजली-सी दौड़ी। दोनों की आँखों में एक-दूसरे के लिए उमड़ती इच्छा साफ दिखाई दे रही थी। वे कुछ पल तक एक-दूसरे की आँखों में देखते रहे, बिना कुछ बोले। शर्म और उत्साह का एक अजीब मिश्रण उनके चेहरों पर झलक रहा था। समीर के होंठ कांप रहे थे, और भाभी की सांसे तेज़ हो गई थीं। यह पहला सीधा और निडर स्पर्श था, जिसने उनके बीच की सारी दीवारें गिरा दी थीं।
उस पहले स्पर्श के बाद, उनके रिश्ते में एक नया अध्याय शुरू हो गया था। अब समीर और भाभी एक-दूसरे को छूने के बहाने ढूंढने लगे थे। बातों-बातों में हल्की-फुल्की छेड़छाड़ और स्पर्श आम हो गया था। भाभी कभी-कभी समीर के बालों में हाथ फेरतीं, या उसके कंधे पर हाथ रख देतीं, और समीर भी कभी-कभी उनका हाथ पकड़ लेता या उनकी कमर पर हल्का सा हाथ रख देता। एक शाम, भाई किसी काम से शहर से बाहर गए हुए थे। घर में सिर्फ़ समीर और आरती भाभी थे। डिनर के बाद, वे टीवी देख रहे थे, लेकिन दोनों का ध्यान कहीं और था। समीर की नज़रें बार-बार भाभी के तरबूज पर जा रही थीं, जो उनके हल्के कपड़े के नीचे साफ उभर रहे थे। भाभी ने भी उसकी नज़रें महसूस कीं और एक शरारती मुस्कान के साथ कहा, “क्या बात है समीर, आज बहुत शांत हो?” समीर ने हिचकिचाते हुए कहा, “बस… ऐसे ही भाभी।” भाभी ने टीवी बंद कर दिया और समीर के बगल में आकर बैठ गईं। उनकी साँसें तेज़ हो रही थीं और समीर को उनके पास से एक मीठी खुशबू आ रही थी।
भाभी ने धीरे से अपना हाथ समीर के हाथ पर रखा। उस स्पर्श से समीर का पूरा शरीर कांप उठा। उसने धीरे से भाभी का हाथ अपनी हथेली में ले लिया। भाभी ने अपनी पलकें झुका लीं, उनके गाल गुलाबी पड़ गए थे। समीर ने धीरे से अपना दूसरा हाथ भाभी की कमर पर रखा और उन्हें अपनी ओर खींचा। भाभी ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि और करीब आ गईं। समीर ने अपनी हिम्मत जुटाई और धीरे से अपने होंठ भाभी के होंठों पर रख दिए। यह पहला गहरा होंठों का मिलाप था। भाभी ने भी पूरी शिद्दत से उसका साथ दिया, उनके होंठों में एक मीठी गर्माहट थी। वे एक-दूसरे को देर तक चूसते रहे, उनकी साँसें एक हो गईं। फिर भाभी ने समीर को अपने से अलग किया, उनकी साँसें फूल रही थीं। “समीर…” उन्होंने धीरे से कहा, उनकी आवाज़ में एक अजीब-सी इच्छा और समर्पण था। समीर ने उनके तरबूज को हल्के से दबाया, जो उनके ब्लाउज़ के नीचे से भी नरम और भरे हुए महसूस हो रहे थे। भाभी ने एक आह भरी।
समीर ने धीरे-धीरे भाभी के ब्लाउज़ के बटन खोले। उनके भरे हुए तरबूज, बिना किसी बंधन के, उसके सामने उभर आए। समीर की आँखें उन पर टिक गईं। तरबूज गोल और सुडौल थे, और उन पर गहरे गुलाबी मटर थे, जो अब उत्तेजना से तन गए थे। उसने धीरे से अपने होंठ एक तरबूज पर रखे और उसे चूसना शुरू किया। भाभी की साँसों की गति और तेज़ हो गई। उन्होंने अपना सिर पीछे की ओर झुका लिया और एक गहरी आह भरी। “आह… समीर…” वे फुसफुसाईं। समीर ने बारी-बारी से दोनों तरबूज को चूसा, उनके मटर को धीरे-धीरे अपनी ज़ुबान से छुआ और सहलाया। भाभी का शरीर एक अनकही अग्नि में जल रहा था। उन्होंने अपने हाथों से समीर के बालों को कसकर पकड़ लिया। समीर ने उनके पेट पर हाथ फेरा और धीरे-धीरे नीचे ले गया, उनकी साड़ी और पेटीकोट को एक तरफ हटाया।
अब भाभी की खाई पूरी तरह से उसके सामने थी, जो घने और मुलायम बालों से ढकी हुई थी। समीर ने अपने होंठों को उनकी खाई पर रखा और उसे धीरे-धीरे चाटना शुरू किया। भाभी का शरीर अब पूरी तरह से कांप रहा था। “समीर… ओहो… और… और तेज़ी से…” वे फुसफुसाईं। समीर ने अपनी जीभ से खाई को धीरे-धीरे चाटा, उसकी गरमाहट और नमी को महसूस किया। भाभी के मुंह से लगातार आहें निकल रही थीं। वह अपनी उंगली से उनकी खाई में धीरे-धीरे खोदने लगा। खाई अंदर से गर्म और गीली थी। भाभी ने अपनी कमर उठा दी और समीर की उंगली को और गहराई तक लेने की कोशिश की। समीर ने देखा कि भाभी के चेहरे पर रस निकलने की तीव्र इच्छा साफ दिख रही थी। उन्होंने कहा, “समीर… मुझे… मुझे अब और नहीं रुका जाता…”
समीर ने अपने कपड़े उतारे, और उसका खीरा अब पूरी तरह से तन चुका था, एकदम सीधा और मजबूत। भाभी ने अपनी आँखों से खीरे को निहारा, उनकी आँखों में एक अजीब-सी चमक थी। “समीर… यह तो बहुत… बहुत बड़ा है…” उन्होंने शरमाते हुए कहा। समीर ने धीरे से भाभी के बगल में लेटकर उनके पैरों को उठाया और उन्हें अपने ऊपर खींच लिया। भाभी ने अपने हाथों से समीर के खीरे को पकड़ा और उसे धीरे से अपनी खाई के मुहाने पर रखा। “धीरे से… समीर… आह…” उन्होंने फुसफुसाया। समीर ने एक गहरी साँस ली और धीरे-धीरे अपने खीरे को खाई में डाला। खाई गरम और तंग थी, और खीरा धीरे-धीरे अपनी जगह बना रहा था। भाभी ने अपनी कमर उठा दी और पूरी तरह से खीरे को अंदर ले लिया। “आह… समीर… अंदर तक… पूरा अंदर तक…”
अब दोनों एक-दूसरे में समा चुके थे। समीर धीरे-धीरे खुदाई कर रहा था, और भाभी भी अपनी कमर उठा-उठा कर उसका साथ दे रही थीं। उनकी साँसें, उनकी आहें, उनकी कराहें पूरे कमरे में गूँज रही थीं। हर धक्के के साथ एक नई गहराई, एक नई अनुभूति थी। “समीर… और तेज़ी से… मुझे… मुझे और चाहिए…” भाभी ने उसकी पीठ पर नाखूनों से निशान बनाते हुए कहा। समीर ने अपनी गति बढ़ा दी। उनकी देह पसीने से भीग चुकी थी, और उनके चेहरे पर एक-दूसरे के प्रति असीम इच्छा साफ झलक रही थी। खाई अंदर से खीरे को कसकर पकड़े हुए थी, और हर बार बाहर निकलने पर एक मीठी रगड़ पैदा होती थी। “आह… भाभी… तुम… तुम कितनी गर्म हो…” समीर ने हाँफते हुए कहा। भाभी ने अपनी टाँगों को समीर की कमर पर कस लिया और उसे और गहराई तक खींच लिया। “मुझे… मुझे रस निकलने वाला है समीर… ओहो… आह…”
समीर ने अंतिम कुछ धक्के और तेज़ी से दिए। उनकी साँसें अब एक चीख में बदल गई थीं। एक तीव्र लहर उनके शरीर में दौड़ी, और भाभी का शरीर तन गया। “आह… समीर… आ गया… रस निकल गया… ओहोहो…” उनके शरीर में एक तेज़ कंपकंपी हुई और उनका रस समीर के अंदर समा गया। कुछ ही पल बाद, समीर को भी एक तीव्र आनंद की अनुभूति हुई और उसका भी रस भाभी की गरम खाई में छूट गया। दोनों एक-दूसरे में लिपटे हुए, हाँफते हुए, बिस्तर पर गिर पड़े। उनके शरीर थक चुके थे, लेकिन उनके मन में एक असीम शांति और संतुष्टि का अनुभव था। वे कुछ देर तक चुपचाप एक-दूसरे को गले लगाए लेटे रहे, उनकी साँसें अभी भी तेज़ी से चल रही थीं। भाभी ने अपना सिर समीर के सीने पर रख दिया। समीर ने उनके बालों को सहलाया।
उनकी आँखों में एक-दूसरे के लिए गहरा प्यार और एक नई समझ थी। यह सिर्फ़ कामुकता नहीं थी, बल्कि एक ऐसा भावनात्मक जुड़ाव था, जिसे उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था। वे एक-दूसरे को निहारते रहे, बिना कुछ बोले, बस उस पल की पवित्रता और गहराई को महसूस कर रहे थे। भाभी ने धीरे से समीर के गाल पर एक खीरा मुंह में लिया। “समीर… आज तुमने मुझे वो दिया है, जो मैंने कभी महसूस नहीं किया था…” उनकी आवाज़ हल्की थी, लेकिन उसमें एक गहरी भावना थी। समीर ने उन्हें और कसकर अपनी बाहों में भर लिया। उन्हें पता था कि उनका यह रिश्ता अब एक नए मोड़ पर आ चुका था, एक ऐसा मोड़ जहाँ से वापसी नहीं थी। यह एक गुप्त प्रेम था, जो उनके दिलों में हमेशा धड़कता रहेगा। वे एक-दूसरे के साथ लेटे रहे, भविष्य की चिंता से मुक्त होकर, बस उस अद्भुत वर्तमान को जी रहे थे, जो सिर्फ़ उन्हीं का था।