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कविता की रसीली चु@@ई


कविता की रसीली चु@@ई—>

कविता की उम्र इस समय चौंतीस साल थी, और उसका शरीर किसी ढलते हुए सूरज की तरह नहीं बल्कि दोपहर की तपती धूप की तरह निखर रहा था। उसकी लंबी कद-काठी और ऊपर से नीचे तक मुकम्मल गोलाईयां किसी को भी मदहोश करने के लिए काफी थीं। जब वह चलती थी, तो उसके भारी तरबूज उसकी पतली कमर के ऊपर ऐसे डोलते थे जैसे कोई दो रसीले फल डाल पर झूल रहे हों। उसका पिछवाड़ा काफी चौड़ा और मांसल था, जो हर कदम के साथ एक अलग ही ताल में थिरकता था, जिससे उसकी सिल्क की साड़ी उसके अंगों से चिपक कर उसकी कामुकता को और भी उभार देती थी। वह मेरे पिता की दूसरी पत्नी थी, लेकिन उम्र में मुझसे केवल दस साल बड़ी होने के कारण वह मेरी माँ कम और एक जवान प्रेमिका अधिक लगती थी।

मेरे मन में उसके प्रति एक गहरा आकर्षण बचपन से ही पनप रहा था, जो अब एक ज्वालामुखी की तरह फटने को बेताब था। वह जब भी रसोई में काम करती, उसकी पसीने से भीगी पीठ और साड़ी के नीचे से झलकती गोरी त्वचा मेरे अंदर एक अजीब सी सिहरन पैदा कर देती थी। उसकी आँखों में एक ऐसी गहराई थी जिसमें मैं डूब जाना चाहता था, और उसकी आवाज में वो खनक थी जो सीधे मेरे दिल के तारों को छेड़ देती थी। हम अक्सर घंटों बातें करते, लेकिन उन बातों के पीछे दबी हुई वासना और एक दूसरे के प्रति खिंचाव को हम दोनों ही अच्छी तरह महसूस कर सकते थे, बस उस सीमा को लांघने की देर थी जो हमारे रिश्ते ने बनाई थी।

उस दोपहर घर पर कोई नहीं था, बाहर गर्मी अपने चरम पर थी और कमरे के अंदर सन्नाटा पसरा हुआ था जो हमारी धड़कनों को साफ सुना रहा था। कविता सोफे पर लेटी हुई एक मैगजीन पढ़ रही थी, उसकी साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसक गया था जिससे उसके भारी तरबूज का ऊपरी हिस्सा और उसके बीच की गहरी घाटी साफ नजर आ रही थी। मेरी नजरें बार-बार उसी जगह जाकर ठहर रही थीं, और मेरा खीरा मेरी पैंट के अंदर अपनी जगह बनाने के लिए छटपटा रहा था। मैंने हिम्मत जुटाई और उसके पास जाकर बैठ गया, मेरी सांसें तेज चलने लगी थीं और पसीना माथे पर आने लगा था, जो गर्मी की वजह से नहीं बल्कि उस बढ़ती हुई बेताबी की वजह से था।

मैंने धीरे से अपना हाथ उसकी रेशमी कमर पर रखा, मेरा स्पर्श होते ही वह हल्का सा कांप उठी लेकिन उसने मुझे रोका नहीं। उसकी त्वचा रेशम जैसी मुलायम और मखमल की तरह चिकनी थी, मेरा हाथ धीरे-धीरे ऊपर की ओर सरकने लगा और मैंने महसूस किया कि उसकी सांसें भी अब भारी होने लगी थीं। उसने अपनी आँखें बंद कर ली थीं और उसका चेहरा हल्का लाल पड़ गया था, जो इस बात का संकेत था कि वह भी उसी आग में जल रही थी जिसमें मैं जल रहा था। मैंने झुककर उसके कान के पास फुसफुसाते हुए उसका नाम लिया, और उसने अपनी बाहें मेरे गले में डाल दीं, जिससे हमारे शरीर एक दूसरे में सिमट गए।

उसका रेशमी स्पर्श और उसके शरीर की सोंधी खुशबू मुझे पागल कर रही थी, मैंने धीरे से उसकी साड़ी के पल्लू को नीचे गिरा दिया। अब उसके दोनों विशाल तरबूज सिर्फ एक पतले ब्लाउज के अंदर कैद थे, जो उनकी भारी गोलाई को संभालने में नाकाम लग रहा था। मैंने अपने हाथों से उन तरबूजों को धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया, वह इतने नरम और गदगद थे कि मेरा दिल चाहा कि मैं उन्हें अपनी मुट्ठी में भींच लूँ। ब्लाउज के कपड़े के ऊपर से ही उसके दोनों मटर सख्त हो चुके थे और मेरी हथेलियों को चुभ रहे थे, जिससे मेरे अंदर की उत्तेजना और भी बढ़ गई और मेरा खीरा अब पूरी तरह से अकड़ कर पत्थर जैसा हो गया था।

मैंने उसके ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोल दिए और जैसे ही कपड़ा अलग हुआ, उसके गोरे और चमकदार तरबूज मेरी आँखों के सामने आ गए। वे इतने सुंदर और भारी थे कि मैं बस उन्हें देखता ही रह गया, उनके ऊपर छोटी-छोटी नसें साफ दिखाई दे रही थीं और गुलाबी मटर उन पर सजे हुए किसी रत्न की तरह लग रहे थे। मैंने झुककर एक मटर को अपने मुंह में लिया और उसे धीरे से चूसने लगा, कविता के मुंह से एक दबी हुई कराह निकली और उसने अपने हाथ मेरे बालों में फँसा लिए। वह अपने शरीर को मेरे ऊपर रगड़ रही थी और उसकी बेताबी अब चरम पर पहुँचने वाली थी।

अब बारी थी उस रहस्यमयी जगह की जिसे देखने के लिए मैं बरसों से तड़प रहा था, मैंने उसकी साड़ी और पेटीकोट को धीरे-धीरे नीचे सरकाया। जैसे ही वह निर्वस्त्र हुई, मेरी आँखों के सामने उसकी गहरी और रसीली खाई थी, जिसके चारों ओर काले और मुलायम बाल एक जंगल की तरह फैले हुए थे। उस खाई से एक हल्की सी प्राकृतिक महक आ रही थी जो किसी भी मर्द को दीवाना बना सकती थी। मैंने अपनी उंगलियों से उस खाई को छूना शुरू किया, वह पहले से ही गीली और लिसलिसी हो चुकी थी, जो इस बात का सबूत था कि कविता पूरी तरह से तैयार है। मैंने अपनी उंगली से खोदना शुरू किया, तो वह जोर-जोर से सिसकारियां लेने लगी।

कविता अब पूरी तरह से होश खो चुकी थी, उसने झपटकर मेरी पैंट खोली और मेरा तना हुआ खीरा बाहर निकाल लिया। मेरा खीरा अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ उसके सामने था, उसने उसे अपने कोमल हाथों में पकड़ा और सहलाने लगी। फिर उसने धीरे से अपना मुंह खोला और मेरे खीरे को मुंह में लेना शुरू किया, उसकी गरम जीभ जब मेरे खीरे के ऊपरी हिस्से को चाट रही थी, तो मुझे ऐसा लगा जैसे स्वर्ग मिल गया हो। वह बड़ी ही कुशलता से खीरा चूस रही थी, कभी ऊपर तो कभी नीचे, उसकी आँखों में जो वासना थी उसने मुझे पागल कर दिया और मैंने उसे बिस्तर पर लिटा दिया।

अब समय आ गया था उस असली काम का जिसके लिए हम दोनों बेचैन थे, मैंने उसे सामने से खोदने (missionary) की स्थिति में किया और अपने खीरे की नोक को उसकी गरम और गीली खाई के मुहाने पर रखा। जैसे ही मैंने थोड़ा दबाव डाला, मेरा खीरा उसकी तंग खाई के अंदर धीरे-धीरे सरकने लगा, वह इतनी तंग थी कि मुझे अंदर जाने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही थी। कविता ने अपना पिछवाड़ा ऊपर उठाया ताकि मैं गहराई तक जा सकूँ, और जैसे ही मेरा पूरा खीरा उसकी खाई के अंदर समा गया, हम दोनों के मुंह से एक साथ आह निकली। वह एहसास इतना गहरा और सुखद था कि शब्द कम पड़ जाएं।

मैंने धीरे-धीरे धक्के मारना शुरू किया, हर धक्का उसे गहराई तक छू रहा था और उसकी खाई से आने वाली लिसलिसी आवाज कमरे में गूंज रही थी। कविता की आँखें ऊपर चढ़ गई थीं और वह अपनी हथेलियों से चादर को कसकर पकड़ रही थी, उसके तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे जो एक बहुत ही मोहक दृश्य था। मैंने उसकी गति को थोड़ा तेज किया और अब हम दोनों एक ही लय में झूम रहे थे, पसीना हमारे शरीरों को और भी चिकना बना रहा था। वह बार-बार मेरे कान में कह रही थी, “और जोर से खोदो, मुझे पूरा भर दो,” उसके ये शब्द मेरे अंदर और भी जोश भर रहे थे।

थोड़ी देर बाद मैंने उसे पलटा और पिछवाड़े से खोदने (doggy style) की स्थिति में ले आया, उसका भारी और मांसल पिछवाड़ा अब मेरे सामने था। मैंने पीछे से अपना खीरा फिर से उसकी खाई में उतारा और तेज गति से खुदाई शुरू की, इस स्थिति में मेरा खीरा उसकी खाई की दीवारों को और भी गहराई से रगड़ रहा था। कविता के पिछवाड़े का हर झटका मेरे खीरे को और भी उत्तेजित कर रहा था, वह अपने हाथों को बिस्तर पर टिकाकर आगे की ओर झुकी हुई थी और उसके तरबूज हवा में लटक रहे थे। खुदाई इतनी दमदार थी कि पूरा बेड हिल रहा था और कमरे में सिर्फ हमारी सांसों और शरीर के टकराने की आवाजें थीं।

काफी देर तक इस आनंद का मजा लेने के बाद, मुझे महसूस हुआ कि अब मेरा रस छूटने वाला है, कविता भी अपने चरम पर थी और उसका पूरा शरीर थरथरा रहा था। मैंने अपनी गति को और भी तीव्र कर दिया और गहराई तक धक्के मारे, तभी कविता ने एक लंबी आह भरी और उसका रस निकलना शुरू हो गया, उसकी खाई की दीवारें मेरे खीरे को जोर-जोर से भींचने लगीं। ठीक उसी समय मेरे खीरे ने भी अपना गरम लावा उसकी गहराई में छोड़ दिया, वह गरम धारा जब उसकी खाई के अंदर फैली, तो हमें जो सुकून मिला वह अतुलनीय था। हम दोनों पसीने से तर-बतर एक दूसरे के ऊपर गिर पड़े।

कुछ मिनटों तक हम दोनों ऐसे ही खामोश लेटे रहे, बस हमारी सांसें सामान्य होने का इंतजार कर रही थीं। कविता ने मुझे अपनी बाहों में कसकर भींच लिया और मेरे माथे को चूम लिया, उसके चेहरे पर एक अलग ही संतुष्टि और चमक थी। वह शर्म जो शुरू में थी, अब पूरी तरह से खत्म हो चुकी थी और उसकी जगह एक गहरे भावनात्मक और शारीरिक जुड़ाव ने ले ली थी। उसकी हालत अभी भी ऐसी थी कि वह हिलने की स्थिति में नहीं थी, और मेरा खीरा भी अब धीरे-धीरे अपनी सामान्य अवस्था में आ रहा था, लेकिन उसकी खाई की गर्माहट अभी भी मुझे महसूस हो रही थी।

उस दिन के बाद से हमारे बीच का रिश्ता पूरी तरह बदल गया, अब वह सिर्फ मेरी सौतेली माँ नहीं बल्कि मेरी रूह का हिस्सा बन चुकी थी। वह दोपहर हमारी पहली खुदाई की याद बनकर हमेशा के लिए हमारे दिलों में बस गई। हमने महसूस किया कि समाज के बनाए नियम अपनी जगह हैं, लेकिन मन की इच्छाएं और शरीर की जरूरतें अपनी अलग ही भाषा बोलती हैं। कविता अब पहले से कहीं ज्यादा खुश और खिली-खिली रहती थी, और हमारी वो गुप्त मुलाकातें हमारे जीवन का सबसे सुंदर हिस्सा बन गई थीं, जहाँ हम एक दूसरे की रूह और जिस्म को गहराई से जानते और पहचानते थे।

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