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कविता भाभी की चु@@ई


कविता भाभी की चु@@ई—>

कविता भाभी का शरीर किसी तराशे हुए पत्थर की मूरत जैसा था, जिसमें कुदरत ने हर अंग को बहुत ही बारीकी से उभारा था। उनके शरीर के ऊपरी हिस्से में मौजूद वे दो विशाल तरबूज साड़ी के पतले रेशमी पर्दे के पीछे से अपनी मौजूदगी का अहसास कराते थे। जब भी वह चलती थीं, तो उन तरबूजों में होने वाली हलचल मेरी धड़कनों को बढ़ा देती थी। भाभी के शरीर की बनावट ऐसी थी कि कोई भी पुरुष उन्हें एक बार देख ले तो अपनी सुध-बुध खो बैठे। उनके चेहरे पर हमेशा एक हल्की सी मुस्कान रहती थी, जो उनकी आँखों की गहराई में छिपी कामुकता को और भी ज्यादा गहरा बना देती थी। उनके पिछवाड़े का भारीपन उनकी कमर के पतलेपन को और भी अधिक आकर्षक बनाता था, जिससे उनकी चाल में एक मादकता भरी लचक आ जाती थी।

उस रात बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और घर में हम दोनों के अलावा कोई नहीं था। भाभी ने एक गहरे नीले रंग की साड़ी पहनी हुई थी जो उनके गोरे बदन पर बिजली की तरह चमक रही थी। वह रसोई में काम कर रही थीं और पसीने की कुछ बूंदें उनके गले से नीचे उतरकर उन तरबूजों की गहराई में जाकर खो रही थीं। मेरा मन उन मटर जैसे निप्पलों को साड़ी के ऊपर से ही महसूस करने को बेताब हो रहा था। हमारे बीच एक अनकहा रिश्ता पनप रहा था, जो धीरे-धीरे शब्दों की सीमाओं को पार कर चुका था। उनकी आँखों में भी वही तड़प थी जो मेरे भीतर एक ज्वालामुखी बनकर सुलग रही थी। हम दोनों ही एक-दूसरे की ओर खिंचे चले जा रहे थे, लेकिन मर्यादा की दीवार हमें रोके हुए थी।

तभी अचानक बिजली गुल हो गई और पूरे घर में गहरा अंधेरा छा गया। मैंने सुना कि भाभी की सांसें तेज हो गई थीं। मैं धीरे-धीरे उनके करीब पहुँचा, अंधेरे में भी मुझे उनकी खुशबू अपनी ओर खींच रही थी। जैसे ही मेरा हाथ उनकी मखमली कमर पर पड़ा, वह कांप उठीं। उनके बदन में एक सिहरन दौड़ गई और उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। मैंने उन्हें अपनी बाहों में भर लिया और उनके चेहरे के करीब जाकर उनकी गर्म सांसों को अपने गालों पर महसूस किया। उनके होंठों का स्पर्श मिलते ही जैसे पूरी दुनिया ठहर गई। मैंने उनके तरबूजों को अपने हाथों में भर लिया और धीरे-धीरे उन्हें मसलना शुरू किया। वह सिसकने लगी थीं और उनका शरीर मेरे स्पर्श से पिघलने लगा था।

भाभी की उत्तेजना अब सातवें आसमान पर थी। उन्होंने मेरे हाथ को अपनी खाई की ओर बढ़ाया, जो अब पूरी तरह से गीली हो चुकी थी। मैंने अपनी उंगलियों से उनकी खाई को खोदना शुरू किया, तो उनके मुँह से दबी हुई आहें निकलने लगीं। वह बार-बार मेरा नाम लेकर मुझे और करीब बुला रही थीं। मैंने उनके कपड़ों को एक-एक करके शरीर से अलग कर दिया। अब वह मेरे सामने पूर्ण नग्न अवस्था में थीं, उनके मटर जैसे निप्पल ठंड और उत्तेजना से सख्त हो गए थे। मैंने झुककर उन तरबूजों का रस लेना शुरू किया और फिर धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ते हुए उनकी खाई के पास पहुँचा। उनकी खाई से निकलने वाली प्राकृतिक गंध मुझे और भी ज्यादा पागल बना रही थी।

मैंने अपना खीरा बाहर निकाला, जो अब अपनी पूरी लम्बाई और मोटाई के साथ खड़ा था। भाभी ने जब पहली बार उस खीरे को देखा, तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गई। उन्होंने बड़े प्यार से उस खीरे को अपने हाथ में लिया और उसे सहलाने लगीं। कुछ ही पलों बाद उन्होंने उस खीरे को अपने मुँह में ले लिया और उसे बड़े चाव से चूसने लगीं। उनके मुँह की गर्मी और जीभ की रगड़ ने मुझे स्वर्ग का अहसास करा दिया। मेरा मन कर रहा था कि अभी इसी वक्त उन्हें बिस्तर पर लिटाकर उनकी गहरी खुदाई शुरू कर दूँ। उनकी इस क्रिया ने मुझे और भी ज्यादा उत्तेजित कर दिया था और मैं अब रुकने की हालत में नहीं था।

मैंने भाभी को बिस्तर पर लेटाया और उनके दोनों पैरों को फैलाकर उनकी खाई के मुहाने पर अपना खीरा रख दिया। जैसे ही मैंने धीरे से दबाव डाला, वह जोर से कराह उठीं। उनकी खाई बहुत ही तंग और रसीली थी। मैंने धीरे-धीरे सामने से खोदना शुरू किया। हर धक्के के साथ मेरा खीरा उनकी खाई की गहराई को नाप रहा था। भाभी ने अपने दोनों पैर मेरी कमर पर लपेट लिए और मुझे अपनी ओर और भी जोर से खींचने लगीं। कमरे में केवल हमारे टकराने की आवाजें और उनकी मदहोश कर देने वाली आहें गूँज रही थीं। खुदाई की यह प्रक्रिया अब अपनी गति पकड़ चुकी थी और हम दोनों ही इस आनंद के सागर में डूबते जा रहे थे।

कुछ देर सामने से खुदाई करने के बाद, मैंने उन्हें पलटने को कहा। अब वह घुटनों के बल खड़ी थीं और उनका पिछवाड़ा मेरी ओर उठा हुआ था। मैंने पीछे से उनके पिछवाड़े को पकड़कर अपने खीरे को फिर से उनकी खाई में डाल दिया। यह तरीका और भी ज्यादा रोमांचक था क्योंकि हर धक्के पर उनके तरबूज नीचे की ओर झूल रहे थे। मैंने झुककर उनके मटरों को फिर से अपने मुँह में भर लिया और पीछे से खुदाई जारी रखी। भाभी पागलों की तरह अपना सिर हिला रही थीं और उनके शरीर से पसीना बह रहा था। उनकी खाई अब इतनी रसीली हो गई थी कि हर धक्के पर छप-छप की आवाज आ रही थी।

अंत में, जब हम दोनों की उत्तेजना अपने चरम पर पहुँच गई, तो मैंने अपनी खुदाई की रफ्तार और तेज कर दी। भाभी चिल्लाने लगी थीं, ‘हाँ आर्यन, और तेज… मुझे पूरी तरह से भर दो!’ उनकी आँखों से आंसू निकल रहे थे जो खुशी और चरम सुख के थे। अचानक मेरा शरीर अकड़ गया और मेरे खीरे से गर्म रस निकलकर उनकी खाई के अंदर भर गया। उसी पल भाभी का भी रस छूट गया और वह निढाल होकर बिस्तर पर गिर पड़ीं। हम दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए काफी देर तक वहीं पड़े रहे, हमारी सांसें अब धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। वह रात हमारी जिंदगी की सबसे यादगार और सुकून भरी रात बन गई थी।

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