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काव्या की अधूरी चु@@ई

काव्या और समीर सालों बाद एक-दूसरे के आमने-सामने थे, कमरे में एक अजीब सी खामोशी और पुरानी यादों की खुशबू बसी हुई थी। काव्या ने उस रात एक गहरे नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी, जो उसके गोरे बदन पर किसी जादू की तरह लिपटी हुई थी और उसकी कमर की गोलाई को और भी उभार रही थी। समीर उसे देख रहा था और उसके मन में पुरानी कॉलेज की यादें ताज़ा हो रही थीं, जब वे घंटों तक एक-दूसरे की आँखों में डूबे रहते थे लेकिन कभी अपनी भावनाओं को जुबान नहीं दे पाए थे। कमरे की मद्धम रोशनी में काव्या का चेहरा और भी आकर्षक लग रहा था, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी जो समीर को अपनी ओर खींच रही थी और दिल की धड़कनें तेज़ कर रही थी। समीर ने महसूस किया कि वक्त ज़रूर गुज़र गया है, लेकिन उनके बीच की वह तड़प आज भी वैसी ही ताज़ा और अनछुई थी, जैसे कोई अधूरी ख्वाहिश आज पूरी होने के लिए बेकरार हो।

काव्या के शरीर की बनावट किसी तराशी हुई मूरत जैसी थी, उसकी साड़ी का पल्लू बार-बार खिसक रहा था जिससे उसके उभरे हुए भारी तरबूज साफ़ झलक रहे थे जो रेशमी ब्लाउज के भीतर कैद होने के लिए छटपटा रहे थे। जब वह चलती थी तो उसके भारी पिछवाड़े की मटकन समीर के सीने में आग लगा देती थी, उसकी पतली कमर और चौड़े कूल्हों का वह संगम किसी को भी मदहोश करने के लिए काफी था। समीर की नज़रें काव्या के उन रसीले तरबूजों पर टिकी थीं, जिनके ऊपर लगे छोटे-छोटे गुलाबी मटर ब्लाउज के कपड़े को चीरकर बाहर आने की कोशिश कर रहे थे, जिससे समीर के शरीर में एक अजीब सी बिजली दौड़ने लगी। वह देख रहा था कि कैसे काव्या की हर सांस के साथ उसके तरबूज ऊपर-नीचे हो रहे थे, जो उसके भीतर छिपी उत्तेजना और डर की गवाही दे रहे थे, और समीर का खीरा धीरे-धीरे अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा था।

बातों-बातों में समीर का हाथ गलती से काव्या की उंगलियों से टकरा गया और उस एक स्पर्श ने जैसे दोनों के शरीर में करंट दौड़ा दिया, दोनों की आँखें मिलीं और सब कुछ ठहर सा गया। काव्या ने अपनी नज़रें झुका लीं लेकिन उसने अपना हाथ नहीं हटाया, बल्कि धीरे से अपनी उंगलियां समीर की हथेली में फंसा दीं, जिससे उनके बीच का भावनात्मक खिंचाव एक शारीरिक प्यास में बदलने लगा। उनके बीच अब कोई पर्दा नहीं था, सिर्फ बरसों की दबी हुई हसरत थी जो अब फूटने को तैयार थी, समीर ने काव्या को अपनी ओर खींचा और उसके कानों के पास जाकर धीरे से फुसफुसाया। काव्या की गर्दन पर समीर की गर्म सांसें पड़ते ही वह सिहर उठी और उसने अपनी आँखें मूंद लीं, जैसे वह इस पल का बरसों से इंतज़ार कर रही हो और अब वह खुद को रोकने की हालत में बिल्कुल नहीं थी।

समीर ने अपनी कांपती हुई उंगलियों से काव्या के गालों को छुआ और फिर धीरे से उसके होंठों की ओर बढ़ा, जहाँ एक अनकही दास्तां लिखी हुई थी, उसने काव्या के होंठों को अपनी गिरफ्त में ले लिया। यह सिर्फ एक चुंबन नहीं था, बल्कि दो रूहों का मिलन था, काव्या ने भी पूरी शिद्दत से समीर का साथ दिया और उसके बालों में अपनी उंगलियां फंसा दीं, कमरे का तापमान जैसे अचानक से बढ़ गया हो। समीर के हाथ अब काव्या की साड़ी के पल्लू को हटा चुके थे और उसके दोनों भारी तरबूज अब आज़ाद होकर समीर की हथेलियों में थे, वह उन्हें धीरे-धीरे सहलाने लगा जिससे काव्या के मुँह से दबी हुई आहें निकलने लगीं। समीर ने अपने अंगूठों से उन नन्हे मटरों को सहलाया तो काव्या का पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया, उसकी आँखें चढ़ने लगीं और वह समीर की छाती से चिपक गई, मानो वह उसमें समा जाना चाहती हो।

समीर ने धीरे से काव्या को बिस्तर पर लेटा दिया, जहाँ उसकी रेशमी साड़ी और ब्लाउज अब एक-एक करके ज़मीन पर गिर रहे थे, और जल्द ही वह पूरी तरह से कुदरती लिबास में समीर के सामने थी। काव्या के शरीर का हर हिस्सा, उसके गहरे रंग के बाल जो उसकी जांघों के पास उगे हुए थे, और उसकी गहरी खाई जो अब गीली हो चुकी थी, समीर को पागल बना रही थी। समीर ने भी अपने कपड़े उतार फेंके और उसका बड़ा और सख्त खीरा अब पूरी तरह से बाहर था, जिसे देखकर काव्या की आँखें फटी की फटी रह गई और उसने धीरे से उस खीरे को अपने हाथ में थाम लिया। काव्या ने उस खीरे को बड़े प्यार से सहलाया और फिर धीरे-धीरे उस खीरे को चूसना शुरू किया, समीर का पूरा शरीर उत्तेजना से कांप उठा और उसे ऐसा लगा जैसे वह जन्नत के करीब पहुँच गया हो।

समीर अब और सब्र नहीं कर सकता था, उसने काव्या को अपनी बाहों में लिया और उसकी गहरी खाई को चाटना शुरू किया, काव्या बिस्तर की चादरों को अपनी मुट्ठी में भींचने लगी और ज़ोर-ज़ोर से कराहने लगी। उसकी खाई से निकलता हुआ मीठा रस समीर के मुँह में घुलने लगा, जिससे उसकी प्यास और बढ़ गई, उसने काव्या की खाई में उंगली से खोदना शुरू किया तो वह पागलपन की हद तक तड़पने लगी। काव्या की सिसकियां अब कमरे की दीवारों से टकरा रही थीं, वह समीर से गुहार लगा रही थी कि वह अब उसे और न तड़पाए और उसे वह सुकून दे जिसकी उसे बरसों से तलाश थी। समीर ने काव्या की दोनों टांगों को अपने कंधों पर रखा और अपने सख्त खीरे को उसकी खाई के मुहाने पर टिका दिया, जहाँ से गर्म भाप निकल रही थी और खुदाई का असली मंजर शुरू होने वाला था।

समीर ने एक जोरदार धक्के के साथ अपने खीरे को काव्या की तंग खाई के भीतर उतार दिया, काव्या के मुँह से एक चीख निकली जो दर्द और आनंद का मिला-जुला अहसास थी, उसने समीर की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए। धीरे-धीरे समीर ने खुदाई की गति बढ़ाई, हर धक्के के साथ उसका खीरा काव्या की गहराई को नाप रहा था और काव्या के तरबूज ज़ोर-ज़ोर से ऊपर-नीचे उछल रहे थे जो देखने में बड़े ही मनमोहक लग रहे थे। खुदाई इतनी गहरी और प्रभावशाली थी कि पूरे कमरे में उनके शरीर के टकराने की आवाज़ गूँज रही थी, समीर कभी सामने से खोदता तो कभी काव्या को पलटकर उसके पिछवाड़े से खोदने लगता। काव्या का शरीर पसीने से तर-बतर हो चुका था, उसकी सांसें उखड़ रही थीं और वह समीर के धक्कों के साथ अपनी कमर को तालमेल बिठाकर ऊपर उठा रही थी ताकि वह खीरा और अंदर तक जा सके।

खुदाई की यह प्रक्रिया अब अपने चरम पर पहुँच रही थी, समीर की रफ्तार अब बेकाबू हो चुकी थी और काव्या भी अपने चरम सुख के बेहद करीब थी, उसकी आँखों के आगे धुंध छाने लगी थी। समीर ने काव्या के दोनों तरबूजों को मरोड़ते हुए आख़िरी कुछ दमदार धक्के लगाए और तभी काव्या का शरीर बुरी तरह से थरथराने लगा, उसकी खाई से रस छूटने लगा और वह समीर से लिपट गई। समीर ने भी अपने खीरे का सारा गर्म रस काव्या की गहराई में खाली कर दिया, दोनों एक-दूसरे की बाहों में ढीले पड़ गए, उनकी धड़कनें एक-दूसरे से मुकाबला कर रही थीं और शरीर पसीने की बूंदों से नहाया हुआ था। उस खुदाई के बाद का सुकून और थकान दोनों के चेहरों पर साफ़ झलक रही थी, वे दोनों देर तक बिना कुछ बोले बस एक-दूसरे को महसूस करते रहे, जैसे कोई सदियों पुरानी प्यास आज जाकर बुझी हो।

कुछ देर बाद जब उनकी सांसें सामान्य हुईं, समीर ने काव्या के माथे को चूमा और उसे अपनी बाहों में समेट लिया, कमरे में अब भी उस खुदाई की गर्माहट और गंध मौजूद थी जो उनके मिलन की गवाही दे रही थी। काव्या की हालत ऐसी थी कि वह हिलने के काबिल भी नहीं थी, उसकी खाई अब भी समीर के रस से भरी हुई थी जो धीरे-धीरे बाहर निकल रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर एक गहरी संतुष्टि की मुस्कान थी। समीर को लगा कि आज उसने न सिर्फ काव्या के शरीर को पाया है, बल्कि उसकी रूह के उन कोनों तक भी पहुँच गया है जहाँ कोई और कभी नहीं जा सका था। वे दोनों वैसे ही नग्न अवस्था में एक-दूसरे से लिपटे हुए सो गए, यह जानते हुए कि यह रात उनके जीवन की सबसे यादगार और मुकम्मल रात थी, जहाँ शब्दों की ज़रूरत नहीं थी, सिर्फ जिस्मों की जुबान थी।

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