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काव्या के साथ पुरानी सहेली की चु@@ई

समीर ने जैसे ही दरवाज़ा खटखटाया, अंदर से काव्या की मखमली आवाज़ आई जिसने उसके कानों में शहद घोल दिया। काव्या उसकी कॉलेज की सबसे पुरानी और सबसे अच्छी दोस्त थी, जिससे वह लगभग सात सालों के बाद मिल रहा था। जब दरवाज़ा खुला, तो समीर की धड़कनें जैसे एक पल के लिए रुक सी गईं और उसकी आँखों के सामने जवानी का एक जीता-जागता सैलाब खड़ा था। काव्या ने एक गहरी नीली रेशमी साड़ी पहनी थी, जो उसके बदन पर इस तरह लिपटी थी जैसे कोई बेल किसी पुराने पेड़ से लिपटी हो। उसकी उम्र अब सत्ताइस के करीब थी, और इन सालों में उसका शरीर और भी ज़्यादा मांसल और आकर्षक हो गया था, जिसे देखकर समीर के मन में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई।

काव्या के जिस्म की बनावट एकदम कयामत जैसी थी, जिसे देखकर किसी भी मर्द का ईमान डोल सकता था। उसकी साड़ी के पल्लू से उसके उभरे हुए बड़े-बड़े तरबूज आधे बाहर झांक रहे थे, जो उसकी हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। वे तरबूज इतने रसीले और टाइट लग रहे थे कि समीर का मन किया कि अभी उन्हें थाम ले और अपनी उंगलियों से उनकी नरमी को महसूस करे। उन तरबूजों के ऊपर छोटे-छोटे मटर जैसे दाने साड़ी के पतले कपड़े के ऊपर से भी अपनी मौजूदगी साफ़ दर्ज करा रहे थे। उसकी कमर पतली और लचकदार थी, लेकिन उसके नीचे का पिछवाड़ा काफी भारी और चौड़ा था, जो चलते समय एक लय में हिलता था और समीर की नज़रों को वहीं जमने पर मजबूर कर रहा था।

दोनों ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठे, जहाँ हवा में काव्या के इत्र की भीनी-भीनी खुशबू फैली हुई थी जो सीधे समीर के दिमाग पर असर कर रही थी। काव्या ने पुरानी यादें ताज़ा करना शुरू किया, लेकिन समीर का ध्यान उसकी बातों से ज़्यादा उसके उन गुलाबी होंठों पर था जो बोलते समय बड़े प्यारे लग रहे थे। काव्या ने महसूस किया कि समीर उसे किस तरह से निहार रहा है, उसकी नज़रों में छिपी हुई भूख को काव्या ने पहचान लिया था। बातचीत के दौरान काव्या का पल्लू बार-बार जानबूझकर नीचे खिसक रहा था, जिससे उसके तरबूजों की गहराई और भी साफ़ दिखने लगी थी। समीर की सांसें भारी होने लगी थीं और उसे महसूस हो रहा था कि उसके पेंट के अंदर उसका खीरा अब अपनी जगह बनाने के लिए तड़प रहा है।

काव्या ने मुस्कुराते हुए समीर का हाथ अपने हाथ में लिया और धीरे से सहलाया, जिससे समीर के पूरे शरीर में करंट सा दौड़ गया। उसने अपनी रेशमी आवाज़ में कहा, “समीर, क्या देख रहे हो? क्या मैं बदल गई हूँ या तुम्हारी नज़रें अब और भी ज़्यादा गहरी हो गई हैं?” समीर ने हिम्मत जुटाई और उसके हाथ को थोड़ा कसकर पकड़ते हुए कहा, “तुम बदल तो गई हो काव्या, पहले से कहीं ज़्यादा रसीली और हसीन हो गई हो, मेरा तो मन कर रहा है कि तुम्हें बस देखता ही रहूँ।” काव्या की आँखों में एक चमक आई और उसने समीर के चेहरे के पास आकर धीरे से फुसफुसाया, “सिर्फ देखोगे या कुछ और भी करोगे?” इस सवाल ने समीर के मन के सारे बांध तोड़ दिए और उसने काव्या को अपनी बाहों में खींच लिया।

समीर के हाथों ने सबसे पहले काव्या की पीठ को सहलाया, जहाँ से उसकी त्वचा रेशम की तरह मुलायम महसूस हो रही थी। काव्या ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक गहरी आह भरी, जो समीर के कानों के पास किसी संगीत की तरह गूँजी। समीर ने अपने होंठ काव्या के गले पर टिका दिए और वहाँ की कोमल त्वचा को धीरे-धीरे चखने लगा। काव्या की पकड़ समीर के बालों पर मज़बूत हो गई और उसने अपनी गर्दन पीछे झुका दी ताकि समीर को और जगह मिल सके। कमरे में सन्नाटा था, बस उन दोनों की भारी होती सांसों की आवाज़ गूँज रही थी। समीर के हाथ अब धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ने लगे और उन्होंने काव्या के उन भारी तरबूजों को अपनी गिरफ्त में ले लिया, जिनकी गर्माहट ने समीर के दिमाग को सुन्न कर दिया था।

समीर ने साड़ी का पल्लू पूरी तरह से हटा दिया और उन तरबूजों को आज़ाद कर दिया, जो अब उसके सामने अपनी पूरी शान से तनकर खड़े थे। उन पर लगे छोटे-छोटे मटर जैसे दाने उत्तेजना के कारण सख्त हो गए थे। समीर ने अपना मुँह एक तरबूज पर टिका दिया और उसे धीरे-धीरे चूसने लगा, जिससे काव्या के मुँह से सिसकारी निकल गई। वह बार-बार कह रही थी, “ओह समीर, कितना मज़ा आ रहा है, और ज़ोर से करो।” समीर ने दूसरे हाथ से काव्या की साड़ी को खोलना शुरू किया और देखते ही देखते वह अपनी दोस्त के सामने उसके पूर्ण नग्न और कामुक रूप को देख रहा था, जहाँ उसकी गहरी खाई अब नमी से चमक रही थी।

समीर ने अपने कपड़े जल्दी-जल्दी उतारे और अपने सख्त और तने हुए खीरे को आज़ाद किया, जिसे देखकर काव्या की आँखें फटी की फटी रह गईँ। उसने हाथ बढ़ाकर उस खीरे को थामा और उसकी लंबाई और मोटाई को महसूस करते हुए उसे अपने मुँह की ओर ले गई। जब काव्या ने खीरा चूसना शुरू किया, तो समीर को लगा जैसे वह स्वर्ग के दरवाज़े पर खड़ा हो। उसके मुँह की गर्माहट और जीभ की हरकत ने समीर को पागल कर दिया था। वह बस काव्या के सिर को सहला रहा था और चाहता था कि यह पल यहीं थम जाए। काव्या ने काफी देर तक खीरे का रस चखा और फिर बिस्तर पर लेटकर अपनी टांगें फैला दीं, अपनी गहरी खाई को समीर की खुदाई के लिए आमंत्रित करते हुए।

समीर अब काव्या के ऊपर आ गया और उसने अपनी उंगली से खाई की गहराई को टटोलना शुरू किया। खाई पूरी तरह से गीली और फिसलन भरी हो चुकी थी, जो इस बात का सबूत थी कि काव्या खुदाई के लिए पूरी तरह तैयार है। समीर ने अपने खीरे की नोक को खाई के मुहाने पर टिकाया और धीरे से दबाव डाला। जैसे ही खीरे ने खाई के अंदर प्रवेश किया, काव्या के मुँह से एक लंबी कराह निकली, “आह समीर… तुम कितने बड़े हो… धीरे से…” समीर ने खुद को रोका और धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू किया। हर धक्के के साथ खीरा और भी गहराई तक जा रहा था, जिससे काव्या की पूरी देह कांप उठती थी।

धीरे-धीरे खुदाई की गति बढ़ने लगी और कमरे में मांस के टकराने की आवाज़ गूँजने लगी। समीर अब पूरी ताकत से काव्या को खोद रहा था, और काव्या भी नीचे से अपनी कमर ऊपर उठाकर उसका साथ दे रही थी। उसने अपने पैरों को समीर की पीठ पर कस लिया था ताकि वह उसे और भी गहराई तक महसूस कर सके। “हाँ समीर, ऐसे ही… और तेज़ खोदो… अपनी पूरी ताकत लगा दो…” काव्या चिल्ला रही थी। उसके तरबूज पागलों की तरह ऊपर-नीचे उछल रहे थे और समीर उन्हें अपने हाथों से मसलते हुए अपनी खुदाई जारी रखे हुए था। दोनों के शरीर पसीने से तर-बतर थे, लेकिन उत्तेजना कम होने का नाम नहीं ले रही थी।

समीर ने अब काव्या को घुमाया और उसे बिस्तर पर घुटनों के बल खड़ा कर दिया। पिछवाड़े से खोदना उसे हमेशा से पसंद था, और काव्या का भारी पिछवाड़ा इस मुद्रा के लिए एकदम सही था। समीर ने पीछे से अपने खीरे को फिर से खाई में उतारा और इस बार धक्कों की आवाज़ और भी तेज़ हो गई। काव्या तकिए में अपना मुँह छिपाकर आहें भर रही थी और समीर की खुदाई का लुत्फ उठा रही थी। वह बार-बार कह रही थी, “समीर, तुम मुझे आज मार ही डालोगे… कितना गहरा जा रहे हो तुम…” समीर की रगों में खून दौड़ रहा था और उसे लग रहा था कि अब उसका रस छूटने वाला है, लेकिन वह इस सुख को और लंबा खींचना चाहता था।

खुदाई अपने चरम पर थी, दोनों ही अपनी सुध-बुध खो चुके थे। समीर ने काव्या को फिर से सीधा लिटाया और मिशनरी अंदाज़ में उसके ऊपर लेटकर आखिरी और सबसे ज़ोरदार धक्के मारना शुरू किया। काव्या की आँखें उलट गई थीं और वह बस बेतरतीब आवाज़ें निकाल रही थी। अचानक समीर को महसूस हुआ कि उसका खीरा अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता और काव्या की खाई भी तेज़ी से सिकुड़ रही थी। एक आखिरी गहरे धक्के के साथ, समीर का सारा रस छूट गया और काव्या की खाई के अंदर भर गया। उसी पल काव्या का भी रस निकल गया और वह समीर को ज़ोर से भींचकर शांत हो गई। दोनों एक-दूसरे के ऊपर निढाल पड़े थे, बस उनकी धड़कनें एक-दूसरे से बात कर रही थीं।

कुछ देर बाद जब दोनों की सांसें सामान्य हुईं, समीर काव्या के बगल में लेट गया और उसे अपनी बाहों में भर लिया। काव्या का चेहरा अभी भी गुलाबी था और उसकी आँखों में एक अजीब सी संतुष्टि थी। उसने समीर की छाती पर अपना सिर रखा और धीरे से कहा, “सालों का इंतज़ार आज खत्म हुआ समीर, तुमने मुझे जो महसूस कराया है वह मैं कभी नहीं भूल सकती।” समीर ने उसके माथे को चूमा और महसूस किया कि यह सिर्फ शरीर का मिलन नहीं था, बल्कि दो पुरानी रूहों की प्यास थी जो आज बुझ गई थी। कमरा शांत था, लेकिन उनकी रूहों में अभी भी उस खुदाई की गूँज बाकी थी, जिसने उन्हें हमेशा के लिए एक-दूसरे के करीब ला दिया था।

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