गाँव की वह भीगी हुई शाम और सन्नाटे से भरी हवेली का वह कोना आज भी मेरे जेहन में ताजा है जब मैंने पहली बार अपनी जवान चाची नेहा को एक नई नजर से देखा था। नेहा चाची की उम्र अभी मुश्किल से अट्ठाइस साल रही होगी और उनके पति यानी मेरे चाचा को गुजरे दो साल बीत चुके थे लेकिन उनकी जवानी आज भी किसी दहकते हुए अंगारे की तरह थी जो किसी को भी अपनी लपेट में लेने के लिए बेताब थी। उनके शरीर की बनावट ऐसी थी कि कोई भी उन्हें देखे तो बस देखता ही रह जाए। उनके सीने पर लटके हुए वे दो रसीले और भारी तरबूज किसी भी पुरुष का मन डोलने के लिए काफी थे और जब भी वह अपनी साड़ी का पल्लू ढीला छोड़तीं तो उन तरबूजों के बीच की गहरी घाटी और उनके ऊपर उभरे हुए वे नन्हे मटर साफ झलकने लगते थे जो ठंड या उत्तेजना में अक्सर सख्त हो जाया करते थे। मैं उस वक्त अपनी पढ़ाई खत्म करके छुट्टियों में गाँव आया हुआ था और चाची के अकेलेपन को भरने के लिए अक्सर उनके पास बैठ जाया करता था।
उस दिन बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और बिजली के बार-बार जाने से घर के अंदर एक अजीब सा धुंधलका छाया हुआ था जिससे माहौल और भी ज्यादा कामुक हो गया था। नेहा चाची रसोई में रात का खाना बना रही थीं और उनके शरीर का पसीना उनकी पतली मलमल की साड़ी को उनके बदन से चिपका रहा था। मैंने गौर किया कि उनकी साड़ी के पीछे से उनका भारी और गोल पिछवाड़ा बार-बार हिल रहा था जो मुझे अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। उनके शरीर से उठने वाली वह भीनी-भीनी खुशबू और बारिश की मिट्टी की महक मिलकर मुझे मदहोश कर रही थी। मेरा ध्यान बार-बार उनकी गहरी खाई की तरफ जा रहा था जो उनकी साड़ी के नीचे कहीं छिपी हुई थी और जिसे देखने के लिए मेरा मन व्याकुल हो उठा था। मैंने महसूस किया कि मेरे पेंट के अंदर मेरा खीरा अब धीरे-धीरे अपनी जगह बनाने लगा था और उसमें एक गजब की अकड़न आ गई थी जो मुझे बेचैन कर रही थी।
मैंने धीरे से रसोई में कदम रखा और उनके पीछे जाकर खड़ा हो गया जहाँ से उनकी गर्दन का वह गोरा हिस्सा और उनकी पीठ का खुला भाग साफ दिख रहा था। मैंने धीरे से पुकारा चाची तो वह चौंक कर पीछे मुड़ीं और उनकी सांसों की गर्मी सीधे मेरे चेहरे पर महसूस हुई। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी जो शायद सालों की प्यास और अकेलेपन की दास्तां बयां कर रही थी। हमने एक-दूसरे को कुछ पलों के लिए बिना कुछ कहे देखा और उस खामोशी में ही सब कुछ कह दिया गया। उनका हाथ अनायास ही मेरे कंधे पर गया और मेरे हाथ उनकी कमर के उस मुलायम हिस्से को छूने लगे जहाँ उनकी साड़ी की सिलवटें खत्म हो रही थीं। उस स्पर्श ने जैसे हमारे शरीरों में बिजली का संचार कर दिया हो और उनके मुँह से एक हल्की सी आह निकली जो सीधे मेरे दिल की गहराइयों में उतर गई।
हमारे बीच का वह खिंचाव अब इतना बढ़ गया था कि झिझक की सारी दीवारें गिर चुकी थीं और हम दोनों एक-दूसरे की बाहों में समा गए थे। मैंने उनके होठों पर अपने होंठ रख दिए और हम दोनों एक-दूसरे के रस को पीने लगे जो किसी अमृत से कम नहीं था। उनकी सांसें उखड़ने लगी थीं और उनके हाथ मेरे बालों में उलझ गए थे जबकि मेरा एक हाथ उनके उन भारी तरबूजों को सहलाने लगा था जो साड़ी के अंदर कैद होने के लिए छटपटा रहे थे। मैंने धीरे से उनकी साड़ी के ब्लाउज के बटन खोले तो वे दो विशाल और सफेद तरबूज पूरी तरह से मेरे सामने आ गए जिनके ऊपर लगे मटर अब पूरी तरह से अकड़ चुके थे। मैंने अपने मुँह में एक मटर को लेकर उसे धीरे से चूसना शुरू किया तो चाची के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई और वह मदहोशी में मेरा नाम पुकारने लगीं। उनकी खाई अब धीरे-धीरे गीली होने लगी थी जिसका अहसास मुझे उनके करीब जाने पर हो रहा था।
चाची ने धीरे से मेरे कपड़े उतारना शुरू किया और जैसे ही मेरा लंबा और सख्त खीरा उनके सामने आया उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने अपने कोमल हाथों से मेरे खीरे को पकड़ा और उसे धीरे-धीरे सहलाने लगीं जिससे मुझे स्वर्ग जैसा आनंद महसूस होने लगा। फिर उन्होंने झुककर उस खीरे को अपने मुँह में ले लिया और उसे ऐसे चूसने लगीं जैसे वह दुनिया की सबसे मीठी चीज हो। उनके मुँह की गर्मी और उनकी जीभ का वह स्पर्श मुझे पागल कर रहा था और मेरा मन कर रहा था कि मैं अभी उनके अंदर अपनी गहराई की खोज शुरू कर दूँ। उन्होंने मेरे खीरे को पूरी तरह से गीला कर दिया था और अब बारी मेरी थी कि मैं उनकी उस अंधेरी और रसीली खाई का मुआयना करूँ जो अब रस छोड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार थी।
मैंने उन्हें धीरे से बिस्तर पर लेटाया और उनकी टांगों को फैलाकर उनके बीच अपनी जगह बनाई जहाँ उनकी खाई अपने रेशमी बालों के बीच छिपी हुई थी। मैंने अपनी जीभ से उनकी खाई को चाटना शुरू किया तो वह बिस्तर की चादर को अपने हाथों में भींचने लगीं और उनकी कराहें पूरे कमरे में गूँजने लगीं। उनकी खाई से निकलने वाला वह प्राकृतिक रस इतना मीठा और कामुक था कि मैं उसे पीता ही चला गया। वह बार-बार अपना पिछवाड़ा ऊपर उठा रही थीं ताकि मैं और गहराई तक जा सकूँ। जब मुझे लगा कि अब वह पूरी तरह से तैयार हैं तो मैंने अपने खीरे की नोक को उनकी खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से एक धक्का दिया। उनकी आँखों से आँसू छलक आए लेकिन वे दर्द के नहीं बल्कि उस सुख के थे जिसका उन्हें बरसों से इंतजार था। मेरा खीरा धीरे-धीरे उनकी तंग खाई के अंदर समाने लगा और वह पूरी तरह से मेरे अंदर समा गईं।
अब कमरे में सिर्फ हमारे शरीरों के टकराने की आवाजें और चाची की सिसकारियां सुनाई दे रही थीं। मैं सामने से खोदना शुरू कर चुका था और हर धक्के के साथ मेरा खीरा उनकी खाई की गहराइयों को छू रहा था। चाची ने अपनी टांगें मेरी कमर के चारों ओर लपेट ली थीं ताकि मैं और जोर से और गहराई तक खोद सकूँ। उनके तरबूज हर धक्के के साथ ऊपर-नीचे उछल रहे थे और मैं उन्हें अपने हाथों से मसलते हुए अपनी खुदाई की गति बढ़ाता जा रहा था। चाची बार-बार कह रही थीं समीर मुझे और जोर से खोदो आज मुझे पूरी तरह से अपनी बना लो। उनकी उन बातों ने मुझे और भी उत्तेजित कर दिया और मैंने उन्हें पलटकर पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। उस मुद्रा में उनकी खाई और भी ज्यादा खुल गई थी और मेरा खीरा उनकी जड़ों तक पहुँच रहा था। उनके शरीर से निकलने वाला पसीना हमारे बीच एक चिकनाहट पैदा कर रहा था जिससे खुदाई और भी मजेदार हो गई थी।
काफी देर तक इस गहन और भावनात्मक खुदाई के बाद हम दोनों अपने रस के चरम पर पहुँचने वाले थे। चाची की सांसें अब बहुत तेज हो गई थीं और उनका शरीर कांपने लगा था जिसका मतलब था कि उनकी खाई अब अपना पूरा रस छोड़ने वाली है। मैंने भी अपनी गति को और तेज कर दिया और कुछ ही पलों में मेरा सारा रस उनकी खाई के अंदर भर गया और साथ ही चाची का भी रस छूट गया जिससे वह पूरी तरह से निढाल होकर मेरे ऊपर गिर पड़ीं। हम दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए काफी देर तक वहीं पड़े रहे और उस सुकून को महसूस करते रहे जो सिर्फ दो रूहों के मिलन से मिलता है। चाची के चेहरे पर एक अजीब सी संतुष्टि थी और उनकी आँखें मुझे बता रही थीं कि आज उन्हें उनका खोया हुआ सम्मान और प्यार दोनों मिल गए हैं। वह रात हमारी जिंदगी की सबसे खूबसूरत रात थी जिसने हमारे रिश्ते को एक नई गहराई दे दी थी।