गर्मी की वो दोपहर बहुत ही उमस भरी थी, जब घर के बाकी सदस्य एक पारिवारिक शादी में शामिल होने के लिए शहर से बाहर गए हुए थे। सुनिता, जो रिश्ते में मेरी बड़ी भाभी लगती थी, घर पर अकेली थी क्योंकि उसकी तबीयत कुछ ठीक नहीं थी और मैं उसकी देखभाल के लिए रुक गया था। सुनिता की उम्र लगभग तीस साल थी, लेकिन उसका शरीर किसी कच्ची कली की तरह खिला हुआ था। उसकी बनावट ऐसी थी कि कोई भी उसे एक बार देख ले तो देखता ही रह जाए। उसने उस दिन एक बहुत ही महीन सूती साड़ी पहनी हुई थी, जो पसीने की वजह से उसके जिस्म से चिपक गई थी, जिससे उसके शरीर के हर उभार साफ झलक रहे थे।
सुनिता के शरीर का आकार बहुत ही मोहक था; उसके उभरे हुए तरबूज उसकी चोली के अंदर समाने की नाकाम कोशिश कर रहे थे और उनकी गोलाई साड़ी के ऊपर से ही अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही थी। उसकी कमर पतली थी और नीचे का पिछवाड़ा काफी चौड़ा और मांसल था, जो चलते समय एक अलग ही लय में थिरकता था। मैं सोफे पर बैठा उसे रसोई में काम करते हुए देख रहा था और मेरे मन में अजीब सी हलचल हो रही थी। हमारे बीच हमेशा से एक भावनात्मक जुड़ाव रहा था, वो मुझे अपने देवर से बढ़कर एक दोस्त मानती थी और मैं भी उसकी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रखता था, लेकिन आज उस जुड़ाव में कामुकता का तड़का लग चुका था।
रसोई से आती खुशबू और सुनिता के शरीर से निकलने वाली सौंधी गंध ने माहौल को और भी नशीला बना दिया था। जब वह पानी देने के लिए मेरे पास आई, तो मेरी नजरें अनायास ही उसकी साड़ी के पल्लू से फिसलकर उसके उभरे हुए तरबूजों के बीच की गहरी घाटी पर जा टिकीं। वहाँ पसीने की कुछ बूंदें चमक रही थीं, जिन्हें देखकर मेरे अंदर के आकर्षण ने जन्म ले लिया। सुनिता ने मेरी नजरों को भाँप लिया, लेकिन उसने नजरें फेरने के बजाय एक मखमली मुस्कान दी, जिसने मेरे मन में चल रहे संघर्ष को और बढ़ा दिया। मैं जानता था कि यह गलत है, लेकिन मेरा दिल तेजी से धड़क रहा था और मेरी सांसें भारी होने लगी थीं।
झिझक और मन का संघर्ष काफी देर तक चलता रहा, मैं सोच रहा था कि अगर मैंने कदम बढ़ाया तो हमारा रिश्ता क्या रूप लेगा। लेकिन तभी सुनिता ने पास आकर मेरा हाथ थाम लिया और कहा, ‘रोहन, आज बहुत गर्मी है न? क्या तुम मेरी पीठ पर थोड़ा पंखा झल दोगे?’ उसकी आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी, जो सीधे मेरे कलेजे को चीर गई। मैंने धीरे से अपना हाथ उसकी रेशमी त्वचा पर रखा। यह हमारा पहला स्पर्श था, जो बिजली के करंट की तरह मेरे पूरे शरीर में दौड़ गया। उसकी त्वचा मखमल जैसी नरम और गर्म थी, जिसे छूते ही मेरी उंगलियों में एक कंपन पैदा हो गई।
धीरे-धीरे हमारी नजदीकियां बढ़ने लगीं और वह झिझक जो अब तक दीवार बनी खड़ी थी, पिघलने लगी। मैंने अपनी उंगलियों को उसकी पीठ पर धीरे-धीरे नीचे की ओर सरकाया, जिससे उसकी आह निकल गई। उसने पीछे मुड़कर मेरी आँखों में देखा, जहाँ सिर्फ और सिर्फ बेपनाह इच्छा तैर रही थी। मैंने उसे अपनी बाहों में खींच लिया और उसके रसीले होठों का स्वाद लेने लगा। हमारे होठों का यह मिलन इतना गहरा था कि मुझे लगा जैसे पूरी दुनिया थम गई हो। उसकी सांसों की गर्मी मेरे चेहरे पर महसूस हो रही थी और उसका पसीना मेरी शर्ट को भिगो रहा था, जो हमें और भी करीब ला रहा था।
जैसे-जैसे उत्तेजना बढ़ी, मैंने अपनी उंगलियों से उसके ब्लाउज के हुक खोले, जिससे उसके भारी और रसीले तरबूज आज़ाद हो गए। उन तरबूजों के ऊपर छोटे-छोटे मटर की तरह उभरे हुए हिस्से मेरी उत्तेजना को चरम पर ले जा रहे थे। मैंने अपने हाथों में उन तरबूजों को भरकर सहलाना शुरू किया और अपनी जुबान से उनके मटर जैसे सिरों को सहलाया। सुनिता की कराहें अब कमरे की खामोशी को तोड़ रही थीं। उसने अपना हाथ नीचे ले जाकर मेरे पजामे के ऊपर से ही मेरे कड़े हो चुके खीरे को महसूस किया और उसे दबाने लगी। ‘ओह रोहन, तुम्हारा खीरा तो बहुत बड़ा और सख्त हो गया है,’ उसने फुसफुसाते हुए कहा।
अब नियंत्रण पूरी तरह खो चुका था, मैंने उसकी साड़ी और पेटीकोट को एक तरफ कर दिया, जिससे उसकी गहरी और रहस्यमयी खाई पूरी तरह मेरे सामने थी। वह खाई बहुत ही रसीली और गीली हो चुकी थी, जहाँ से प्यार का रस धीरे-धीरे रिस रहा था। मैंने नीचे झुककर अपनी जुबान से उसकी खाई को चाटना शुरू किया। सुनिता का शरीर धनुष की तरह तन गया और उसने मेरे बालों को मजबूती से पकड़ लिया। ‘आह रोहन, तुम तो बहुत अच्छा खाई चाट रहे हो, और अंदर तक स्वाद लो,’ उसने सिसकते हुए कहा। मेरी जुबान उसकी खाई के हर कोने का जायजा ले रही थी, जिससे वह पागलों की तरह तड़पने लगी।
जब वह पूरी तरह तैयार हो गई, तो मैंने अपने सख्त खीरे को उसकी खाई के मुहाने पर टिकाया। पहले मैंने धीरे से उसे अंदर डाला, जिससे उसे थोड़ी सी तकलीफ हुई लेकिन फिर उसने अपने पैर मेरी कमर के चारों ओर लपेट लिए। मैंने पूरी ताकत के साथ अपने खीरे को उसकी खाई के अंदर धकेल दिया। ‘उफ़ रोहन, तुमने तो मुझे पूरा भर दिया,’ सुनिता ने जोर से कराहते हुए कहा। इसके बाद शुरू हुई पूरी गहराई वाली खुदाई। कमरे में हमारे शरीरों के टकराने की आवाज़ और सुनिता की सिसकियां गूंजने लगीं। मैं सामने से खुदाई करते हुए उसके तरबूजों को बुरी तरह मसल रहा था और वह मेरे कंधों पर अपने नाखून गड़ा रही थी।
खुदाई की रफ्तार अब और तेज हो गई थी, हर धक्के के साथ मेरा खीरा उसकी खाई की गहराई को छू रहा था। हमने अपनी पोजीशन बदली और मैंने उसे पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। उसका मांसल पिछवाड़ा हर धक्के के साथ लहरें मार रहा था, जो देखने में बहुत ही कामुक लग रहा था। ‘हाँ रोहन, ऐसे ही खोदो, बहुत मजा आ रहा है,’ सुनिता की आवाज़ अब बेकाबू हो रही थी। हम दोनों पसीने से लथपथ थे और हमारी धड़कनें एक-दूसरे की लय से मिल चुकी थीं। मुझे महसूस हो रहा था कि अब मेरा रस छूटने वाला है और सुनिता भी अपनी चरम सीमा के बहुत करीब थी।
अचानक सुनिता का शरीर जोर-जोर से कांपने लगा और उसकी खाई ने मेरे खीरे को कसकर जकड़ लिया। उसका रस पूरी तरह से निकल चुका था और उसी पल मैंने भी अपने खीरे का सारा गरम रस उसकी खाई के अंदर ही खाली कर दिया। हम दोनों एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े, बुरी तरह हांफते हुए। उस पल की शांति बहुत ही सुकून भरी थी। खुदाई के बाद की वह फीलिंग और सुनिता की हालत देखने लायक थी; उसके चेहरे पर एक अजीब सी संतुष्टि और चमक थी। हम काफी देर तक उसी अवस्था में लेटे रहे, महसूस करते हुए कि उस दोपहर ने हमारे रिश्ते को हमेशा के लिए एक नया और गहरा मोड़ दे दिया था।