शहर की उस शांत गली में समीर की छोटी सी बुटीक अपनी कलाकारी के लिए जानी जाती थी। दोपहर का वक्त था और सूरज की तपिश सड़कों पर सन्नाटा फैला चुकी थी, तभी नैना ने दुकान के अंदर कदम रखा। नैना, जिसकी उम्र लगभग बत्तीस साल थी, अपनी रेशमी साड़ी में किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी। उसका बदन एक ढले हुए सांचे की तरह था, जिसमें उसके भारी तरबूज साड़ी के ब्लाउज को चीर कर बाहर आने को बेताब दिख रहे थे। समीर ने जैसे ही उसे देखा, उसकी सांसें वहीं थम गईं, क्योंकि नैना की आंखों में एक अजीब सी कशिश और शरीर में एक मादक उभार था।
समीर एक जवान और गठीले बदन का युवक था, जिसकी बाजू की नसें काम करते वक्त उभर आती थीं। नैना ने एक मखमली कपड़ा समीर की मेज पर रखा और एक नए डिजाइन के ब्लाउज की फरमाइश की। समीर जब नाप लेने के लिए उठा, तो नैना के बदन से उठती हुई इत्र की खुशबू ने उसे मदहोश कर दिया। उसने फीता उठाया और नैना के पास जाकर खड़ा हो गया। नैना ने अपनी बाहें ऊपर उठाईं, जिससे उसके उभरे हुए रसीले तरबूज और भी ज्यादा तंग हो गए। समीर के हाथ कांपने लगे थे जब उसने फीता नैना के सीने के चारों ओर लपेटा और उसकी उंगलियां गलती से उन नरम तरबूजों से टकरा गईं।
उस एक स्पर्श ने जैसे दोनों के बीच बिजली की एक लहर दौड़ा दी थी। नैना ने समीर की आंखों में देखा, जहां झिझक के साथ-साथ एक गहरी प्यास छिपी थी। उसने अपनी सांसों की गति बढ़ते हुए महसूस की और समीर की नज़दीकी उसे एक अनजानी उत्तेजना से भर रही थी। समीर ने धीरे से कहा कि पीठ का नाप लेना होगा, और नैना ने बिना कुछ कहे अपनी पीठ उसकी तरफ कर दी। उसकी साड़ी का पल्लू कंधे से फिसल कर नीचे गिर गया, जिससे उसकी गोरी और चिकनी पीठ पूरी तरह समीर के सामने थी। समीर का दिल अब ढोल की तरह धड़क रहा था और उसकी नजरें नैना के निचले हिस्से यानी उसके भारी पिछवाड़े पर टिक गई थीं।
समीर ने हिम्मत जुटाकर अपनी उंगलियों से नैना की नंगी पीठ को छुआ। नैना के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई और उसने धीरे से अपनी आंखें बंद कर लीं। समीर ने फीता कसते हुए जानबूझकर अपनी हथेली को उसकी कमर के नीचे ले जाकर उस भारी पिछवाड़े के ऊपरी हिस्से पर टिका दिया। नैना ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि उसने अपनी कमर को थोड़ा पीछे की तरफ धकेला, जिससे समीर को संकेत मिल गया कि वो भी यही चाहती है। दुकान के अंदर सन्नाटा गहरा गया था और बाहर से आने वाली रोशनी धुंधली पड़ चुकी थी, क्योंकि समीर ने धीरे से जाकर शटर गिरा दिया था।
अब वे दोनों एक-दूसरे के बिल्कुल करीब थे। समीर ने पीछे से नैना को अपनी बाहों में भर लिया और उसके गर्दन पर अपना चेहरा रख दिया। नैना की गरम सांसें समीर के चेहरे को छू रही थीं और वह धीरे-धीरे समीर के मजबूत जिस्म में पिघलने लगी थी। समीर के हाथ अब नैना के साड़ी के ऊपर से ही उन विशाल तरबूजों को दबाने लगे थे। वह उन्हें अपनी हथेलियों में भरकर मसल रहा था, जिससे नैना के मुंह से एक धीमी कराह निकली। समीर की उंगलियां साड़ी के अंदर जाकर उन छोटे-छोटे मटरों को ढूंढने लगीं जो अब ठंड और उत्तेजना से सख्त हो चुके थे।
नैना ने मुड़कर समीर को देखा और उसके होठों का रसपान करने लगी। दोनों की जुबानें एक-दूसरे से टकरा रही थीं और कामुकता अपने चरम पर पहुंचने लगी थी। समीर ने नैना को उठाकर मेज पर बिठा दिया और उसकी साड़ी को कमर तक ऊपर सरका दिया। नैना की जांघों के बीच की वह रेशमी खाई अब समीर की नजरों के सामने थी, जो हल्की सी नमी से चमक रही थी। समीर ने वहां लगे घने बालों को अपनी उंगलियों से सहलाया और फिर धीरे से अपनी एक उंगली को उस गीली खाई के अंदर डाल दिया। नैना ने जोर से समीर का कंधा पकड़ लिया और अपना सिर पीछे की तरफ झुका दिया।
जैसे-जैसे समीर की उंगली उस खाई में अंदर-बाहर हो रही थी, नैना का शरीर धनुष की तरह तनने लगा था। वह बार-बार ‘ओह समीर, और तेज’ की आवाज निकाल रही थी। समीर ने अब अपने कपड़े उतार फेंके और उसका विशाल और सख्त खीरा अब पूरी तरह से आजाद होकर हवा में लहरा रहा था। नैना की नजरें जब उस लोहे जैसे सख्त खीरे पर पड़ीं, तो उसकी आंखों में चमक आ गई। उसने समीर को पास बुलाया और उस खीरे को अपने नाजुक हाथों में थाम लिया। वह उसे ऊपर से नीचे तक सहलाने लगी और फिर धीरे से उस खीरे को अपने मुंह में ले लिया।
नैना का खीरा चूसने का अंदाज इतना निराला था कि समीर की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। वह उसके मुंह के अंदर की गर्माहट और जीभ के स्पर्श को महसूस कर रहा था। कुछ देर बाद समीर ने उसे रोका और उसे मेज पर लेटा दिया। अब असली खुदाई का वक्त आ चुका था। समीर ने नैना की टांगों को अपने कंधों पर रखा और अपने सख्त खीरे की नोक को उस रसीली खाई के द्वार पर टिका दिया। एक गहरे झटके के साथ समीर ने अपना पूरा खीरा नैना की गहराई में उतार दिया। नैना के मुंह से एक चीख निकली, जिसमें दर्द से ज्यादा आनंद का मिश्रण था।
खुदाई की प्रक्रिया अब लय पकड़ चुकी थी। समीर के हर झटके के साथ नैना के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और मेज की आवाज पूरे कमरे में गूंज रही थी। समीर ने नैना को पलटा और उसे पिछवाड़े से खोदने की स्थिति में ला दिया। पीछे से देखने पर नैना का पिछवाड़ा किसी पहाड़ी की तरह लग रहा था। समीर ने अपने खीरे को फिर से उसकी खाई में पीछे से डाला और तेजी से धक्के मारने लगा। नैना के हाथ मेज को मजबूती से पकड़े हुए थे और उसका पूरा बदन पसीने से तर-बतर हो चुका था। ‘हाँ समीर, मुझे ऐसे ही खोदो, बहुत मजा आ रहा है,’ वह चिल्लाई।
दोनों के शरीर से पसीने की बूंदें टपक कर एक-दूसरे में मिल रही थीं। समीर की गति अब बेकाबू हो चुकी थी, वह किसी जंगली शिकारी की तरह नैना की खाई की गहराई को नाप रहा था। नैना का रस अब भारी मात्रा में निकलने लगा था, जिससे खुदाई की आवाज और भी ज्यादा गीली और मादक हो गई थी। समीर को महसूस हुआ कि उसका रस निकलने वाला है, उसने अपनी रफ्तार और बढ़ा दी। अंत में, एक जोरदार झटके के साथ समीर ने अपना सारा गर्म रस नैना की गहरी खाई के अंदर उड़ेल दिया। नैना भी उसी पल अपने चरम पर पहुंची और दोनों एक-दूसरे पर ढह गए।
काफी देर तक दोनों उसी अवस्था में लेटे रहे, उनकी सांसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। नैना का चेहरा गुलाबी पड़ गया था और उसके बिखरे हुए बाल उसकी सुंदरता में चार चांद लगा रहे थे। समीर ने धीरे से नैना के माथे को चूमा और उसे अपनी बाहों में समेट लिया। उस छोटी सी दुकान के अंदर अब सिर्फ शांति और संतुष्टि का अहसास था। नैना ने उठकर अपने कपड़े ठीक किए और समीर की तरफ देखकर एक शरारती मुस्कान दी। उसे पता था कि अब वह हर हफ्ते किसी न किसी बहाने इस दुकान पर जरूर आएगी, क्योंकि समीर के उस जादुई खीरे ने उसे पूरी तरह से अपना बना लिया था।