जवान प्रोफेसर की चु@@ई—>कबीर आज पूरे पांच साल बाद अपनी पसंदीदा ट्यूशन टीचर सान्या के घर के सामने खड़ा था। सान्या उस समय कबीर की क्रश हुआ करती थी जब वह कॉलेज के पहले साल में था। सान्या की उम्र अब लगभग ३६ साल रही होगी, लेकिन उसकी खूबसूरती और उसके शरीर की बनावट आज भी कबीर की यादों में ताजा थी। कबीर ने जैसे ही घंटी बजाई, दरवाजा खुला और सामने सान्या खड़ी थी। उसने गहरे नीले रंग की शिफॉन की साड़ी पहन रखी थी, जिसमें से उसकी गोरी कमर और पेट का हिस्सा साफ झलक रहा था। सान्या ने कबीर को पहचान लिया और एक प्यारी सी मुस्कान के साथ उसे अंदर बुलाया। कबीर की नजरें सान्या के उभरे हुए अंगों पर टिक गई थीं, जिन्हें वह अपनी मेगजीन की भाषा में रसीले तरबूज कहता था।
सान्या का शरीर समय के साथ और भी अधिक कामुक और भरा हुआ हो गया था। उसकी रेशमी साड़ी उसके शरीर के हर मोड़ को बखूबी उभार रही थी। जब वह कबीर के लिए पानी लेने किचन की ओर मुड़ी, तो कबीर की नजर उसके भारी और गोल पिछवाड़े पर जाकर ठहर गई। उसकी चाल में एक अजीब सी खनक थी जो कबीर के भीतर सोई हुई इच्छाओं को जगा रही थी। सान्या के तरबूज साड़ी के ब्लाउज को फाड़कर बाहर आने को बेताब लग रहे थे और उनके बीच की गहरी घाटी कबीर को सम्मोहित कर रही थी। कबीर ने महसूस किया कि उसका अपना खीरा उसकी पैंट के भीतर अंगड़ाई लेने लगा है, जैसे वह सान्या की मौजूदगी को भांप गया हो।
ड्राइंग रूम में बैठते ही दोनों के बीच पुरानी यादों का सिलसिला शुरू हुआ। सान्या ने बताया कि उसके पति काम के सिलसिले में अक्सर शहर से बाहर रहते हैं और वह घर में काफी अकेलापन महसूस करती है। कबीर ने देखा कि सान्या की आंखों में एक प्यास थी, एक ऐसी झिझक जो किसी गहरे स्पर्श की तलाश में थी। बातों-बातों में कबीर सान्या के थोड़ा करीब खिसक आया। सान्या के शरीर से उठने वाली चमेली की खुशबू कबीर को मदहोश कर रही थी। कबीर ने धीरे से सान्या के हाथ पर अपना हाथ रखा, सान्या एक पल के लिए कांप उठी, लेकिन उसने हाथ हटाया नहीं। उसके मटर जैसे निप्पल अब साड़ी के कपड़े के ऊपर से ही अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगे थे, जो कबीर की बढ़ती उत्तेजना का संकेत दे रहे थे।
कबीर ने हिम्मत जुटाई और सान्या के चेहरे को अपने हाथों में ले लिया। सान्या की सांसें तेज हो गई थीं और उसकी छाती जोर-जोर से ऊपर-नीचे हो रही थी। कबीर ने धीरे से सान्या के होंठों को चखना शुरू किया, यह अहसास इतना गहरा था कि सान्या के मुंह से एक दबी हुई कराह निकल गई। दोनों एक-दूसरे की बाहों में बुरी तरह जकड़े हुए थे। सान्या की झिझक अब पूरी तरह खत्म हो चुकी थी, वह भी कबीर के बालों में अपनी उंगलियां फंसाकर उसे और करीब खींच रही थी। कबीर ने धीरे-धीरे सान्या की साड़ी के पल्लू को उसके कंधे से नीचे गिरा दिया, जिससे उसके विशाल तरबूज अब सिर्फ एक पतले से ब्लाउज की कैद में थे।
कबीर की उंगलियां अब सान्या के ब्लाउज के हुक खोलने लगी थीं। जैसे ही ब्लाउज खुला, सान्या के दूधिया तरबूज पूरी तरह आजाद हो गए। उनके ऊपर लगे छोटे-छोटे मटर उत्तेजना से सख्त हो चुके थे। कबीर ने अपना मुंह एक तरबूज पर रख दिया और उसे धीरे-धीरे सहलाने लगा। सान्या ने अपनी गर्दन पीछे की ओर झुका ली और जोर-जोर से सिसकारियां लेने लगी। कबीर का खीरा अब पूरी तरह से लोहे की रॉड की तरह सख्त हो चुका था और वह अपनी पैंट फाड़कर बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था। सान्या ने महसूस किया कि कबीर का खीरा उसके कूल्हों से टकरा रहा है, जिससे उसके शरीर में बिजली सी दौड़ गई।
अब सान्या की बारी थी, उसने कबीर की बेल्ट खोली और उसके खीरे को अपनी कोमल हथेलियों में ले लिया। खीरे की गरमाहट और उसकी कठोरता देखकर सान्या की आंखों में चमक आ गई। उसने बिना देर किए कबीर का खीरा मुंह में लेना शुरू कर दिया। कबीर के मुंह से एक लंबी आह निकली, उसे ऐसा लगा जैसे वह जन्नत के दरवाजे पर खड़ा हो। सान्या बड़े प्यार से खीरा चूस रही थी, जैसे वह दुनिया की सबसे स्वादिष्ट चीज का आनंद ले रही हो। कबीर की उंगलियां सान्या की घनी बालों वाली खाई के पास पहुंच गईं, जो अब पूरी तरह से गीली और फिसलन भरी हो चुकी थी।
कबीर ने सान्या को सोफे पर लिटाया और उसकी खाई में उंगली करने लगा। सान्या के शरीर में झटके लग रहे थे, वह अपनी कमर ऊपर उठा-उठा कर कबीर की उंगलियों का गहराई से स्वागत कर रही थी। खाई से निकलने वाला प्राकृतिक रस कबीर की उंगलियों को पूरी तरह भिगो चुका था। कबीर ने सान्या के दोनों पैरों को चौड़ा किया और अपने खीरे की नोक को उसकी खाई के द्वार पर रखा। सान्या ने कबीर की आंखों में देखा, उसकी आंखों में समर्पण और प्यार का अद्भुत मेल था। कबीर ने एक हल्का सा धक्का दिया और उसका खीरा आधा सान्या की तंग खाई के भीतर समा गया।
सान्या के मुंह से एक चीख निकली, लेकिन वह दर्द की नहीं, बल्कि एक असीम आनंद की थी। कबीर ने धीरे-धीरे सामने से खोदना (मिशनरी) शुरू किया। हर धक्के के साथ कबीर का खीरा सान्या की खाई की गहराई को नाप रहा था। सान्या की सिसकारियां अब तेज हो गई थीं, वह कबीर की पीठ को अपने नाखूनों से खुरच रही थी। पूरा कमरा उनके शरीर के टकराने की आवाजों और सान्या की कराहों से गूंज उठा था। कबीर ने सान्या को बीच-बीच में कसकर जकड़ा और उसके तरबूजों को बुरी तरह मसलना शुरू किया, जिससे सान्या और भी अधिक उत्तेजित हो गई।
थोड़ी देर बाद कबीर ने सान्या की पोजीशन बदली और उसे घुटनों के बल बैठाकर पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। यह पोजीशन सान्या को और भी ज्यादा गहराई दे रही थी। कबीर का खीरा जब सान्या की खाई की दीवारों से रगड़ खाता हुआ अंदर-बाहर हो रहा था, तो सान्या पागल सी होने लगी। वह बार-बार कह रही थी, “कबीर, और तेज खोदो, मुझे पूरी तरह खत्म कर दो!” कबीर की गति अब और तेज हो गई थी, उसका पसीना सान्या की पीठ पर गिर रहा था। खुदाई की यह प्रक्रिया अपनी चरम सीमा की ओर बढ़ रही थी, दोनों का शरीर पसीने से तर-बतर था और उनकी सांसें उखड़ रही थीं।
अंत में, कबीर को महसूस हुआ कि उसका खीरा अब और ज्यादा दबाव नहीं झेल सकता। उसने सान्या को फिर से सीधा लिटाया और अंतिम कुछ शक्तिशाली धक्के लगाए। सान्या की खाई ने कबीर के खीरे को कसकर जकड़ लिया और उसका शरीर बुरी तरह कांपने लगा। सान्या का रस निकलने लगा और ठीक उसी समय कबीर का खीरा भी अपना सारा गर्म लावा सान्या की खाई की गहराइयों में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए काफी देर तक वहीं पड़े रहे, उनकी धड़कनें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। सान्या ने कबीर के माथे को चूमा और कहा कि उसने सालों बाद खुद को इतना जीवित महसूस किया है। खुदाई के बाद की वह शांति और शरीर की शिथिलता उनके बीच के भावनात्मक जुड़ाव को और भी मजबूत कर गई थी।