गर्मी की वह दोपहर बहुत ही शांत और बोझिल थी, सूरज अपनी पूरी तपिश के साथ आग उगल रहा था। मैं अपने कॉलेज की छुट्टियों के सिलसिले में अपनी मौसी सरिता के घर आया हुआ था। मौसा जी किसी काम से शहर से बाहर गए थे, इसलिए घर में सिर्फ मैं और मौसी ही थे। मौसी की उम्र लगभग 35 वर्ष रही होगी, लेकिन उनकी काया और उनका आकर्षण किसी कम उम्र की युवती से भी कहीं अधिक था। उनके बदन का एक-एक अंग अपनी एक अलग ही दास्तां बयां करता था, जिसे देखकर किसी का भी मन डोल जाए।
मौसी के भारी और रसीले तरबूज उनके ब्लाउज के भीतर जैसे दम तोड़ रहे थे, उनकी गोलाई और कसावट इतनी जबरदस्त थी कि उन्हें देखते ही मेरा खीरा पजामे के भीतर मचलने लगता था। उनका रंग एकदम गोरा था और जब वह सूती साड़ी पहनती थीं, तो उनके शरीर के हर वक्र को साफ देखा जा सकता था। उनका पिछवाड़ा इतना गदराया हुआ और सुडौल था कि चलते समय उसमें होने वाली हलचल किसी को भी दीवाना बना सकती थी। उनकी चाल में एक अजीब सी लचक थी, जो सीधे दिल पर वार करती थी।
हम दोनों के बीच एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव था, लेकिन उस दिन की गर्मी ने हमारे भीतर की छिपी इच्छाओं को जगा दिया था। मौसी को शायद अपनी तन्हाई का एहसास था, और मेरी नज़रों में उनके प्रति बढ़ती दीवानगी को वह भी महसूस कर रही थीं। हम घंटों तक एक-दूसरे से बातें करते, लेकिन उन बातों में अब एक अलग ही तरह की गहराई और कामुकता आने लगी थी। उनकी सांसों की गरमाहट और मेरी नज़रों की बेताबी मिलकर एक ऐसा माहौल बना रही थीं जहाँ अब शब्दों की जगह स्पर्श लेने वाला था।
attraction की शुरुआत तब हुई जब मौसी रसोई में काम कर रही थीं और पसीने से उनका बदन भीग गया था। उनके ब्लाउज के पिछले हिस्से से झांकती उनकी नंगी पीठ और उस पर ढलकता पसीना देखकर मेरा सब्र जवाब देने लगा। मैं धीरे से उनके पीछे जाकर खड़ा हो गया और उनकी मदद करने के बहाने उनके करीब आया। जैसे ही मेरा हाथ गलती से उनकी कमर से टकराया, उनके शरीर में एक करंट सा दौड़ गया। वह पलभर के लिए ठिठक गईं, उनकी सांसें तेज चलने लगीं और उन्होंने मुड़कर मेरी आँखों में देखा, जहाँ सिर्फ और सिर्फ चाहत भरी थी।
मन में एक अजीब सा संघर्ष था, एक तरफ रिश्ता था और दूसरी तरफ वह प्रबल इच्छा जो हम दोनों को एक-दूसरे की ओर खींच रही थी। झिझक के बादल तब छंटे जब मौसी ने खुद मेरा हाथ पकड़कर उसे अपने तरबूज पर रख दिया। उनके तरबूजों की नरमी और गर्मी महसूस करते ही मेरा रोम-रोम कांप उठा। मैंने धीरे-धीरे उनके तरबूजों को सहलाना शुरू किया और उनके मटर साड़ी के पतले कपड़े के ऊपर से ही कड़े होने लगे थे। उनकी आँखों में अब शर्म नहीं, बल्कि एक प्यास थी जिसे बुझाने का वक्त आ गया था।
मैंने धीरे से उनके होठों का रसपान करना शुरू किया, उनकी सिसकारी मेरे कानों में संगीत की तरह बज रही थी। मैंने उनके कपड़ों को धीरे-धीरे उनके बदन से अलग किया, अब वह मेरे सामने अपनी पूरी प्राकृतिक सुंदरता में खड़ी थीं। उनके तरबूज अब आज़ाद थे और उनके मटर को छूते ही वह जोर-जोर से कराहने लगीं। मैंने अपना खीरा बाहर निकाला, जो उनकी सुंदरता को देखकर पूरी तरह से कड़ा और लंबा हो चुका था। मौसी की नज़रें जैसे ही मेरे खीरे पर पड़ीं, उनकी आँखों में चमक आ गई।
मौसी ने धीरे से मेरे खीरे को अपने हाथों में लिया और उसे सहलाने लगीं। फिर उन्होंने धीरे से मेरे खीरे को अपने मुंह में लिया और उसे चूसना शुरू किया। वह अहसास इतना जादुई था कि मुझे लगा मेरा रस अभी निकल जाएगा। काफी देर तक खीरा चूसने के बाद, उन्होंने मुझे बिस्तर पर लिटाया और मेरी खाई की तरफ अपना रुख किया। मैंने भी उनकी रेशमी खाई में अपनी उंगलियां डालीं और उंगली से खोदना शुरू किया। उनकी खाई पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और वहां से निकलने वाला रस हमारी उत्तेजना को और बढ़ा रहा था।
अब समय था असली खुदाई का। मौसी ने मुझे अपने ऊपर आने का इशारा किया और मैंने उन्हें सामने से खोदना शुरू किया। जैसे ही मेरा खीरा उनकी तंग खाई के भीतर गया, हम दोनों के मुंह से एक साथ आह निकली। वह एहसास इतना गहरा और भावनात्मक था कि हमें दुनिया की कोई खबर नहीं थी। मैं धीरे-धीरे अपनी रफ्तार बढ़ा रहा था और मौसी नीचे से अपनी कमर उछालकर मेरा साथ दे रही थीं। कमरे में सिर्फ हमारे शरीरों के टकराने की आवाज़ और मौसी की मदहोश करने वाली कराहें गूँज रही थीं।
थोड़ी देर बाद हमने अपनी पोजीशन बदली और मैंने उन्हें पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। उनका भारी पिछवाड़ा मेरे हाथों में था और मैं पूरी ताकत से खुदाई कर रहा था। मौसी बार-बार कह रही थीं, ‘और तेज… मुझे पूरी तरह से खोद डालो।’ उनकी इस बात ने आग में घी का काम किया। खुदाई की यह प्रक्रिया बहुत लंबी और दमदार थी, हमने घंटों तक एक-दूसरे के जिस्म का लुत्फ उठाया। अंत में, हम दोनों का रस एक साथ छूटा और हम पसीने से लथपथ एक-दूसरे की बाहों में गिर पड़े।
खुदाई के बाद की वह शांति बहुत ही सुकून देने वाली थी। हम दोनों निर्वस्त्र होकर एक-दूसरे से लिपटे हुए थे, मौसी का सिर मेरी छाती पर था और मेरी उंगलियां उनके बालों में खेल रही थीं। वह थकान और वह संतुष्टि हमारे चेहरों पर साफ झलक रही थी। उस दिन के बाद हमारा रिश्ता और भी गहरा हो गया था, जहाँ प्यार और कामुकता का एक अनोखा संगम था। वह दोपहर हमारे जीवन की सबसे हसीन और यादगार खुदाई बन गई थी, जिसे हम कभी नहीं भूल सकते थे।