रात की काली चादर ओढ़े राजधानी एक्सप्रेस अपनी पूरी रफ्तार से पटरी पर दौड़ रही थी। ट्रेन के केबिन में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था और बाहर केवल अंधेरा ही अंधेरा नजर आ रहा था। राज अपनी ऊपर वाली सीट पर बैठा खिड़की से बाहर के नजारे देखने की कोशिश कर रहा था, जबकि उसके सामने वाली सीट पर एक खूबसूरत अजनबी महिला बैठी थी।
उस महिला का नाम अंजलि था और वह गहरे नीले रंग की साड़ी में कयामत ढा रही थी। उसकी साड़ी का पल्लू बार-बार हवा के झोंकों से सरक रहा था, जिससे उसके सुडौल और भारी तरबूज साफ झलक रहे थे। राज चाहकर भी अपनी नजरें अंजलि के बदन से नहीं हटा पा रहा था। केबिन की मद्धम रोशनी में अंजलि की त्वचा सोने की तरह चमक रही थी।
अंजलि अपनी किताब पढ़ रही थी, लेकिन उसे राज की प्यासी निगाहों का बखूबी अहसास हो रहा था। उसने एक बार राज की तरफ देखा और अपनी आँखों के इशारे से उसे अपने पास आने का न्योता दिया। राज का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। ट्रेन के पहियों की आवाज के बीच अंजलि की सांसों की महक राज के दिमाग को पूरी तरह मदहोश करने लगी थी।
एसी की ठंडक बढ़ती जा रही थी और अंजलि ने धीरे से अपनी चादर ओढ़ने की कोशिश की, पर वह सफल नहीं हो पा रही थी। राज ने हिम्मत जुटाई और उसकी मदद करने के लिए नीचे उतरा। जैसे ही उसका हाथ अंजलि के हाथ से टकराया, दोनों के शरीरों में बिजली की एक तेज लहर दौड़ गई। उस स्पर्श में एक अजीब सा अपनापन और दबी हुई वासना घुली थी।
अंजलि ने राज का हाथ पकड़ा और उसे अपनी सीट पर बैठने का इशारा किया। राज की धड़कनें अब काबू से बाहर हो रही थीं। उसने देखा कि अंजलि की साड़ी के नीचे से उसके गोरे और मांसल पैर दिख रहे थे। अंजलि ने राज के कान के करीब आकर धीरे से फुसफुसाया कि क्या उसे भी ठंड लग रही है, उसकी आवाज में गहरा जादू था।
राज ने बिना कुछ कहे अंजलि को अपनी बाहों में भर लिया। अंजलि का जिस्म गर्म था और उसके तरबूज राज की छाती से सट गए थे। राज ने महसूस किया कि अंजलि के मटर ठंड और उत्तेजना के कारण उसकी चोली के अंदर सख्त हो गए हैं। उसने धीरे से अंजलि की गर्दन पर अपना चेहरा टिकाया और उसकी सौंधी खुशबू को अपनी सांसों में भरने लगा।
अंजलि ने भी राज का साथ दिया और उसके चेहरे को अपने हाथों में लेकर उसके होंठों को चूमना शुरू कर दिया। यह चुंबन गहरा और भावुक था, जिसमें दो अजनबियों की प्यास साफ नजर आ रही थी। राज का हाथ अब अंजलि की कमर से होते हुए उसकी साड़ी के भीतर पहुँच गया था, जहाँ उसे रेशम जैसी मुलायम त्वचा का अहसास हो रहा था।
राज ने अंजलि की साड़ी के पल्लू को पूरी तरह हटा दिया, जिससे उसके विशाल तरबूज अब केवल पतली चोली की कैद में थे। उसने अपनी उंगलियों से उन गोलों को सहलाया, जिससे अंजलि के मुँह से दबी हुई आह निकली। अंजलि ने राज के पेंट की चैन खोली और उसके सख्त हो चुके खीरा को बाहर निकाल लिया। राज का खीरा अब पूरी तरह तैयार था।
अंजलि ने नीचे झुककर राज के खीरा को अपने हाथ में लिया और उसे सहलाने लगी। वह राज की आंखों में देखकर मुस्कुराई और फिर धीरे-धीरे खीरा चूसना शुरू कर दिया। राज को ऐसा लगा जैसे वह जन्नत में पहुँच गया हो। अंजलि की जीभ का स्पर्श और उसके मुँह की गर्मी राज को पागल कर रही थी। वह अपनी उंगलियां अंजलि के बालों में फंसाकर आनंद लेने लगा।
खीरा चूसना खत्म करने के बाद अंजलि ने अपनी साड़ी और पेटीकोट उतार दिया। वह अब राज के सामने पूरी तरह निर्वस्त्र थी। उसके घने बाल उसकी जांघों के बीच की गहराई को ढंकने की कोशिश कर रहे थे। राज ने अपनी उंगलियां उसकी रेशमी खाई के पास ले जाकर उसे सहलाना शुरू किया। अंजलि की खाई अब पूरी तरह गीली हो चुकी थी और रस छोड़ रही थी।
राज ने अंजलि को अपनी गोदी में बिठाया और सामने से खोदना शुरू करने की तैयारी की। जैसे ही राज का खीरा अंजलि की तंग खाई के भीतर गया, अंजलि ने कसकर राज के कंधों को पकड़ लिया। उसकी आँखों में हल्का सा दर्द और बहुत सारी खुशी एक साथ दिखाई दे रही थी। केबिन की दीवारों के बीच उनकी सांसों की आवाज अब गूंजने लगी थी।
ट्रेन की हर हरकत के साथ राज अपनी खुदाई की रफ्तार बढ़ाता जा रहा था। अंजलि के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे, जिन्हें राज अपने हाथों से मसल रहा था। वह कभी अंजलि के मटर को अपने दांतों से काटता तो कभी उन्हें चूसता। सामने से खोदना अंजलि को बहुत पसंद आ रहा था और वह राज के साथ ताल से ताल मिलाकर झटके ले रही थी।
थोड़ी देर बाद राज ने अंजलि की पोजीशन बदली और उसे सीट पर झुका दिया। अब वह पिछवाड़े से खोदना शुरू करने वाला था। अंजलि का पिछवाड़ा बहुत ही भरा हुआ और सुडौल था। जैसे ही राज ने पीछे से अपना खीरा अंजलि की खाई में उतारा, अंजलि के मुँह से एक तेज चीख निकली जिसे उसने अपने हाथों से दबा लिया। यह आनंद बहुत गहरा था।
राज अब पूरी ताकत से खुदाई कर रहा था। उसके शरीर से पसीना बहकर अंजलि की पीठ पर गिर रहा था। अंजलि का पिछवाड़ा राज के हर झटके को महसूस कर रहा था। खुदाई की आवाज अब केबिन के सन्नाटे को चीर रही थी। अंजलि बार-बार राज से और तेज करने की विनती कर रही थी क्योंकि वह अब रस निकलने की दहलीज पर पहुँच चुकी थी।
राज ने अंजलि को फिर से सीधा किया और उसे अपनी बाहों में लेकर चूमते हुए अपनी खुदाई जारी रखी। दोनों के शरीर पूरी तरह पसीने से लथपथ थे। राज को महसूस हुआ कि अंजलि की खाई अब और भी गर्म और तंग हो रही है। अंजलि ने राज को जोर से जकड़ लिया और उसका पूरा शरीर कांपने लगा, उसका रस निकलने लगा था।
अंजलि के चरम सुख पर पहुँचते ही राज ने भी अपने खीरा को अंजलि की खाई की गहराई में उतार दिया। राज का खीरा भी तेजी से धड़कने लगा और कुछ ही पलों में उसका सारा रस निकलना शुरू हो गया। अंजलि की खाई राज के गर्म रस से भर गई। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए काफी देर तक वहीं पड़े रहे और अपनी सांसें सामान्य करने लगे।
केबिन में अब एक अजीब सी शांति थी, लेकिन उस शांति में भी एक गहरा संतुष्टि का भाव था। अंजलि ने राज के माथे को चूमा और उसके सीने पर अपना सिर रख दिया। राज ने महसूस किया कि यह केवल शारीरिक भूख नहीं थी, बल्कि दो अकेले मन का मिलन था जो इस सफर में एक-दूसरे के बेहद करीब आ गए थे।
बाहर सुबह की पहली किरण फूटने ही वाली थी और ट्रेन अगले स्टेशन की ओर बढ़ रही थी। अंजलि ने धीरे से अपने कपड़े पहने और राज को देखते हुए मुस्कुराई। उसने राज के कान में कहा कि यह रात वह कभी नहीं भूलेगी। राज ने भी उसे यकीन दिलाया कि यह खुदाई उसके जीवन की सबसे यादगार घटना रहेगी, जिसे वह हमेशा सहेज कर रखेगा।
स्टेशन आने पर अंजलि अपना सामान लेकर उतरने के लिए तैयार हुई। उसने राज को एक आखिरी बार देखा और भीड़ में ओझल हो गई। राज खिड़की के पास खड़ा उसे देखता रहा। ट्रेन फिर से चल पड़ी, लेकिन राज के पास अब उस अजनबी हसीना की यादें और उसके बदन की महक थी जो उसके सफर को हमेशा के लिए बदल चुकी थी।
राज ने अपनी सीट पर लेटकर उन पलों को फिर से याद किया। कैसे अंजलि के तरबूज उसके हाथों में थे और कैसे उसकी खाई ने राज के खीरा का स्वागत किया था। वह जान चुका था कि कुछ मुलाकातें बिना किसी नाम के भी जीवन भर का सुख दे जाती हैं। ट्रेन की पटरियों की आवाज अब उसे एक मधुर संगीत की तरह सुनाई दे रही थी।
अगले कुछ घंटों तक राज केवल अंजलि के बारे में सोचता रहा। वह सोच रहा था कि क्या वे फिर कभी मिलेंगे। लेकिन फिर उसे अहसास हुआ कि उस रात की खूबसूरती उसकी अजनबियत में ही थी। वह खुदाई, वह पसीना और वह रस निकलना अब एक हसीन ख्वाब बन चुके थे जिसे राज अपनी यादों के संदूक में हमेशा के लिए बंद कर चुका था।
दोपहर होते-होते राज अपने गंतव्य पर पहुँच गया। जब वह ट्रेन से उतरा, तो उसे महसूस हुआ कि वह अब पहले जैसा नहीं रहा। उस सफर ने उसे एक नई गहराई और संवेदना दी थी। उसने एक बार फिर उस नीली साड़ी वाली अंजलि को मन ही मन धन्यवाद दिया और अपनी नई मंजिल की ओर कदम बढ़ा दिए, आँखों में एक अलग सी चमक लिए।
जीवन का यह सफर भी उस ट्रेन की तरह ही है, जहाँ कई लोग मिलते हैं और बिछड़ जाते हैं। राज के लिए वह अजनबी मुलाकात केवल एक शारीरिक प्यास नहीं, बल्कि एक रूहानी जुड़ाव बन गई थी। उसने सीखा कि कैसे एक रात दो जिंदगियों को बिना किसी वादे के भी मुकम्मल कर सकती है और कैसे खुदाई का सुख आत्मा को तृप्त कर देता है।
अंततः राज ने अपने घर पहुँचकर डायरी निकाली और उस रात का हर एक पल विस्तार से लिख दिया। उसने लिखा कि कैसे अंजलि के मटर सख्त हुए थे और कैसे उसने पिछवाड़े से खोदना शुरू किया था। वह अपनी इस कहानी को हमेशा अपने पास रखना चाहता था ताकि जब भी वह अकेला महसूस करे, उस हसीन रात की गर्मी उसे फिर से तरोताजा कर दे।
पूरी दुनिया के लिए वह केवल एक ट्रेन का सफर था, लेकिन राज और अंजलि के लिए वह एक ऐसी दास्तां थी जिसे केवल वही दोनों समझ सकते थे। सड़कों पर चलते हुए भी राज को कभी-कभी अंजलि की वह महक महसूस होती थी, जो उसे याद दिलाती थी कि प्यार और वासना का यह संगम कितना पवित्र और गहरा हो सकता है।
समय बीतता गया, लेकिन उस रात की चमक कम नहीं हुई। राज अक्सर उस स्टेशन से गुजरते वक्त खिड़की से बाहर देखता था, शायद इस उम्मीद में कि वह अजनबी हसीना फिर कभी उसे उसी नीली साड़ी में दिख जाए। लेकिन वह अंजलि केवल उस एक रात की मल्लिका थी, जिसने राज के खीरा को जन्नत की सैर कराई थी और गायब हो गई थी।
—> रात की काली चादर ओढ़े राजधानी एक्सप्रेस अपनी पूरी रफ्तार से पटरी पर दौड़ रही थी। ट्रेन के केबिन में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था और बाहर केवल अंधेरा ही अंधेरा नजर आ रहा था। राज अपनी ऊपर वाली सीट पर बैठा खिड़की से बाहर के नजारे देखने की कोशिश कर रहा था, जबकि उसके सामने वाली सीट पर एक खूबसूरत अजनबी महिला बैठी थी।