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नयना साली और अहसासों की खुदाई

नयना साली और अहसासों की खुदाई—>मानसून की वह शाम बहुत ही जादुई और रहस्यमयी थी, जब आसमान से गिरती मूसलाधार बूंदों ने सूखी मिट्टी को एक नई और सोंधी महक से सराबोर कर दिया था। मैं और मेरी साली नयना हवेली के उस पुराने और वीरान हिस्से में खड़े थे जिसे वर्षों से किसी ने नहीं खोला था, और वहाँ की दीवारों पर जमी धूल की परतों को हटाते हुए हमें ऐसा लग रहा था जैसे हम गुजरे हुए वक्त के किसी दबे हुए राज को कुरेद रहे हों। नयना की आँखों में एक अजीब सी चमक और उत्साह था, वह अपनी साड़ी के पल्लू को बार-बार संभालते हुए उन पुरानी नक्काशीदार दीवारों को बड़े गौर से देख रही थी, जैसे वह उनमें अपनी रूह का कोई हिस्सा ढूँढ रही हो, और बाहर गिरती बिजली की गड़गड़ाहट कमरे के सन्नाटे को और भी गहरा बना रही थी।

नयना के व्यक्तित्व में एक ऐसी प्राकृतिक कशिश थी जिसे शब्दों में बांधना लगभग असंभव था, उसका वह सुडौल शरीर और साड़ी पहनने का वह कलात्मक सलीका उसे किसी साक्षात अप्सरा जैसा रूप दे रहा था। उसने एक गहरे गले का काले रंग का ब्लाउज पहना हुआ था, जिससे उसकी सुराहीदार गर्दन और नाजुक कंधों की मखमली चमक साफ झलक रही थी, जो किसी भी देखने वाले के दिल में एक मीठा सा दर्द पैदा करने के लिए काफी थी। जब वह झुककर पुरानी दीवारों पर जमी काई और मिट्टी की खुदाई जैसी सफाई कर रही थी, तब उसकी कमर का वह हल्का सा लचीलापन और उसकी त्वचा की कंचन सी रंगत मेरी धड़कनों को एक बेकाबू रफ्तार दे रही थी, जिसे मैं अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद शांत नहीं कर पा रहा था।

हमारे बीच का रिश्ता हमेशा से ही हंसी-मजाक और सम्मान का रहा था, लेकिन उस दिन हवेली के उस एकांत कोने में हमारे बीच एक अनकहा और गहरा भावनात्मक जुड़ाव पनप रहा था। हम पुरानी कलाकृतियों और इतिहास के बारे में बातें कर रहे थे, लेकिन नयना की आवाज़ में एक ऐसी नरमी और गहराई थी जो सीधे मेरे दिल के तारों को झंकृत कर रही थी। उसने अचानक मेरी ओर मुड़कर देखा और अपनी बड़ी-बड़ी कजरारी आँखों से मेरे भीतर झाँकते हुए कहा, ‘जीजू, क्या आपको नहीं लगता कि कुछ चीज़ें वक्त की परतों के नीचे दबी ही अच्छी लगती हैं, या फिर उन्हें बाहर लाना ज़रूरी होता है?’ उसकी इस बात में एक ऐसा दार्शनिक संकेत था जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या वह भी वही महसूस कर रही है जो मेरे मन में चल रहा था।

आकर्षण का वह बीज शायद बहुत पहले ही बोया जा चुका था, लेकिन उस शाम की तन्हाई और बारिश की मदहोश करने वाली खुशबू ने उसे एक विशाल वृक्ष में तब्दील कर दिया था। मैं नयना के करीब खड़ा था और उसकी सांसों की गर्माहट को अपनी त्वचा पर महसूस कर सकता था, जो हवा में घुली ठंडक के बीच एक अजीब सी राहत दे रही थी। वह अपनी उँगलियों से दीवार पर उकेरी गई एक पुरानी आकृति को सहला रही थी, और मैं उसकी उन नाजुक उँगलियों की हरकत को देख रहा था, यह जानते हुए भी कि हमारा यह आकर्षण समाज की नज़रों में शायद सही न हो, पर दिल की पुकार को अनसुना करना उस पल नामुमकिन लग रहा था।

मेरे मन में एक भयानक संघर्ष चल रहा था, एक तरफ मर्यादा की दीवार थी और दूसरी तरफ नयना के प्रति बढ़ती हुई वह तीव्र इच्छा जो मुझे उसकी ओर खींच रही थी। नयना ने भी शायद मेरी इस बेचैनी को भांप लिया था, क्योंकि उसने अपना हाथ दीवार से हटाकर धीरे से नीचे किया, और उसकी उँगलियाँ दुर्घटनावश मेरी हथेली से छू गईं। वह स्पर्श इतना बिजली जैसा था कि मेरे पूरे शरीर में एक सिहरन दौड़ गई, और हम दोनों ने ही एक-दूसरे की नज़रों में वह झिझक और वह अनकही स्वीकारोक्ति देख ली थी जो अब किसी भी पर्दे की मोहताज नहीं रह गई थी।

वह पहला स्पर्श भले ही अनजाने में हुआ था, लेकिन उसने हमारे बीच की सारी दूरियों को एक ही पल में मिटा दिया था, जैसे सूखे रेगिस्तान में बारिश की पहली बूंद गिर गई हो। नयना का हाथ अभी भी मेरे हाथ के करीब था, और मैंने धीरे से अपनी उँगलियों को उसकी हथेली पर रखा, तो उसने अपनी आँखें मूंद लीं और एक लंबी, गहरी सांस ली। उसकी वह सांस एक आह की तरह थी, जिसमें बरसों का इंतज़ार और उस पल की तड़प दोनों शामिल थे, और कमरे में फैली उस हल्की सी रोशनी में उसका चेहरा शर्म से गुलाबी हो उठा था, जो उसकी सुंदरता को और भी ज्यादा बढ़ा रहा था।

धीरे-धीरे हमारी निकटता बढ़ने लगी, जैसे दो नदियाँ एक-दूसरे में समाने के लिए व्याकुल हों, और हवा में अब केवल हमारी धड़कनों का शोर सुनाई दे रहा था। मैंने नयना के चेहरे के पास आए उसके गीले बालों की एक लट को धीरे से अपने हाथ से हटाया, तो उसकी पलकें कांपने लगीं और उसने अपनी गर्दन को थोड़ा सा झुका लिया। वह पल इतना संवेदनशील था कि हम दोनों ही एक-दूसरे की सांसों की लय को महसूस कर रहे थे, और उस ठंडे कमरे में हमारे शरीरों से निकलने वाली गर्माहट एक सुरक्षा कवच की तरह हमें चारों ओर से घेरे हुए थी।

नयना ने दबी आवाज़ में मेरा नाम पुकारा, ‘जीजू…’, और उसकी उस आवाज़ में इतनी मिठास और समर्पण था कि मेरा सारा संयम धरा का धरा रह गया। मैंने उसके दोनों हाथों को अपने हाथों में ले लिया और उसे धीरे से अपनी ओर खींचा, तो वह बिना किसी विरोध के मेरे सीने से लग गई, जैसे उसे अपनी मंज़िल मिल गई हो। उसकी साड़ी का रेशमी अहसास और उसकी त्वचा से आती वह चन्दन जैसी महक मुझे एक ऐसी दुनिया में ले जा रही थी जहाँ सिर्फ हम दोनों थे, और बाहर की दुनिया का कोई अस्तित्व नहीं रह गया था।

पूरी घनिष्ठता की उस दहलीज पर खड़े होकर हमने एक-दूसरे की रूह को महसूस किया, जहाँ जिस्मों के मिलन से पहले हमारे मन एक हो चुके थे। मैंने नयना के माथे को चूमा, तो उसने अपनी बाहें मेरे गले में डाल दीं और मुझे और भी कसकर थाम लिया, जैसे वह इस पल को हमेशा के लिए रोक लेना चाहती हो। उसकी आँखों में आंसू की एक छोटी सी बूंद चमक रही थी, जो खुशी और इस गहरे जुड़ाव की गवाह थी, और हमने बिना कुछ कहे एक-दूसरे को वह सब कुछ कह दिया जो शब्दों के माध्यम से कभी मुमकिन नहीं था।

प्यार की उस पावन प्रक्रिया में हम दोनों ही बहते चले गए, जहाँ हर स्पर्श एक नई कविता लिख रहा था और हर आह एक संगीत की तरह गूँज रही थी। नयना की कोमलता और मेरा उसे सुरक्षित रखने का वह भाव, दोनों मिलकर एक ऐसी पूर्णता का निर्माण कर रहे थे जो बहुत ही दुर्लभ और पवित्र थी। हमारे बीच का वह रोमांस कोई शारीरिक क्रिया मात्र नहीं था, बल्कि वह दो तड़पते हुए दिलों का एक शांत किनारा पा लेना था, जहाँ पसीने की हर बूंद और बढ़ती हुई हर धड़कन एक-दूसरे के प्रति अगाध प्रेम का प्रमाण दे रही थी।

उस गहरी और भावनात्मक निकटता के बाद जब हम एक-दूसरे की बाहों में सुस्ता रहे थे, तो मन में एक अद्भुत शांति का संचार हो रहा था, जैसे कोई बड़ा बोझ उतर गया हो। नयना का सिर अभी भी मेरे कंधे पर था और वह धीरे-धीरे अपनी उँगलियों से मेरी हथेली पर लकीरें बना रही थी, उसकी खामोशी में भी एक तृप्ति और संतुष्टि झलक रही थी। हमने महसूस किया कि यह रिश्ता अब पहले जैसा कभी नहीं रहेगा, इसमें एक ऐसी गहराई आ गई है जो हमें ताउम्र एक-दूसरे से जोड़ कर रखेगी, चाहे दुनिया हमें किसी भी नाम से पुकारे।

बाहर बारिश अब हल्की फुहारों में तब्दील हो चुकी थी और बादलों के बीच से चाँदनी की एक पतली सी किरण उस पुरानी हवेली की खिड़की से भीतर आ रही थी। नयना ने मेरी ओर देखकर एक प्यारी सी मुस्कान दी और कहा, ‘आज हमने सिर्फ इस हवेली की नहीं, बल्कि अपने दिलों की भी खुदाई की है, जहाँ सिर्फ प्यार ही प्यार छुपा था।’ उसकी उस बात ने कहानी को एक पूर्णता दे दी, और हम दोनों हाथ में हाथ डाले उस पुरानी यादों के कमरे से बाहर निकले, यह जानते हुए कि हमारे जीवन का यह नया अध्याय अब और भी खूबसूरत होने वाला है।

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