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नाप की चु@@ई


रुचि अपने तीसवें पड़ाव पर थी, एक ऐसी उम्र जहाँ जीवन की एकरसता कभी-कभी बेहद चुभने लगती है। उसकी शादी को सात साल हो चुके थे, और अब वो सिर्फ़ एक दिनचर्या का हिस्सा बनकर रह गई थी। पति, राहुल, अपने काम में व्यस्त और रात को थके हुए घर लौटते, और उन दोनों के बीच की शारीरिक निकटता भी अब सिर्फ़ एक कर्तव्य बन कर रह गई थी। रुचि को याद भी नहीं था कि उसने आखिरी बार कब किसी को अपनी ओर आकर्षित होते देखा था या कब खुद उसने किसी के प्रति वैसी उत्कट इच्छा महसूस की थी। उसे अपने भीतर एक खालीपन महसूस होता था, एक ऐसी प्यास जो बुझने का नाम नहीं लेती थी।

एक दिन उसे एक नई साड़ी के साथ एक सुंदर ब्लाउज सिलवाने की ज़रूरत पड़ी। उसका पुराना दरजी शहर से बाहर चला गया था। उसकी सहेली ने उसे ‘दीपक टेलर्स’ का पता दिया, जो शहर के एक शांत कोने में एक छोटी सी दुकान थी। “उसका काम बहुत अच्छा है, और दाम भी सही,” उसकी सहेली ने कहा था। रुचि झिझकते हुए दीपक की दुकान पर पहुँची। दुकान छोटी थी, लेकिन साफ़-सुथरी। पुराने ज़माने की एक सिलाई मशीन कोने में रखी थी, और चारों ओर रंग-बिरंगे कपड़ों के थान सलीके से जमे हुए थे। कांच की अलमारी में सिले हुए डिज़ाइनर ब्लाउज और कुर्ते रखे थे।

जैसे ही उसने दुकान में कदम रखा, एक पतले, लेकिन मज़बूत डील-डौल वाला आदमी अंदर से निकला। उसकी उम्र लगभग रुचि के जितनी ही होगी, शायद कुछ साल बड़ा। आँखों में एक अजीब सी चमक थी और होठों पर एक हल्की, आत्मविश्वास भरी मुस्कान। यह दीपक था। उसने बड़ी विनम्रता से रुचि का अभिवादन किया। “नमस्ते मैम, बताइए मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ?” उसकी आवाज़ शांत और गहरी थी, जो रुचि को अंदर तक छू गई। रुचि ने उसे अपनी साड़ी दिखाई और ब्लाउज के डिज़ाइन के बारे में बताया। दीपक ने ध्यान से सुना, बीच-बीच में अपनी भौंहें चढ़ाकर सोचता रहा। रुचि को उसकी एकाग्रता अच्छी लगी। उसने महसूस किया कि दीपक की आँखें अक्सर उसकी ओर उठ जाती थीं, एक क्षण के लिए ठहरती थीं, फिर काम पर लौट आती थीं। लेकिन वो एक क्षण रुचि के दिल में एक अजीब सी सिहरन छोड़ जाता।

उसने नाप लेने के लिए उसे एक छोटी सी जगह पर बुलाया, जहाँ एक पुराना पर्दा लगा हुआ था। रुचि ने कुछ झिझकते हुए साड़ी का पल्लू हटाया और ब्लाउज उतारने लगी। जब उसने ब्लाउज उतारा, तो दीपक की आँखें एक पल के लिए उसके तरबूज पर टिकीं। रुचि को लगा कि उसके गाल गरम हो गए। दीपक ने अपने हाथ में नापने वाला फीता लिया और उसके करीब आया। उसकी साँसों की गर्मी रुचि की गर्दन पर महसूस हुई। “मैम, थोड़ा सीधा खड़ा होना पड़ेगा,” उसने धीमे से कहा। उसके हाथ उसकी कमर पर आए, सिर्फ़ नाप लेने के लिए, लेकिन रुचि को लगा जैसे बिजली का एक तेज़ झटका लगा हो। उसकी उंगलियाँ उसकी त्वचा को छू गईं, और एक हल्की सी गुदगुदी हुई। उसने उसकी पीठ का नाप लिया, फिर उसके तरबूज के ऊपर से फीता घुमाया। इस बार, उसकी उंगलियाँ हल्की सी रगड़ खाती हुई उसके तरबूज के किनारे से गुज़रीं। रुचि की साँसें तेज़ हो गईं। उसने आँखें बंद कर लीं, उस एहसास को अपने भीतर उतरते हुए महसूस कर रही थी। “ठीक है, मैम,” दीपक ने कहा, “अगले हफ़्ते आप ट्रायल के लिए आ सकती हैं।”

रुचि घर लौट आई, लेकिन दीपक और उसकी दुकान का दृश्य उसके मन से नहीं हट रहा था। उसकी हर स्पर्श, उसकी हर नज़र, उसके ज़हन में बार-बार घूम रही थी। उसे लगा जैसे कई सालों बाद किसी ने उसे एक औरत के रूप में देखा था, उसे महसूस किया था। अगले हफ़्ते वह फिर ट्रायल के लिए गई। ब्लाउज थोड़ा ढीला था, दीपक ने कहा। “मुझे थोड़ा और नाप लेना होगा,” उसने कहा। इस बार वह और भी करीब आया। उसने उसके कंधों को छुआ, फिर उसकी कमर पर फिर से हाथ रखा। रुचि की धड़कनें तेज़ हो गईं। उसने महसूस किया कि उसके तरबूज दीपक की बांह को छू रहे थे। वह पिन लगा रहा था, और जानबूझकर उसकी त्वचा को छू रहा था। एक पल के लिए उसकी उंगलियाँ उसके मटर पर टिकीं, और रुचि का शरीर काँप गया। उसकी आँखें दीपक से मिलीं, और इस बार दीपक की आँखों में एक गहरी, अनकही प्यास थी। रुचि को लगा जैसे उसका शरीर आग पकड़ रहा हो।

“मैम, मुझे लगता है कि आपको एक और फिटिंग के लिए आना होगा,” दीपक ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कंपन थी। रुचि ने बिना कुछ बोले सहमति में सर हिलाया। वह समझ गई थी, और दीपक भी समझ गया था। अगले दिन रुचि फिर दीपक की दुकान पर गई। इस बार, उसने जानबूझकर दोपहर का ऐसा समय चुना था जब दुकान में कोई ग्राहक नहीं होता था। दुकान में घुसते ही उसने देखा कि दीपक अकेला बैठा एक पत्रिका पढ़ रहा था। उसने उसे देखा, और एक धीमी, अर्थपूर्ण मुस्कान उसके चेहरे पर फैल गई। “आइये मैम,” उसने कहा, और धीरे से उठकर दुकान का दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया। रुचि का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। दुकान में हल्की सी धूप खिड़की से अंदर आ रही थी, जिससे माहौल और भी अंतरंग लग रहा था।

दीपक उसके करीब आया। उसने कुछ नहीं कहा, बस उसकी आँखों में देखा। उसकी आँखों में वो सारी बातें थीं जो उनके बीच अनकही रह गई थीं। रुचि ने धीरे से अपनी पलकें झुकाईं, एक मौन स्वीकृति। दीपक ने अपना हाथ बढ़ाया और धीरे से रुचि के गाल को छुआ। उसकी उंगलियाँ गरम थीं। रुचि को लगा जैसे उसके शरीर में एक करंट दौड़ गया हो। वह धीरे से उसके होंठों की ओर झुका, और एक नरम, फिर एक गहरी चुंबन उसकी होठों पर रख दी। रुचि ने आँखें बंद कर लीं, उस चुंबन के स्वाद में डूब गई। उसके हाथों ने दीपक की गर्दन को घेर लिया, और वह उसे और करीब खींचने लगी। दीपक के हाथ उसकी कमर पर कस गए, और उसने उसे अपनी ओर दबा लिया। उनके शरीर एक दूसरे से चिपक गए, और रुचि को अपने शरीर में एक नई ऊर्जा महसूस हुई।

दीपक ने धीरे से उसके साड़ी का पल्लू हटाया, फिर उसकी साड़ी की गांठ खोली। साड़ी ज़मीन पर गिर गई। फिर उसने उसके ब्लाउज के हुक खोले। रुचि ने अपनी बाहें ऊपर उठाईं, और ब्लाउज भी उसके शरीर से अलग हो गया। उसके तरबूज हवा में आज़ाद हो गए, पूरी तरह से गोल और मोहक। दीपक की नज़रें उन पर टिकीं, और उसने एक गहरी साँस ली। उसने धीरे से अपने होंठ उसके एक तरबूज पर रखे और उसे चाटना शुरू कर दिया। रुचि की साँसें अटक गईं। उसने कभी नहीं सोचा था कि किसी का चाटना इतना गहरा और उत्तेजक हो सकता है। दीपक की जीभ उसके मटर पर घूम रही थी, कभी धीरे से, कभी ज़ोर से, और रुचि को लगा जैसे उसके शरीर में कहीं दूर कोई तार बजने लगा हो। वह अपने सिर को पीछे की ओर झुकाकर आहें भरने लगी। दीपक बारी-बारी से दोनों तरबूज को चाट रहा था, उन्हें अपने मुँह में भर रहा था, और रुचि का शरीर दर्द और आनंद के मिश्रण से काँप रहा था।

उसके हाथ उसकी पेटीकोट पर गए, और उसने उसे भी उतार दिया। अब रुचि सिर्फ़ अपनी पैंटी में थी। दीपक ने उसे उठाया और धीरे से सिलाई के मेज़ पर लिटा दिया। मेज़ ठंडा था, लेकिन रुचि के शरीर की गर्मी उसे कुछ महसूस नहीं होने दे रही थी। दीपक ने उसकी पैंटी को भी खींचकर उतार दिया। उसकी खाई उसके सामने थी, गुलाबी और रसीली। दीपक ने फिर से एक गहरी साँस ली, जैसे कोई प्यासा अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी को देखता है। वह उसकी टांगों के बीच बैठ गया, और उसकी खाई को चाटना शुरू कर दिया। रुचि को लगा जैसे उसके पूरे शरीर में आग लग गई हो। दीपक की जीभ उसकी खाई के हर हिस्से को एक्सप्लोर कर रही थी, उसे गुदगुदा रही थी, उसे उत्तेजित कर रही थी। “आह्ह्ह्ह… दीपक,” रुचि फुसफुसाई, उसका शरीर मेज़ पर बल खा रहा था।

दीपक ने अपनी एक उंगली उसकी खाई में डाली, फिर दूसरी। उसने अपनी उंगलियों से उसकी खाई के अंदर गहराई तक `खाई में उंगली` करना शुरू कर दिया। रुचि को लगा जैसे उसके सिर में कोई विस्फोट हो रहा हो। वह ज़ोरों से चीख़ी, उसका शरीर मेज़ पर छटपटाने लगा। वह अपनी कमर को ऊपर उठाने लगी, और दीपक की उंगलियाँ उसकी खाई के सबसे संवेदनशील हिस्से को छू रही थीं। उसे लगा जैसे वह `रस निकलना` के कगार पर पहुँच रही थी। उसकी आँखें बंद थीं, और उसके मुँह से सिर्फ़ आहें निकल रही थीं।

कुछ देर बाद, जब रुचि का शरीर पूरी तरह से उत्तेजना से भर गया था, दीपक उठा। उसने अपनी पैंट खोली और अपना खीरा बाहर निकाला। रुचि की नज़र उसके खीरे पर पड़ी – मज़बूत, सीधा, और लाल। उसने कभी ऐसा खीरा नहीं देखा था, इतना जीवंत, इतना आमंत्रित। दीपक ने अपने खीरे को रुचि की खाई के मुहाने पर रखा। रुचि ने अपनी टांगें खोलीं, और उसे अंदर आने का इशारा किया। दीपक ने एक धीमी, गहरी साँस ली, और धीरे से अपने खीरे को रुचि की खाई में धकेलना शुरू कर दिया। पहले एक धीमा दबाव, फिर धीरे-धीरे पूरा खीरा उसकी खाई में उतर गया। रुचि की आँखें चौड़ी हो गईं, एक मीठी सी जलन और फिर एक अद्भुत आनंद का एहसास। “आह्ह्ह्ह…” वह फुसफुसाई।

दीपक ने धीरे-धीरे `खोदना` शुरू किया। पहले धीमी गति से, उसके शरीर को उसके खीरे से तालमेल बिठाने का मौका देते हुए। रुचि ने अपनी टांगें उसकी कमर के चारों ओर कस लीं, उसे और करीब खींचने की कोशिश कर रही थी। `खुदाई` की गति बढ़ती गई। दीपक उसके ऊपर झुक गया, और उसके होंठों को फिर से चूमने लगा, जबकि उसके खीरे उसकी खाई में तेज़ी से `खोदना` कर रहे थे। हर धक्के के साथ, रुचि को लगा जैसे उसका शरीर एक नए आयाम में पहुँच रहा था। मेज़ चरमरा रहा था, और उनके शरीर से पसीने की बूंदें टपकने लगी थीं। उनके शरीर एक दूसरे से टकराने लगे थे, और दुकान में सिर्फ़ उनके शरीर के टकराने की आवाज़ और रुचि की मदहोश कर देने वाली आहें गूँज रही थीं।

रुचि अपनी कमर को ऊपर उठाने लगी, दीपक की गति का साथ दे रही थी। उसे लगा जैसे उसके भीतर `रस निकलना` की एक बाढ़ आने वाली थी। वह अपनी आँखें बंद कर ली, और अपने अंदर के उस बढ़ते हुए तूफान को महसूस करने लगी। दीपक ने अपनी गति और भी तेज़ कर दी, और एक अंतिम, ज़ोरदार `खुदाई` के साथ, रुचि ने एक ज़ोरदार चीख़ मारी, और उसका पूरा शरीर काँप गया। `रस निकलना` की लहरें उसके पूरे शरीर में फैल गईं, एक अद्भुत, अनियंत्रित मुक्ति का एहसास। दीपक भी उसी क्षण चरम पर पहुँच गया, उसका शरीर रुचि के ऊपर ढीला पड़ गया, उसकी साँसें तेज़ हो गईं।

वे कुछ देर तक उसी अवस्था में मेज़ पर लेटे रहे, उनकी साँसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। दुकान में फिर से चुप्पी छा गई, केवल उनकी भारी साँसों की आवाज़। रुचि ने अपनी आँखें खोलीं और दीपक की आँखों में देखा। उन आँखों में अब कोई प्यास नहीं थी, सिर्फ़ एक गहरी संतुष्टि और आभार था। उसने धीरे से अपने होंठों पर एक मुस्कान लाई। दीपक ने उसके गाल पर एक हल्का चुंबन दिया। उन्होंने एक-दूसरे को बिना कुछ बोले उठाया। दीपक ने उसके कपड़े पहनने में मदद की, उनकी आँखें बार-बार एक-दूसरे से मिल रही थीं, एक नए रहस्य, एक नए रिश्ते का संकेत दे रही थीं। रुचि ने अपने कपड़े पहने और दुकान से बाहर निकल गई, उसका शरीर अभी भी उस आनंद से थरथरा रहा था। वह जानती थी कि यह सिर्फ़ एक शुरुआत थी, और वह अगले “ट्रायल” के लिए इंतज़ार नहीं कर सकती थी।

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