निशा साली की चु@@ई—>
उस दोपहर की तपिश ने पूरे घर में एक अजीब सी बेचैनी भर दी थी। समीर अपने कमरे में अकेला लेटा हुआ था और उसकी पत्नी शिखा अपनी सहेली की शादी में शहर से बाहर गई हुई थी। तभी अचानक दरवाजे की घंटी बजी और जब समीर ने दरवाजा खोला, तो सामने उसकी साली निशा खड़ी थी। निशा की उम्र करीब 28 साल थी और उसकी शारीरिक बनावट ऐसी थी कि कोई भी मर्द उसे एक बार देख ले तो मदहोश हो जाए। उसने हल्के नीले रंग की शिफॉन की साड़ी पहनी हुई थी, जिसमें से उसकी गोरी कमर और उसका गहरा बदन साफ झलक रहा था। समीर ने उसे अंदर बुलाया, लेकिन उसके मन में एक अजीब सी हलचल शुरू हो गई थी क्योंकि निशा आज कुछ ज्यादा ही आकर्षक और मादक लग रही थी।
निशा सोफे पर बैठी तो उसकी साड़ी का पल्लू थोड़ा नीचे खिसक गया, जिससे उसके उभरे हुए रसीले तरबूज आधे से ज्यादा साफ नजर आने लगे। समीर की नजरें चाहकर भी उन विशाल तरबूजों से नहीं हट रही थीं, जो उसकी ब्लाउज की तंग सीमाओं को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। निशा का रंग दूध जैसा सफेद था और उसकी बनावट बहुत ही कामुक थी; उसके पीछे का पिछवाड़ा इतना गठीला और बड़ा था कि साड़ी में भी उसकी गोलाई साफ पता चल रही थी। समीर ने जब उसे पानी का गिलास दिया, तो उनके हाथ एक-दूसरे से छुए और उस एक स्पर्श ने समीर के पूरे शरीर में बिजली जैसी दौड़ पैदा कर दी। निशा ने भी समीर की आंखों में देखा और उसकी नजरों में एक ऐसी प्यास थी जिसे समीर ने पहले कभी नहीं देखा था।
बातों-बातों में निशा ने बताया कि उसका पति उसे वक्त नहीं देता और वह अक्सर अकेलापन महसूस करती है। समीर ने उसका हाथ थाम लिया और धीमे स्वर में कहा कि इतनी खूबसूरत औरत को अकेला छोड़ना गुनाह है। निशा की सांसें तेज चलने लगीं और उसके तरबूज ऊपर-नीचे होने लगे, जिससे उनके ऊपर मौजूद मटर साफ उभर आए। समीर का खीरा अब धीरे-धीरे अपनी पैंट के अंदर सिर उठाने लगा था और उसमें जबरदस्त तनाव आ गया था। कमरे का माहौल अब पूरी तरह से बदल चुका था और दोनों के बीच का भावनात्मक जुड़ाव अब शारीरिक आकर्षण में तब्दील हो रहा था। समीर ने धीरे से अपना हाथ निशा की कमर पर रखा, जो रेशम जैसी मुलायम थी और उसे अपनी ओर खींच लिया।
निशा ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि वह समीर के और करीब आ गई और अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया। समीर ने अपनी उंगलियों से निशा के चेहरे को सहलाया और फिर उसके होंठों का रस पीने लगा। दोनों एक-दूसरे की बाहों में कसते चले गए और समीर का हाथ धीरे-धीरे निशा की साड़ी के अंदर जाने लगा। जैसे ही उसका हाथ निशा के चिकने पेट से होता हुआ ऊपर पहुँचा, उसने उन भारी और नरम तरबूजों को अपनी हथेलियों में भर लिया। निशा के मुँह से एक धीमी कराह निकली और उसने समीर के बाल पकड़ लिए। समीर अब उन तरबूजों को बुरी तरह मसलने लगा था और उसके अंगूठे बार-बार उन मटरों को सहला रहे थे, जिससे निशा कामुकता के चरम पर पहुँचने लगी थी।
समीर ने अब निशा को गोद में उठाया और बेडरूम की ओर ले गया, जहाँ की मद्धम रोशनी उनके इरादों को और भी गहरा कर रही थी। बिस्तर पर लिटाते ही समीर ने निशा की साड़ी और ब्लाउज को शरीर से अलग कर दिया, जिससे उसका पूरा कुंवारा बदन समीर की नजरों के सामने आ गया। निशा की गहरी और रसीली खाई अब पूरी तरह से बेपर्दा थी, जिसके चारों ओर थोड़े-थोड़े बाल मौजूद थे जो उसकी सुंदरता को और बढ़ा रहे थे। समीर ने अपना चेहरा उसकी जांघों के बीच ले जाकर उस खाई को निहारना शुरू किया, जहाँ से हल्का-हल्का पानी निकल रहा था। उसने अपनी जीभ से उस खाई को चाटना शुरू किया, जिसे महसूस करते ही निशा बिस्तर पर तड़पने लगी और अपनी कमर ऊपर उठाने लगी।
निशा की सिसकियां अब पूरे कमरे में गूँज रही थीं और वह बार-बार कह रही थी कि समीर उसे और तड़पाना बंद करे। समीर ने अब अपनी पैंट उतारी और अपना फन फैलाए हुए आठ इंच का सख्त खीरा निशा के सामने कर दिया। निशा ने जैसे ही उस विशाल खीरे को देखा, उसकी आँखें फटी की फटी रह गई और उसने तुरंत उस खीरे को अपने मुँह में ले लिया। वह बड़े ही चाव से उस खीरे को चूसने लगी, जैसे वह कोई रसीली कुल्फी हो। समीर को अपनी नसों में खून का प्रवाह तेज महसूस हो रहा था और जब निशा ने उसके खीरे के निचले हिस्से को अपनी जीभ से छुआ, तो उसे लगा कि उसका रस अभी निकल जाएगा, लेकिन उसने खुद पर काबू रखा।
अब समीर ने निशा को बिस्तर पर सीधा लेटाया और उसके दोनों पैरों को अपने कंधों पर रख लिया। उसने अपने खीरे की टोपी को निशा की गीली और चिपचिपी खाई के मुहाने पर रखा और एक गहरा दबाव दिया। जैसे ही खीरा उस तंग खाई के अंदर आधा समाया, निशा के मुँह से एक तेज चीख निकली और उसने समीर की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए। समीर ने रुककर उसके होंठों को चूमा और जब उसकी खाई ने खीरे को स्वीकार कर लिया, तो उसने एक जोरदार धक्का देकर पूरा खीरा जड़ तक अंदर उतार दिया। अब शुरू हुई असली खुदाई, जिसमें हर धक्के के साथ एक थप-थप की आवाज आ रही थी और निशा की देह धनुष की तरह मुड़ रही थी।
समीर पूरी ताकत से उसे खोद रहा था और निशा के तरबूज हवा में पागलपन की हद तक उछल रहे थे। समीर ने अब निशा को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदने की पोजीशन में ले आया। पीछे से उसकी गोलाई को देखते हुए समीर का जोश और बढ़ गया और उसने अपना खीरा पीछे के रास्ते की ओर ले जाने के बजाय फिर से उसकी गहरी खाई में पीछे से डाल दिया। इस पोजीशन में खुदाई और भी गहरी हो रही थी और निशा पागलों की तरह बिस्तर की चादर मुट्ठी में भींच रही थी। समीर के धक्कों की रफ्तार अब बेकाबू हो गई थी और दोनों के शरीर पसीने से पूरी तरह तर-बतर हो चुके थे। समीर के खीरे और निशा की खाई के मिलन से एक मादक खुशबू पूरे कमरे में फैल गई थी।
समीर ने अब फिर से उसे सीधा लेटाया और अपनी रफ्तार को चरम पर ले गया। निशा अब चिल्ला रही थी, “हाँ समीर, और तेज… मुझे पूरी तरह खोद डालो… मेरा रस निकलने वाला है!” समीर ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी और अगले ही पल निशा का पूरा शरीर कांपने लगा और उसकी खाई से रसीला सैलाब उमड़ पड़ा। ठीक उसी समय समीर ने भी एक आखिरी जोरदार धक्का मारा और अपना सारा गरम रस निशा की गहराई में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए बिस्तर पर गिर पड़े, उनकी सांसें इतनी तेज थीं जैसे कोई दौड़ लगाकर आए हों। निशा के चेहरे पर एक असीम संतुष्टि थी और समीर को अपनी मर्दानगी पर गर्व महसूस हो रहा था।
काफी देर तक दोनों उसी अवस्था में लेटे रहे, उनकी धड़कनें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। निशा ने समीर के सीने पर अपना सिर रखा और धीरे से कहा कि आज उसे पहली बार महसूस हुआ है कि असली सुख क्या होता है। समीर ने उसके माथे को चूमा और उसे अपनी बाहों में और कस लिया। वह दोपहर अब ढल चुकी थी, लेकिन उनके बीच जो आग लगी थी, उसने उनके रिश्ते को एक नई और गहरी परिभाषा दे दी थी। उनके शरीरों पर लगा पसीना और बिखरे हुए कपड़े उस जबरदस्त खुदाई की गवाही दे रहे थे, जिसने दो प्यासी रूहों को एक कर दिया था।