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निशा साली की चु@@ई


निशा साली की चु@@ई—>

निशा मेरी पत्नी की छोटी बहन थी, जो अपने कॉलेज की छुट्टियों में कुछ दिनों के लिए हमारे घर रहने आई थी। दिल्ली की उस उमस भरी और तपती गर्मी की रात में कूलर की घरघराहट के बीच सारा घर गहरी नींद के आगोश में सोया हुआ था, लेकिन मेरी आँखों से नींद कोसों दूर थी। मैं हॉल में बैठा लैपटॉप पर कुछ काम निबटाने की कोशिश कर रहा था, तभी निशा दबे पाँव रसोई की ओर बढ़ी। उसकी पतली गुलाबी रंग की रेशमी नाइटी उसके छरहरे बदन से इस कदर चिपकी हुई थी कि उसके शरीर की हर बनावट साफ़ झलक रही थी। उसकी चाल में एक अजब सी खामोश मस्ती थी जो उस सन्नाटे में मेरे मन के भीतर एक गहरी हलचल पैदा कर रही थी और मुझे अपनी ओर किसी चुम्बक की तरह खींच रही थी।

निशा का शरीर किसी कुशल मूर्तिकार द्वारा तराशे गए एक बेहतरीन सांचे की तरह सुडौल और गठीला था, उसकी उम्र महज़ बाईस साल थी लेकिन उसकी शारीरिक परिपक्वता उसके व्यक्तित्व से कहीं ज्यादा बड़ी दिखती थी। जब वह पानी पीने के लिए मुड़ी, तो उसकी नाइटी के बेहद झीने कपड़े के नीचे से उसके उभरे हुए रसीले तरबूज साफ तौर पर उभर कर सामने आ रहे थे, जो उसकी हर सांस की लय के साथ धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हिल रहे थे। उन तरबूजों के ठीक बीचों-बीच बने गहरे अहसास और उनके शीर्ष पर उभरे हुए छोटे-छोटे कड़े मटर जैसे दाने मेरी धड़कनों को बेतहाशा तेज़ कर रहे थे। उसका पिछवाड़ा काफी भरा हुआ और गोल था, जो नाइटी के भीतर से अपनी मौजूदगी का पुरज़ोर अहसास करा रहा था, जिसे देख किसी भी मर्द का संयम रेत के महल की तरह ढह सकता था।

पिछले कुछ दिनों से हमारे बीच एक अनकहा सा रिश्ता पनप रहा था, जो सिर्फ जीजा और साली के मजाक तक सीमित नहीं रह गया था। हम दोनों की नज़रें जब भी मिलती थीं, तो उनमें एक अजीब सी चमक और चाहत की प्यास साफ़ दिखाई देती थी, जो शब्दों से कहीं ज्यादा गहरी थी। रात के खाने के समय जब मेरी उंगलियां गलती से उसकी हथेली से छू जाती थीं, तो एक करंट सा दौड़ जाता था और निशा अपनी पलकें झुकाकर मुस्कुरा देती थी। वह भावनात्मक जुड़ाव अब धीरे-धीरे एक जिस्मानी खिंचाव में तब्दील हो चुका था, जिसे हम दोनों ही महसूस कर रहे थे लेकिन समाज और मर्यादा की बेड़ियां हमें अब तक थामे हुए थीं।

रसोई के अंधेरे में फ्रिज की हल्की रोशनी में जब वह पानी पी रही थी, तो उसकी गर्दन से पसीने की एक बूंद फिसलकर उसके तरबूजों के बीच की गहरी घाटी में जाकर खो गई। यह दृश्य देख मेरा दिल सीने को चीरकर बाहर आने को आतुर हो उठा और मैं अपनी कुर्सी छोड़कर उसके पीछे जाकर खड़ा हो गया। निशा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा, लेकिन उसकी बढ़ती हुई सांसों और थरथराहट ने बता दिया कि उसे मेरी मौजूदगी का अहसास हो चुका है। हम दोनों के बीच का मौन उस समय दुनिया की सबसे शोर भरी आवाज़ लग रहा था, जिसमें सिर्फ इच्छाओं का शोर था और कुछ नहीं।

मेरे मन में एक पल के लिए द्वंद्व उठा कि वह मेरी पत्नी की बहन है, यह गलत है, लेकिन अगले ही पल उसकी नाइटी से आती उसके जिस्म की मदहोश कर देने वाली खुशबू ने मेरे सारे विवेक को मिटा दिया। वह झिझक रही थी, उसकी उंगलियां कांच के गिलास को जोर से जकड़े हुए थीं, जैसे वह खुद को बहकने से रोक रही हो। मैंने धीरे से अपना हाथ उसकी नग्न कमर पर रखा, जहाँ नाइटी थोड़ी ऊपर चढ़ गई थी, और मेरा स्पर्श होते ही वह सिहर उठी। उसकी त्वचा इतनी मखमली और गर्म थी कि मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने किसी धधकते हुए अंगारे को छू लिया हो जो मुझे जलाना नहीं, बल्कि पिघलाना चाहता था।

निशा ने धीरे से अपनी गर्दन मेरी ओर घुमाई, उसकी आँखों में शर्म, डर और बेतहाशा चाहत का एक मिला-जुला समंदर हिलोरे ले रहा था। मैंने उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके अधरों के करीब अपना चेहरा ले गया, हमारे बीच की दूरी अब खत्म होने को थी। उसने अपनी आँखें मूंद लीं और एक लंबी आह भरी, जैसे उसने खुद को पूरी तरह से मेरे हवाले कर दिया हो। जब हमारे होंठ एक-दूसरे से मिले, तो वह सिर्फ एक चुंबन नहीं था, बल्कि बरसों की दबी हुई प्यास का सैलाब था जिसे आज रास्ता मिल गया था।

हम धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए उसके कमरे में पहुंचे, जहाँ चाँदनी खिड़की से छनकर बिस्तर पर अपनी चांदनी बिखेर रही थी। मैंने उसकी नाइटी के स्ट्रेप्स को धीरे से उसके कंधों से नीचे गिराया, जिससे उसके दोनों रसीले तरबूज पूरी तरह आज़ाद होकर मेरे सामने गर्व से तन गए। उनके ऊपर के भूरे मटर अब ठंड और उत्तेजना से और भी सख्त हो गए थे, जिन्हें मैंने बारी-बारी से अपने मुँह में लिया और धीरे से सहलाने लगा। निशा के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली कराह निकली और उसने अपने दोनों हाथ मेरे बालों में फंसा लिए, वह अपनी पीठ को मोड़कर अपने तरबूजों को मेरे और करीब धकेल रही थी।

मेरी उंगलियां अब उसकी रेशमी त्वचा पर रेंगती हुई नीचे की ओर बढ़ रही थीं, जहाँ घने बालों के बीच उसकी रहस्यमयी खाई छिपी हुई थी। जैसे ही मैंने अपनी पहली उंगली से उस खाई को छुआ, वह पूरी तरह गीली और चिपचिपी हो चुकी थी, जो इस बात का सबूत था कि निशा कितनी ज्यादा तैयार थी। वह अपनी कमर को ऊपर-नीचे झटक रही थी और बार-बार मेरा नाम फुसफुसा रही थी, ‘जीजू… और नहीं… प्लीज… मुझे अपनी गहराई में ले लो।’ मैंने अपनी उंगली से उस खाई को और गहराई से खोदना शुरू किया, जिससे उसकी आहें अब सिसकियों में तब्दील होने लगीं।

निशा अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी थी, उसने झपटकर मेरे कपड़े उतार दिए और पहली बार उसकी नज़रें मेरे उस सख्त और लंबे खीरे पर पड़ीं जो उत्तेजना के मारे फटने को बेताब था। उसने झुककर उस खीरे को अपने हाथों में लिया और उसकी मोटाई को महसूस करते हुए उसे धीरे-धीरे अपने मुँह में भर लिया। वह इतनी कुशलता से खीरा चूस रही थी कि मुझे लगा मेरा रस अभी निकल जाएगा, लेकिन मैंने खुद पर काबू पाया और उसे बिस्तर पर लिटा दिया। उसके दोनों पैर चौड़े करते ही उसकी गुलाबी खाई का द्वार पूरी तरह खुल गया था, जो मेरे खीरे के स्वागत के लिए पुकार रहा था।

मैंने अपने खीरे की टोपी को उसकी खाई के मुहाने पर टिकाया और एक ज़ोरदार धक्का लगाया, जिससे मेरा आधा खीरा उस तंग और गर्म खाई के भीतर समा गया। निशा की आँखों से आंसू की एक बूंद छलक पड़ी और उसने मेरे कंधों को अपने नाखूनों से जकड़ लिया, लेकिन वह दर्द नहीं बल्कि एक चरम सुख का अहसास था। मैंने धीरे-धीरे खुदाई की गति बढ़ानी शुरू की, हर धक्के के साथ मेरा पूरा खीरा उसकी गहराई को नाप रहा था और निशा के पिछवाड़े बिस्तर पर जोर-जोर से थपथपा रहे थे। ‘ओह जीजू… आप तो बहुत बड़े हो… मुझे फाड़ दोगे क्या… पर रुकना मत… मुझे और खोदो,’ निशा ने सिसकते हुए कहा।

कमरे का तापमान बढ़ चुका था, हम दोनों के शरीर पसीने से लथपथ थे और खुदाई की आवाज़ उस सन्नाटे को चीर रही थी। मैंने उसे घुमाकर पिछवाड़े से खोदने वाली मुद्रा में कर दिया, जहाँ से उसका पिछवाड़ा और भी उभरा हुआ और आमंत्रित लग रहा था। पीछे से जब मेरा खीरा उसकी खाई में जा रहा था, तो उसकी गहराई का अहसास और भी तगड़ा हो गया था। निशा अपने हाथों को बिस्तर पर टिकाए हुए थी और हर धक्के पर जोर से चिल्ला रही थी, उसके तरबूज पागलों की तरह झूल रहे थे। खुदाई अब अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी, मेरा खीरा पूरी तरह से रगड़ खा रहा था और निशा की खाई से एक अजीब सी चिकनाहट वाला संगीत निकल रहा था।

निशा की सिसकियां अब चीखों में बदल गई थीं, ‘जीजू… मेरा रस निकलने वाला है… मैं जा रही हूँ… मुझे और जोर से खोदो!’ उसकी बात सुनकर मैंने अपनी रफ़्तार और तेज़ कर दी, जैसे कोई मशीन चल रही हो। कुछ ही पलों बाद, निशा का पूरा शरीर बुरी तरह कांपने लगा और उसकी खाई ने मेरे खीरे को इतनी कसकर जकड़ा कि मेरा भी सारा धैर्य जवाब दे गया। एक ज़ोरदार धक्के के साथ मेरा गर्म और गाढ़ा रस उसकी खाई की गहराइयों में फव्वारे की तरह छूटने लगा, और उसी समय निशा का भी रस निकल गया, जिससे हम दोनों एक-दूसरे पर ढह गए।

काफी देर तक हम दोनों एक-दूसरे की बाहों में लिपटे रहे, हमारी सांसें अब भी तेज थीं लेकिन मन में एक अजब सी शांति थी। निशा का चेहरा पसीने से चमक रहा था और उसके होंठों पर एक तृप्त मुस्कान थी, उसने मेरे सीने पर सिर रखते हुए कहा, ‘जीजू, आपने मुझे आज अपनी बना लिया, यह अहसास मैं कभी नहीं भूलूंगी।’ उस रात की वह खुदाई सिर्फ जिस्मों का मिलन नहीं थी, बल्कि दो प्यासी रूहों का एक-दूसरे में समा जाना था। हमने वहीं सो जाने का फैसला किया, उस सुकून के साथ जिसे हम दोनों ने पहली बार महसूस किया था, यह जानते हुए कि अब हमारे बीच का रिश्ता हमेशा के लिए बदल चुका है।

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