पड़ोसन की रसीली चुदाई—>
शहर की इस पॉश सोसाइटी के फ्लैट नंबर 402 में रहने वाली कविता जी की उम्र कोई पैंतीस साल रही होगी, लेकिन उनके बदन की ढलान और उस पर जमी मादकता किसी भी जवान मर्द का ईमान डगमगा देने के लिए काफी थी। उनके चेहरे पर हमेशा एक हल्की सी रहस्यमयी मुस्कान तैरती रहती थी, जो उनकी आँखों की गहराई के साथ मिलकर एक गहरा सम्मोहन पैदा करती थी। कविता जी के शरीर का हर अंग एक सधे हुए सांचे में ढला हुआ महसूस होता था, विशेषकर उनके रेशमी बाल जब उनकी पीठ पर लहराते थे, तो ऐसा लगता था मानो काली घटाएं जमीन को छूने की कोशिश कर रही हों। वह जब भी अपनी बालकनी में आती थीं, तो आसपास की हवा भी उनके इत्र की भीनी-भीनी खुशबू से सराबोर हो जाती थी, जो समीर जैसे नौजवान के दिल की धड़कनें तेज करने के लिए पर्याप्त था।
समीर जो कि अभी कुछ महीने पहले ही बगल के फ्लैट में रहने आया था, वह अक्सर कविता जी के शारीरिक उभारों को देखकर ख्यालों की दुनिया में खो जाता था। कविता जी का शरीर एक भरे हुए परिपक्व फल की तरह था, उनके तरबूज इतने पुष्ट और सुडौल थे कि कुर्ती के कपड़े को चीरकर बाहर आने को व्याकुल लगते थे। जब वह चलती थीं, तो उनके तरबूजों का वह हल्का सा हिलना समीर की आँखों को वहीं जमा देता था। उनके शरीर का निचला हिस्सा भी उतना ही आकर्षक था, उनके चौड़े पिछवाड़े की बनावट और उनकी पतली कमर का वह तीखा मोड़ एक ऐसा दृश्य बनाता था जिसे देख समीर का खीरा खुद-ब-खुद सख्त होकर अपनी जगह बनाने की कोशिश करने लगता था। उनकी त्वचा का रंग गेहुआं और चमक ऐसी थी जैसे उस पर सोने का पानी चढ़ा हो, जो उनके हर अंग को और भी अधिक निखार देता था।
समीर और कविता जी के बीच औपचारिक नमस्ते से शुरू हुआ रिश्ता धीरे-धीरे एक अनकहे खिंचाव में बदलने लगा था। समीर अक्सर किसी न किसी बहाने से उनके घर के चक्कर काटता और कविता जी भी शायद उसके मन की हलचल को भांप चुकी थीं। एक दोपहर जब पूरी सोसाइटी में सन्नाटा पसरा हुआ था, कविता जी ने समीर को अपने घर बुलाया, यह कहकर कि उनके बेडरूम का एयर कंडीशनर कुछ अजीब आवाज कर रहा है। समीर जब उनके घर पहुंचा, तो वहां का माहौल कुछ अलग ही था; हल्की मद्धम रोशनी और मोगरे की महक ने समीर की इंद्रियों को जगा दिया था। कविता जी ने उस दिन एक पतली सिल्क की साड़ी पहनी थी, जिसमें से उनकी नाभि और कमर की गोलाई साफ झलक रही थी, जो समीर के संयम की परीक्षा ले रही थी।
जैसे ही समीर एसी की जाँच करने के लिए स्टूल पर चढ़ा, कविता जी उसके बिल्कुल करीब खड़ी हो गईं, जिससे समीर को उनके गर्म सांसों का अहसास अपनी गर्दन पर होने लगा। उनके बीच की दूरी इतनी कम हो गई थी कि समीर को उनके तरबूजों की नरमी अपनी पीठ पर महसूस हो रही थी, जिससे उसके शरीर में बिजली की एक लहर दौड़ गई। समीर का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था और उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह काम पर ध्यान दे या उस मादक सुगंध पर जो कविता जी के बदन से आ रही थी। कविता जी ने धीरे से समीर के कंधे पर हाथ रखा और फुसफुसाते हुए पूछा कि क्या कोई बड़ी खराबी है, उनकी आवाज की थरथराहट ने समीर के मन के सारे बांध तोड़ दिए और उसने पीछे मुड़कर उनकी आँखों में झांका जहाँ सिर्फ और सिर्फ प्यास नजर आ रही थी।
समीर ने स्टूल से उतरकर सीधे कविता जी की कमर को अपने हाथों के घेरे में ले लिया, जिससे वह चौंक तो गईं लेकिन उन्होंने खुद को छुड़ाने की कोई कोशिश नहीं की। समीर के हाथों का स्पर्श पाकर कविता जी का शरीर धनुष की तरह तन गया और उनकी साँसें और भी तेज हो गई। समीर ने अपनी उंगलियों से उनके चेहरे को सहलाया और धीरे से उनके कानों के पास जाकर कुछ अनकही बातें कहीं, जिससे कविता जी की आँखों में शर्म और इच्छा का एक मिला-जुला भाव उभर आया। समीर ने धीरे-धीरे उनके तरबूजों के ऊपर से हाथ फेरना शुरू किया, जिससे उनके मटर साड़ी के पतले कपड़े के ऊपर से ही सख्त होते महसूस होने लगे। कविता जी ने समीर के गले में अपनी बाहें डाल दीं और उसे और भी करीब खींच लिया, जैसे वह सालों की प्यास बुझाने को बेताब हों।
समीर ने अब और इंतजार न करते हुए कविता जी के गुलाबी होठों का रस चखना शुरू किया, जो किसी शहद की तरह मीठे और नशीले थे। दोनों एक-दूसरे के शरीर में खोने लगे थे, समीर के हाथ अब कविता जी के पिछवाड़े को जोर-जोर से भींच रहे थे, जिससे उनके मुंह से हल्की सी कराह निकल रही थी। समीर ने धीरे से कविता जी की साड़ी के पल्लू को नीचे गिरा दिया, जिससे उनके विशाल तरबूज अब सिर्फ एक पतली ब्लाउज की कैद में थे। समीर ने अपनी जीभ से उनके मटरों को सहलाया, जिससे कविता जी का पूरा बदन कांप उठा और उन्होंने समीर के बालों को अपनी उंगलियों में कसकर जकड़ लिया। कमरे का तापमान बढ़ता जा रहा था और दोनों की साँसों की आवाजें खामोश कमरे में गूँजने लगी थीं, जो एक आने वाले तूफान का संकेत दे रही थीं।
समीर ने कविता जी को धीरे से बेड पर लेटा दिया और उनके शरीर से एक-एक करके सारे कपड़े अलग करने लगा। जब कविता जी पूरी तरह निर्वस्त्र हुईं, तो समीर की आँखें उनके बदन की सुंदरता देखकर फटी की फटी रह गई; उनकी खाई के पास के बाल बहुत ही करीने से तराशे हुए थे और उनकी खाई से एक प्राकृतिक चमक झलक रही थी। समीर ने अपना खीरा बाहर निकाला जो अब पूरी तरह से अपनी पूरी लंबाई और मोटाई में तन चुका था, जिसे देखकर कविता जी की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई। समीर ने झुककर उनकी खाई को चाटना शुरू किया, जिससे कविता जी अपना पिछवाड़ा ऊपर उठा-उठाकर समीर के मुंह पर रगड़ने लगीं। उनके मुंह से निकलने वाली आहें समीर के जोश को और भी ज्यादा बढ़ा रही थीं, और वह अपनी उंगली से खाई को खोदने लगा।
कविता जी अब पूरी तरह से तैयार थीं, उन्होंने समीर के खीरे को अपने हाथों में लिया और उसे सहलाते हुए अपनी खाई के द्वार पर ले आईं। जैसे ही समीर ने धीरे से अपने खीरे का अगला हिस्सा उनकी खाई के अंदर प्रवेश कराया, कविता जी ने एक गहरी आह भरी और उनकी आँखें बंद हो गईं। समीर ने बहुत ही धीमी गति से सामने से खोदना (मिश्नरी) शुरू किया, हर धक्के के साथ वह गहराई तक जाने की कोशिश कर रहा था। कविता जी के शरीर की गर्मी और उनकी खाई की तंग पकड़ समीर को पागल कर रही थी। वह अपनी कमर को तेजी से चलाने लगा, जिससे उनके तरबूज ऊपर-नीचे उछलने लगे और कमरे में मांस के टकराने की मधुर आवाजें आने लगीं। समीर अब पूरी ताकत से खुदाई कर रहा था, और हर धक्के पर कविता जी ‘ओह समीर, और तेज’ कहकर उसे प्रोत्साहित कर रही थीं।
कुछ देर बाद समीर ने कविता जी को घुमाकर बेड पर घुटनों के बल खड़ा कर दिया और उनके पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। पीछे से उनकी कमर की गोलाई और उनके भारी पिछवाड़े का हिलना समीर के लिए किसी स्वर्ग के दृश्य से कम नहीं था। वह उनके दोनों तरबूजों को पीछे से पकड़कर जोर-जोर से झटके दे रहा था, जिससे कविता जी का सिर तकिए में धंसा हुआ था और वह खुशी से कराह रही थीं। समीर की खुदाई अब अपनी चरम सीमा पर पहुँच रही थी, उसका खीरा उनकी खाई की गहराइयों को नाप रहा था। कविता जी की अंदरूनी दीवारें समीर के खीरे को कसकर जकड़ रही थीं, जैसे वह उसे कभी बाहर नहीं जाने देना चाहती हों। दोनों का शरीर पसीने से तर-बतर हो चुका था लेकिन जोश में कोई कमी नहीं थी।
अचानक कविता जी का शरीर जोर से कांपने लगा और उनकी खाई से रसों की एक फुहार छूटी, जिसे महसूस करते ही समीर ने भी अपना सारा रस उनकी गहराई में ही छोड़ दिया। रस छूटने का वह अहसास इतना सुखद था कि दोनों कुछ पलों के लिए जड़ हो गए, बस एक-दूसरे की धड़कनों को महसूस करते रहे। समीर धीरे से उनके ऊपर ही लेट गया और उनके माथे को चूमते हुए उन्हें अपनी बाहों में भर लिया। कविता जी के चेहरे पर एक असीम संतुष्टि और शांति के भाव थे, मानो उन्हें वह सब मिल गया हो जिसकी उन्हें बरसों से तलाश थी। उस रात के सन्नाटे में दोनों के शरीर एक-दूसरे से लिपटे हुए थे, और उनके बीच का वह भावनात्मक जुड़ाव अब शारीरिक मिलन के बाद और भी गहरा हो चुका था।
अगले कुछ घंटों तक वे दोनों बस ऐसे ही लेटे रहे, पुरानी बातें करते रहे और एक-दूसरे के शरीर के निशानों को निहारते रहे। समीर को महसूस हुआ कि यह सिर्फ एक शारीरिक भूख नहीं थी, बल्कि दो अकेलेपन का एक-दूसरे में मिल जाना था। कविता जी ने समीर के सीने पर अपना सिर रखा और कहा कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि कोई उन्हें इस तरह से महसूस करा पाएगा। इस खुदाई ने उनके बीच की झिझक को पूरी तरह खत्म कर दिया था और अब वे केवल पड़ोसी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की आत्मा के साथी बन चुके थे। वह रात उनके जीवन की सबसे यादगार रातों में से एक बन गई थी, जिसने उन्हें एक नई पहचान और एक गहरा रिश्ता दिया था।