पड़ोसन नेहा की चु@@ई —>
शहर की उस भीड़भाड़ वाली बहुमंजिला इमारत में नेहा को आए अभी कुछ ही महीने हुए थे। उसका पति अक्सर व्यापार के सिलसिले में शहर से बाहर रहता था, जिससे नेहा अक्सर खुद को अकेला और उदास महसूस करती थी। बत्तीस वर्षीय नेहा की देह में एक गजब का आकर्षण था जो किसी को भी अपनी ओर खींच सकता था। वह स्वभाव से थोड़ी शर्मीली थी लेकिन उसके भीतर दबी हुई इच्छाओं का सैलाब अक्सर उसे बेचैन कर देता था। रात की खामोशी में जब वह अपनी बालकनी में खड़ी होती, तो ठंडी हवा उसे एक अजीब सी सिहरन दे जाती थी।
नेहा के शरीर की बनावट किसी तराशी हुई मूरत की तरह थी। उसके रेशमी बालों का गुच्छा जब उसके कंधों पर गिरता, तो उसकी गोरी गर्दन की चमक और बढ़ जाती थी। उसकी छाती पर उभरे हुए दो रसीले और बड़े-बड़े तरबूज हमेशा उसकी कुर्ती या साड़ी के भीतर से अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहते थे। उन तरबूजों के बीच की गहरी घाटी किसी को भी मदहोश करने के लिए काफी थी। नेहा जब चलती, तो उसके भारी और गोल पिछवाड़े की लचक देखने वालों की धड़कनें तेज कर देती थी। उसकी कमर का घेरा और वहां का हल्का सा उभार उसे एक कामुक नारी का रूप देता था।
उसी इमारत की दूसरी मंजिल पर समीर रहता था, जो एक जिम ट्रेनर था और जिसकी उम्र करीब छब्बीस साल थी। समीर का शरीर गठा हुआ था और उसकी बाहें काफी मजबूत थीं। एक शाम जब लिफ्ट खराब थी, तो नेहा भारी सामान लेकर सीढ़ियों से ऊपर आ रही थी। उसकी सांसें फूल रही थीं और पसीने की बूंदें उसके माथे से होकर उसके तरबूजों के बीच जा गिर रही थीं। तभी समीर वहां पहुंचा और उसने मदद का हाथ बढ़ाया। उस पल जब उनकी नजरें मिलीं, तो दोनों के बीच एक अनकहा सा खिंचाव महसूस हुआ।
नेहा ने समीर को धन्यवाद देने के लिए अपने घर चाय पर आमंत्रित किया। कमरे के भीतर का माहौल शांत था लेकिन दोनों के बीच की नज़दीकियां बढ़ती जा रही थीं। सोफे पर बैठते समय नेहा का पल्लू थोड़ा खिसक गया, जिससे उसके एक तरबूज का ऊपरी हिस्सा और उस पर मौजूद मटर सा उभार समीर की नजरों के सामने आ गया। समीर की नजरें वहीं जम गईं और नेहा ने भी उसे टोकने के बजाय अपनी पलकें झुका लीं। उसके चेहरे पर आई गुलाबी शर्म ने समीर के भीतर सोई हुई कामुकता को जगा दिया था।
बातों-बातों में समीर का हाथ गलती से नेहा की जांघों को छू गया। वह स्पर्श बिजली की तरह नेहा के पूरे शरीर में दौड़ गया। उसने पीछे हटने के बजाय अपनी आंखें मूंद लीं और एक लंबी आह भरी। समीर ने हिम्मत जुटाई और धीरे से अपना हाथ नेहा की कमर की ओर ले गया। जैसे ही उसकी उंगलियों ने नेहा की मुलायम त्वचा को छुआ, वह कांप उठी। समीर ने उसे अपनी बाहों में खींच लिया और उसके होठों को अपने होठों से ढक लिया। दोनों के बीच एक गहरा और लंबा चुंबन शुरू हुआ, जिसमें प्यास और तड़प दोनों शामिल थीं।
समीर के हाथ अब नेहा के कपड़ों के ऊपर से ही उसके भारी तरबूजों को सहला रहे थे। वह उन्हें अपनी हथेलियों में भरकर धीरे-धीरे दबा रहा था। नेहा के मुंह से छोटी-छोटी कराहें निकलने लगी थीं। समीर ने धीरे-धीरे उसकी साड़ी के पल्लू को पूरी तरह हटा दिया और अब उसके सामने नेहा के दोनों विशाल तरबूज बिना किसी रुकावट के थे। समीर ने अपना मुंह नीचे किया और उन रसीले तरबूजों के ऊपर मौजूद मटर को अपनी जीभ से सहलाने लगा। नेहा का शरीर धनुष की तरह तन गया था और वह समीर के बालों को अपनी उंगलियों में भींचने लगी थी।
उत्तेजना अब अपनी चरम सीमा पर थी। समीर ने धीरे से नेहा की पेटीकोट की डोरी ढीली की और उसे पूरी तरह निर्वस्त्र कर दिया। नेहा की टांगों के बीच की रेशमी बालों से ढकी हुई वह गहरी खाई अब समीर की आंखों के सामने थी। वहां से एक हल्की सी नमी निकल रही थी जो नेहा की कामुकता का प्रमाण थी। समीर ने अपनी उंगली से उस खाई को टटोलना शुरू किया। जैसे ही उसकी उंगली खाई के भीतर गई, नेहा के मुंह से एक तीखी सिसकारी निकली। समीर अपनी जीभ से उस खाई को चाटने लगा, जिससे नेहा का शरीर थरथराने लगा।
अब समीर ने अपने कपड़ों को उतार फेंका और उसका फौलादी और लंबा खीरा पूरी तरह से अकड़ कर बाहर आ गया। उस खीरे की मोटाई और लंबाई देखकर नेहा की आंखें फटी रह गई थीं। उसने धीरे से अपना हाथ बढ़ाकर उस गर्म और सख्त खीरे को पकड़ा और उसे सहलाने लगी। नेहा ने उस खीरे को अपने मुंह में लिया और उसे किसी लॉलीपॉप की तरह चूसने लगी। समीर की आंखों में आनंद के आंसू आने वाले थे। वह नेहा के सिर को पकड़कर उसे और गहराई तक अपने खीरे को ले जाने के लिए प्रोत्साहित करने लगा।
आखिरकार, वह घड़ी आ गई जिसका दोनों को इंतजार था। समीर ने नेहा को बिस्तर पर लेटाया और उसके दोनों पैरों को अपने कंधों पर रख लिया। उसने अपने भारी खीरे की नोक को नेहा की गीली खाई के द्वार पर रखा और एक झटके में उसे भीतर उतार दिया। नेहा की एक चीख निकली जो दर्द और आनंद का मिश्रण थी। वह खाई इतनी तंग थी कि समीर का खीरा उसमें बड़ी मुश्किल से समा रहा था। समीर ने रुकने के बजाय धीरे-धीरे धक्के मारना शुरू किया। हर धक्के के साथ नेहा के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और पूरे कमरे में शरीर के टकराने की आवाज गूंजने लगी थी।
खुदाई की यह प्रक्रिया अब बहुत तेज हो चुकी थी। समीर ने नेहा को बिस्तर के किनारे लाकर उसे पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। नेहा अब एक कुतिया की तरह झुक गई थी और समीर पीछे से अपने भारी खीरे को उसकी खाई में गहराई तक उतार रहा था। वह नेहा के पिछवाड़े पर थप्पड़ मार रहा था और उसे गंदी-गंदी बातें कह रहा था जिससे नेहा और भी ज्यादा उत्तेजित हो रही थी। नेहा बार-बार कह रही थी, “हाँ समीर, मुझे और जोर से खोदो, आज मेरा पूरा रस निकाल दो, तुम्हारा खीरा बहुत बड़ा है।”
करीब आधे घंटे की उस भीषण खुदाई के बाद, दोनों अपने चरम पर पहुँचने वाले थे। समीर ने अपनी गति को और बढ़ा दिया और नेहा की खाई के भीतर अपने खीरे को पूरी गहराई तक धकेल दिया। अचानक नेहा का पूरा शरीर अकड़ गया और उसकी खाई से ढेर सारा रस निकलने लगा। ठीक उसी पल समीर का खीरा भी कांपने लगा और उसने अपना सारा गर्म सफेद रस नेहा की खाई के भीतर ही उड़ेल दिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए बिस्तर पर गिर पड़े, उनकी सांसें बहुत तेज चल रही थीं और शरीर पसीने से तर-बतर था।
कुछ देर बाद जब उनकी सांसें सामान्य हुईं, तो नेहा ने समीर के सीने पर अपना सिर रख दिया। उस पल में कोई शर्म नहीं थी, सिर्फ एक गहरा संतोष था। नेहा को महसूस हुआ कि उसे वह मिल गया है जिसकी उसे बरसों से तलाश थी। समीर ने उसके माथे को चूमा और उसे अपनी बाहों में और कस लिया। वह रात उन दोनों के लिए सिर्फ एक शारीरिक मिलन नहीं था, बल्कि एक ऐसी शुरुआत थी जिसने उनके अकेलेपन को हमेशा के लिए मिटा दिया था। नेहा अब खिड़की के बाहर नहीं देख रही थी, वह समीर की आंखों में अपना भविष्य देख रही थी।