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पड़ोसन भाभी की मदहोश कर देने वाली खुदाई

रघु पिछले दो महीनों से इस नए अपार्टमेंट में रहने आया था, जहाँ उसकी पड़ोसी श्वेता भाभी अपनी मासूम मुस्कान और चुलबुले अंदाज से सबका मन मोह लेती थीं। श्वेता भाभी का व्यक्तित्व बहुत ही शांत और गरिमामयी था, लेकिन जब वह शाम के वक्त अपनी बालकनी में खड़ी होकर ठंडी हवा का आनंद लेती थीं, तो रघु की निगाहें उन पर से हटना मुश्किल हो जाती थीं। दोनों के बीच धीरे-धीरे बातचीत होने लगी थी, जो कभी मौसम तो कभी घर के कामों तक सीमित रहती थी, लेकिन उन अनकहे शब्दों के पीछे एक ऐसा खिंचाव हमेशा महसूस होता था जो दोनों को एक-दूसरे की ओर खींचता था।

श्वेता भाभी का शरीर किसी अनुभवी शिल्पकार द्वारा तराशी हुई मूरत जैसा था, उनके ब्लाउज के भीतर दबे हुए रसीले तरबूज हर सांस के साथ ऊपर-नीचे होते थे, जो रघु की धड़कनों को बेकाबू कर देते थे। जब वह पीछे मुड़कर अलमारी से कुछ सामान निकालतीं, तो उनका भारी और गोल पिछवाड़ा साड़ी के महीन कपड़े के नीचे भी अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराता था, जिससे रघु के मन में अजीब सी बेचैनी पैदा हो जाती थी। उनके शरीर की बनावट में एक ऐसी कशिश थी जो किसी को भी अपनी ओर खींचने की ताकत रखती थी, खासकर जब उनकी साड़ी का पल्लू हल्का सा कंधे से खिसक जाता था।

एक दोपहर जब बाहर का तापमान बहुत बढ़ गया था और चारों तरफ सन्नाटा था, रघु ने किसी काम के बहाने भाभी के घर का दरवाजा खटखटाया, तो उन्होंने उसे मुस्कराते हुए अंदर आने का न्योता दिया। कमरे में एसी की ठंडक थी, लेकिन रघु के मन में एक अलग ही आग जल रही थी क्योंकि भाभी ने एक बहुत ही हल्की सिल्क की नाइटी पहन रखी थी, जो उनके शरीर से पसीने के कारण चिपकी हुई थी। भाभी ने रघु के लिए ठंडा शरबत बनाया और जब वह गिलास उसे थमा रही थीं, तो उनकी उंगलियां आपस में टकरा गईं, जिससे रघु के पूरे शरीर में एक करंट सा दौड़ गया।

श्वेता के चेहरे पर थोड़ी शर्म और झिझक थी, लेकिन उनकी आँखों में एक दबी हुई प्यास भी साफ़ झलक रही थी जो रघु को आगे बढ़ने के लिए उकसा रही थी। रघु ने महसूस किया कि उसकी धड़कनें अब काबू से बाहर हो रही हैं और उसके पेंट के अंदर का खीरा धीरे-धीरे अपनी पूरी लंबाई और मजबूती दिखाने लगा था, जिससे उसे बैठने में भी असुविधा हो रही थी।

रघु ने धीरे से शरबत का गिलास साइड टेबल पर रखा और श्वेता भाभी की तरफ बढ़ा। दोनों के बीच अब सिर्फ़ एक कदम का फासला था। श्वेता ने नज़रें झुका लीं, लेकिन उनकी साँसें तेज़ हो गई थीं। रघु ने बहुत धीरे से उनका हाथ थामा और कहा, “भाभी… आपकी आँखें… बहुत कुछ कह रही हैं।” श्वेता ने हल्के से सिर हिलाया, जैसे कह रही हों कि वो भी यही महसूस कर रही हैं। रघु ने उनका चेहरा ऊपर उठाया और धीरे से उनके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। चुंबन शुरू में सिर्फ़ स्पर्श था – नरम, काँपता हुआ। लेकिन जल्दी ही दोनों की जीभें मिल गईं, और चुंबन गहरा, भूखा हो गया। श्वेता ने रघु के गले में हाथ डाल दिए, और रघु ने उनकी कमर को जकड़ लिया। नाइटी का पतला कपड़ा उनके शरीर से चिपका हुआ था, और रघु को उनके तरबूजों की गर्माहट साफ़ महसूस हो रही थी।

रघु ने धीरे से श्वेता को सोफे पर बिठा दिया। उसने नाइटी के कंधों से पट्टियाँ सरकाईं, और श्वेता के तरबूज सामने आ गए – बड़े, गोल, गोरे, पसीने से चमकते हुए, ऊपर मटर सख्त और गुलाबी। रघु ने एक तरबूज को हाथ में लिया, हल्का सा दबाया, और फिर मुंह में ले लिया। जीभ से मटर को घुमाया, चूसा। श्वेता ने लंबी कराह के साथ कहा, “रघु… आह… धीरे… इतनी ताकत से मत…” लेकिन उनकी उंगलियाँ रघु के बालों में फंस गईं, और वो खुद ही उसका सिर और पास दबा रही थीं। रघु ने दूसरे तरबूज को भी सहलाया, चूमा, चूसा। श्वेता की साँसें अब भारी हो गईं, आँखें बंद, होंठ काँप रहे थे।

रघु ने श्वेता को लिटाया और नाइटी पूरी तरह ऊपर सरका दी। श्वेता अब सिर्फ़ पतली पैंटी में थीं। रघु ने पैंटी को धीरे से खींचा, और श्वेता की खाई नंगी हो गई – हल्के बालों से घिरी, गुलाबी, पूरी तरह भीगी हुई। रघु ने जांघों को चूमा, ऊपर बढ़ा, और जीभ से खाई को छुआ। श्वेता का शरीर झटके से काँप उठा। “रघु… ओह… ये… ऐसा मत करो… मैं… सह नहीं पाऊँगी…” लेकिन उन्होंने खुद जांघें और फैला दीं। रघु ने खाई चाटना शुरू किया – धीरे, गहराई से, जीभ हर कोने को छूती हुई, मटर को चूसती हुई। श्वेता की कराहें कमरे में गूँज रही थीं। उनका पिछवाड़ा सोफे पर रगड़ खा रहा था, पसीना बह रहा था।

श्वेता ने रघु को ऊपर खींचा। अब उनकी बारी थी। उन्होंने रघु की शर्ट उतारी, पैंट खोली। खीरा बाहर निकला – सख्त, लंबा, नसों से भरा। श्वेता ने आँखें फैलाईं, “रघु… इतना… इतना मजबूत…” उन्होंने हाथ से पकड़ा, सहलाया, फिर मुंह में लिया। पहले सिर चाटा, फिर गहरा। रघु कराहा, “भाभी… तुम्हारा मुंह… कितना गर्म… कितना मीठा…” श्वेता ने और गहरा लिया, चूसती रहीं, जीभ घुमाती रहीं। रघु का शरीर तन गया।

रघु ने श्वेता को बेडरूम ले जाया। बिस्तर पर लिटाकर जांघें फैलाईं। खीरा खाई के मुंह पर रखा। “भाभी… तैयार हैं?” श्वेता ने फुसफुसाया, “हाँ… लेकिन धीरे… बहुत दिनों से… कोई नहीं आया…” रघु ने धीरे दबाया। खीरा घुसा – इंच-दर-इंच। श्वेता ने कराहा, “आह… पूरा… हाँ… ऐसे…” रघु धीरे-धीरे अंदर-बाहर करने लगा। तरबूज हिल रहे थे। रघु ने एक तरबूज चूसा, खुदाई जारी रखी। श्वेता बोलीं, “और गहरा… रघु… तेज़… खोदो मुझे…”

पोजीशन बदली। श्वेता घुटनों पर, पिछवाड़ा ऊपर। रघु ने पीछे से डाला, गहरा, तेज़। श्वेता का पिछवाड़ा हिल रहा था। रघु ने बाल पकड़े। “भाभी… तुम्हारी खाई… कितनी तंग…” श्वेता चीखीं, “तेज़… मैं रस छूटने वाली हूँ…” शरीर काँपा, रस निकला। रघु नहीं रुका। फिर सामने से।

दूसरी बार रस निकला तो रघु भी किनारे पर। तेज़ खोदा। श्वेता ने जकड़ा, “अंदर… सब अंदर…” रघु का रस छूटा, गर्म, भरपूर। दोनों कराहे, पसीने से तर।

रात भर जुड़े रहे। कभी सामने, कभी पिछवाड़े से, कभी श्वेता ऊपर। हर बार धीरे शुरू, फिर तेज़। श्वेता फुसफुसाईं, “तुम्हारा खीरा… मुझे पागल कर देता है…” रघु बोला, “और तुम्हारी खाई… मेरी दुनिया है भाभी…” घंटों खोए रहे।

सुबह से पहले एक बार और। पिछवाड़े से, धीरे। श्वेता की कराह, “धीरे… लेकिन मत रुकना…” रघु ने पूरा किया। तीसरा रस निकला। थककर लेटे।

सुबह श्वेता रघु के सीने पर सिर रखे सोई थीं। आँखें खोलीं, मुस्कुराईं। “रघु… ये हमारा राज़ रहेगा। लेकिन… जब भी बुलाऊँ… आ जाना।” रघु ने चुंबन किया। “भाभी… अब मैं यहीं रहूँगा… तुम्हारे पास।” बाहर धूप निकली, लेकिन उनके अंदर की आग अभी भी जल रही थी।

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