Join WhatsApp Click Here
Join Telegram Click Here

पुरानी सहेली की चु@@ई

बरसात की वह रात बहुत ही मायावी और मादक थी जब रोहन अपनी पुरानी कॉलेज की सहेली नेहा के घर पहुँचा था। कई सालों बाद दोनों मिले थे और बाहर हो रही मूसलाधार बारिश ने उन्हें एक ही कमरे में कैद होने पर मजबूर कर दिया था। नेहा ने एक गहरे नीले रंग की साड़ी पहनी हुई थी जिसका गला बहुत ही गहरा था और उसमें से उसके बड़े और गोल तरबूज साफ झलक रहे थे। उन तरबूजों की गोलाई देखकर रोहन की धड़कनें रुक सी गई थीं और वह बार-बार अपनी नजरें हटाने की कोशिश कर रहा था पर नाकाम था। नेहा के बदन की महक पूरे कमरे में फैली हुई थी और वातावरण में एक अजीब सी गर्मी और कामुकता का अहसास होने लगा था।

नेहा का शरीर किसी तराशी हुई मूर्ति की तरह लग रहा था जिसमें हर मोड़ पर एक अलग ही कशिश और आकर्षण भरा हुआ था। जब वह चलती थी तो उसके तरबूज ऊपर-नीचे हिलते थे और साड़ी के पतले कपड़े के पीछे से उनके ऊपर लगे नन्हे मटर साफ दिखाई दे रहे थे जो ठंड या उत्तेजना की वजह से अकड़ गए थे। उसकी कमर की गोलाई और उसके भारी पिछवाड़े ने रोहन के मन में हलचल मचा दी थी और उसका खीरा धीरे-धीरे अपनी जगह बनाने के लिए व्याकुल होने लगा था। रोहन ने महसूस किया कि नेहा भी उसे उसी नजर से देख रही थी जैसे वह उसे देख रहा था और उनके बीच एक अनकहा सा रिश्ता फिर से जन्म ले रहा था।

वे दोनों सोफे पर बैठकर अपनी पुरानी कॉलेज की यादें साझा कर रहे थे लेकिन बातों के पीछे एक गहरा आकर्षण और पुरानी अधूरी इच्छाएं छिपी हुई थीं। रोहन ने नेहा के हाथ पर अपना हाथ रखा तो उसने हाथ हटाया नहीं बल्कि अपनी उंगलियां रोहन की उंगलियों में फंसा लीं जिससे दोनों के बीच एक भावनात्मक बिजली सी दौड़ गई। नेहा की आंखों में एक पुरानी प्यास थी जिसे रोहन साफ पढ़ सकता था और वह जान गया था कि आज की रात सिर्फ बातों में नहीं बल्कि कुछ और ही गहरे अहसासों में बीतने वाली है। उनके बीच का यह भावनात्मक जुड़ाव अब शारीरिक खिंचाव में बदलने लगा था और कमरे की खामोशी उनकी तेज होती सांसों से भरने लगी थी।

अचानक रोहन ने नेहा को अपनी बाहों में भर लिया और उसे अपनी ओर खींच लिया जिससे उसके नरम तरबूज रोहन के सीने से जोर से दब गए। नेहा ने एक आह भरी और अपनी आंखें मूंद लीं जैसे वह इसी पल का सालों से इंतजार कर रही थी। रोहन ने उसके गर्दन पर अपनी जुबान फेरी और धीरे-धीरे उसके कानों के पास फुसफुसाया कि वह उसे कितना चाहता है। नेहा की कंपकंपी बढ़ गई थी और उसने रोहन के बालों में अपनी उंगलियां फंसा लीं जिससे रोहन का खीरा अब पूरी तरह से कड़क होकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने लगा था। झिझक का बांध अब पूरी तरह से टूट चुका था और उनकी सांसें एक-दूसरे में घुलने लगी थीं।

रोहन ने धीरे से नेहा की साड़ी के पल्लू को खिसका दिया जिससे उसके सफेद और रसीले तरबूज पूरी तरह से सामने आ गए जिनके ऊपर गुलाबी मटर बहुत ही सुंदर लग रहे थे। रोहन ने झुककर एक मटर को अपने मुंह में लिया और उसे धीरे-धीरे चूसने लगा जिससे नेहा के मुंह से एक दबी हुई चीख निकल गई। वह अपनी कमर को ऊपर की ओर उचका रही थी और रोहन को अपने और करीब खींच रही थी। रोहन का हाथ उसकी साड़ी के नीचे गया और उसने महसूस किया कि नेहा की खाई पहले से ही बहुत गीली और चिपचिपी हो चुकी थी जो इस बात का सबूत थी कि वह कितनी ज्यादा उत्तेजित थी।

नेहा ने भी अपनी झिझक त्याग दी थी और वह रोहन की पैंट की बेल्ट खोलने लगी ताकि वह उस कड़क खीरे का दीदार कर सके जिसके लिए वह तड़प रही थी। जैसे ही खीरा बाहर निकला नेहा की आंखें फटी की फटी रह गई क्योंकि वह बहुत ही लंबा और मोटा था। उसने बिना देर किए उस खीरे को अपने हाथ में लिया और उसे सहलाने लगी और फिर धीरे से उस खीरे को अपने मुंह में ले लिया। रोहन को ऐसा लगा जैसे उसे जन्नत मिल गई हो और वह नेहा के सिर को पकड़कर उसे और गहराई तक अपने मुंह में लेने के लिए प्रेरित करने लगा। खीरा चूसने की आवाज उस शांत रात में बहुत ही कामुक लग रही थी।

अब रोहन से और सब्र नहीं हो रहा था उसने नेहा को बिस्तर पर लेटा दिया और उसकी टांगों को चौड़ा करके उसकी खाई का मुआयना करने लगा। वह खाई गुलाबी और बहुत ही रसीली लग रही थी जिसके आसपास हल्के बाल थे जो उसकी सुंदरता को और बढ़ा रहे थे। रोहन ने अपनी जुबान से उस खाई को चाटना शुरू किया जिससे नेहा बिस्तर की चादरों को मुट्ठी में भींचने लगी और जोर-जोर से कराहने लगी। वह बार-बार कह रही थी कि रोहन अब और इंतजार मत करो और मुझे पूरी तरह से अपनी खुदाई से भर दो क्योंकि मैं अब और सहन नहीं कर पा रही हूँ।

रोहन ने नेहा के ऊपर आकर अपना संतुलन बनाया और अपने भारी खीरे की नोक को उसकी खाई के मुहाने पर रखा। जैसे ही उसने एक जोरदार धक्का लगाया नेहा की एक चीख निकल गई क्योंकि उसकी खाई बहुत तंग थी लेकिन धीरे-धीरे वह खीरा अंदर धंसने लगा। रोहन ने सामने से खोदना शुरू किया और हर धक्के के साथ नेहा के तरबूज जोर-जोर से ऊपर-नीचे उछल रहे थे। कमरे में उनके शरीर के टकराने की चप-चप की आवाज गूँज रही थी और नेहा रोहन के गले लगकर उसके कानों में गंदी बातें कह रही थी जो रोहन के जोश को और ज्यादा बढ़ा रही थीं।

खुदाई की गति अब बहुत तेज हो चुकी थी और रोहन पूरी ताकत के साथ अपने खीरे को नेहा की खाई की गहराइयों तक पहुँचा रहा था। नेहा भी नीचे से अपनी कमर को पूरा साथ दे रही थी और हर धक्के को गहराई से महसूस कर रही थी। रोहन ने उसे घुमाया और पिछवाड़े से खोदना शुरू किया जिससे नेहा के भारी पिछवाड़े की गूँज रोहन के जांघों पर महसूस हो रही थी। इस पोजीशन में खीरा और भी गहराई तक जा रहा था और नेहा के मुंह से निकलने वाली आहें अब सिसकियों में बदल गई थीं क्योंकि उसे चरम सुख का अहसास होने लगा था।

पूरी रात इसी तरह खुदाई का सिलसिला चलता रहा और दोनों एक-दूसरे के शरीर का पूरा रस निचोड़ लेना चाहते थे। रोहन के शरीर से पसीना बहकर नेहा के शरीर पर गिर रहा था और वे दोनों एक-दूसरे में पूरी तरह से खो चुके थे। अंत में जब रोहन का रस छूटने का समय आया तो उसने बहुत ही तेजी से धक्के लगाए और अपना सारा गर्म रस नेहा की खाई के एकदम अंदर छोड़ दिया। नेहा भी उसी समय अपने रस के साथ मुक्त हुई और दोनों एक-दूसरे को बाहों में जकड़कर वहीं बिस्तर पर ढह गए। उनकी सांसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं और वे दोनों एक अनोखे सुकून और संतुष्टि की दुनिया में पहुँच चुके थे।

Leave a Comment

You cannot copy content of this page

error: Content is protected !!