बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और खिड़की के शीशों पर गिरती बूंदों की आवाज कमरे के सन्नाटे को और भी गहरा बना रही थी। संजना भाभी रसोई में चाय बना रही थीं, और उनके शरीर से उठती भीनी-भीनी खुशबू पूरे घर में फैल रही थी। समीर सोफे पर बैठा टीवी देख रहा था, लेकिन उसका ध्यान टीवी पर कम और रसोई की तरफ ज्यादा था। संजना भाभी ने गहरे लाल रंग की साड़ी पहनी हुई थी, जो उनके गोरे रंग पर खूब खिल रही थी। बारिश की वजह से हवा में एक अजीब सी ठंडक थी, लेकिन समीर के भीतर एक अलग ही गर्माहट जन्म ले रही थी। वह संजना भाभी के हर अंग की बनावट को अपनी नज़रों से टटोल रहा था, जो आज कुछ ज्यादा ही आकर्षक लग रही थीं।
संजना भाभी का शरीर किसी तराशी हुई मूरत की तरह था, उनके चौड़े कूल्हे और पतली कमर का संगम हर किसी को पागल कर देने वाला था। साड़ी के ब्लाउज से झांकते उनके भारी और गोल-मटोल तरबूज समीर की धड़कनों को बढ़ा रहे थे। जब वह झुककर चाय छानतीं, तो उनके तरबूजों का उभार और भी स्पष्ट हो जाता था, जिसे देखकर समीर के मन में हलचल होने लगती थी। उनके तरबूजों के ऊपर छोटे-छोटे मटर जैसे दाने साफ़ महसूस किए जा सकते थे, जो ठंड की वजह से शायद थोड़े सख्त हो गए थे। संजना की चाल में एक ऐसी लचक थी कि उनका पिछवाड़ा हर कदम के साथ ताल मिलाता हुआ ऊपर-नीचे होता था, जो किसी को भी मदहोश करने के लिए काफी था।
समीर और संजना के बीच हमेशा से एक प्यारा सा रिश्ता रहा था, लेकिन आज उस रिश्ते में कुछ नयापन और उत्तेजना महसूस हो रही थी। संजना के पति शहर से बाहर थे और इस अकेलेपन ने दोनों के बीच एक भावनात्मक सेतु बना दिया था। समीर ने देखा कि संजना भाभी अक्सर उसे चोरी-छिपे देख रही थीं और उनकी नजरों में भी एक अजीब सी प्यास थी। समीर ने जब उनकी आँखों में देखा, तो संजना ने शर्माकर अपनी पलकें झुका लीं, लेकिन उनके चेहरे पर आई वह गुलाबी मुस्कान समीर का हौसला बढ़ाने के लिए काफी थी। दोनों के बीच एक अनकहा आकर्षण जन्म ले चुका था, जो अब बस एक चिंगारी का इंतजार कर रहा था।
समीर रसोई में गया और संजना के ठीक पीछे खड़ा हो गया, उनकी साड़ी से उठती महक अब उसे पूरी तरह से दीवाना बना रही थी। उसने संजना के कंधे पर अपना हाथ रखा, तो संजना का शरीर एक बार के लिए कांप उठा, लेकिन उन्होंने उसे हटाया नहीं। समीर ने धीरे से उनके कानों के पास जाकर कहा, “भाभी, आज आप बहुत सुंदर लग रही हैं।” संजना ने मुड़कर समीर की तरफ देखा और उनकी सांसें तेज चलने लगीं। समीर ने महसूस किया कि संजना के शरीर में भी वही आग लगी है जो उसके अंदर थी। संजना ने धीमी आवाज में कहा, “समीर, यह क्या कर रहे हो? कोई देख लेगा।” लेकिन उनके शब्दों में मनाही नहीं, बल्कि एक आमंत्रण था।
समीर का हाथ संजना की कमर से सरकते हुए धीरे-धीरे ऊपर की तरफ बढ़ने लगा और उसने पहली बार उनके एक तरबूज को अपनी हथेली में भर लिया। संजना के मुँह से एक हल्की सी कराह निकली और उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। समीर ने उनके तरबूज को धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया और उनके मटर जैसे हिस्से को अपनी उंगलियों के बीच दबाया। संजना का शरीर पूरी तरह से ढीला पड़ गया और वह समीर के सीने से लग गईं। समीर ने अब उनके रेशमी बालों को सहलाया और उनके पिछवाड़े को धीरे-धीरे थपथपाना शुरू किया। हवा में अब सिर्फ उनकी तेज होती सांसों की आवाज सुनाई दे रही थी, जो इस रात को और भी कामुक बना रही थी।
समीर ने अब संजना को गोद में उठा लिया और बेडरूम की तरफ बढ़ गया, जहाँ मंद रोशनी छाई हुई थी। बिस्तर पर लेटाते ही संजना की साड़ी के पल्लू को समीर ने धीरे से हटाया, जिससे उनके दोनों विशाल तरबूज पूरी तरह से सामने आ गए। समीर ने अपनी जीभ से उनके तरबूजों को सहलाना शुरू किया और फिर एक-एक करके उनके मटर को अपने मुंह में ले लिया। संजना बिस्तर की चादर को अपनी उंगलियों से भींचने लगीं और उनके मुँह से ‘उह्ह… आह…’ की आवाजें निकलने लगीं। समीर अब उनके निचले अंगों की तरफ बढ़ा और उनकी साड़ी के साथ-साथ उनके अंतःवस्त्र भी हटा दिए। अब संजना का पूरा शरीर समीर के सामने निर्वस्त्र था, जो कुंदन की तरह चमक रहा था।
समीर ने देखा कि संजना की खाई पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और वहां से एक पारदर्शी रस निकल रहा था। उसने अपनी उंगलियों को धीरे से उनकी खाई के अंदर डाला, तो संजना ने अपनी कमर ऊपर की तरफ उठा ली। समीर की उंगली से खोदना संजना को एक अलग ही आनंद दे रहा था। समीर ने अब अपनी जीभ का इस्तेमाल किया और संजना की खाई चाटना शुरू किया। संजना पागलों की तरह समीर के सिर को अपनी खाई की तरफ दबाने लगीं। वह बार-बार कह रही थीं, “समीर, मुझे और चाहिए, प्लीज… जल्दी करो!” समीर ने अपना सख्त खीरा बाहर निकाला, जिसे देखकर संजना की आँखें फटी की फटी रह गईं। वह खीरा इतना लंबा और मोटा था कि संजना उसे देखकर ही मदहोश हो गई थीं।
संजना ने समीर के खीरे को अपने हाथों में लिया और उसे सहलाने लगीं, फिर धीरे-धीरे उन्होंने उस खीरे को अपने मुंह में ले लिया। समीर को ऐसा महसूस हुआ जैसे वह स्वर्ग में पहुँच गया हो। संजना ने बड़ी ही सफाई से खीरा चूसना जारी रखा, जिससे समीर की उत्तेजना चरम पर पहुँच गई। अब समीर ने संजना को सीधा लेटाया और सामने से खुदाई करने के लिए तैयार हो गया। उसने अपने खीरे की नोक को संजना की गीली खाई पर रखा और एक ही धक्के में उसे अंदर उतार दिया। संजना के मुँह से एक चीख निकली, लेकिन वह दर्द की नहीं, बल्कि असीम सुख की थी। समीर ने अब धीरे-धीरे अपनी कमर चलानी शुरू की और खुदाई की प्रक्रिया तेज कर दी।
हर धक्के के साथ संजना के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और समीर उन्हें अपने हाथों से मसल रहा था। कमरे में ‘चपा-चप’ की आवाजें गूँजने लगीं, जो खुदाई की गहराई को बयां कर रही थीं। संजना ने समीर की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए और अपनी टांगें समीर की कमर के चारों तरफ लपेट लीं। समीर ने अब संजना को घुमाया और उन्हें पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। यह पोजीशन संजना को और भी ज्यादा सुख दे रही थी, क्योंकि समीर का खीरा उनकी खाई की गहराई तक पहुँच रहा था। संजना जोर-जोर से कराह रही थीं, “हाँ समीर… और तेज… मुझे पूरी तरह खोद डालो!” समीर भी अब पूरी ताकत से खुदाई कर रहा था, उसका पूरा पसीना संजना के बदन पर गिर रहा था।
अंत में, जब दोनों की उत्तेजना अपने शिखर पर पहुँच गई, समीर ने एक आखिरी जोरदार धक्का मारा और संजना की खाई के भीतर ही अपना सारा गर्म रस छोड़ दिया। उसी समय संजना का भी रस निकल गया और वह पूरी तरह से निढाल होकर बिस्तर पर गिर पड़ीं। दोनों एक-दूसरे की बाहों में लिपटे हुए गहरी सांसें ले रहे थे। संजना का चेहरा गुलाबी हो गया था और समीर की आँखों में एक अजीब सा सुकून था। इस रात की खुदाई ने उनके बीच के सारे फासलों को खत्म कर दिया था। संजना ने समीर के माथे को चूमा और धीरे से कहा, “तुमने आज मुझे वो सुख दिया है जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।” समीर ने उन्हें और जोर से भींच लिया, और वे दोनों उसी मदहोशी में सो गए।