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बस में मां को चो@@दा

एक रात की वो लंबी बस यात्रा थी, दिल्ली की तरफ़। बस पुरानी वाली थी, लेकिन काफी भीड़भाड़ वाली – सीटें फुल, लोग खड़े भी थे। मैं (राहुल) पिछली सीट पर बैठा था, विंडो वाली। मेरी माँ सरिता जी (४२ साल की) मेरे बगल में थीं। वो सफ़ेद साड़ी में थीं, ब्लाउज टाइट वाला, जो गर्मी की वजह से पसीने से चिपक गया था। पापा काम से बाहर थे, इसलिए हम दोनों ही बस से घर जा रहे थे।

बस रात के १० बजे निकली थी। शुरू में सब ठीक था – लाइट्स कम, लोग सोने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन जैसे-जैसे रास्ता आगे बढ़ा, बस में झटके आने लगे। हर ब्रेक या गड्ढे में माँ का शरीर मेरे से सट जाता। पहले तो मैंने ध्यान नहीं दिया, लेकिन धीरे-धीरे वो स्पर्श अलग लगने लगा। माँ की कमर मेरी जांघ से रगड़ रही थी, उनका कंधा मेरे कंधे से टकरा रहा था। हवा में उनकी चंदन वाली खुशबू और पसीने की मिली-जुली महक फैली हुई थी।

मैंने हल्के से अपनी टांग थोड़ी सी फैलाई, तो माँ की साड़ी का पल्लू सरक गया। उनका ब्लाउज का ऊपरी हिस्सा खुला सा था, और ब्रा की लाइन साफ़ दिख रही थी। मैंने नज़रें फेरने की कोशिश की, लेकिन मन नहीं मान रहा था। माँ सो रही थीं या सोने का नाटक कर रही थीं – उनकी साँसें तेज़ थीं। बस का एक झटका आया, माँ का हाथ मेरी जांघ पर पड़ गया। वो हाथ वहाँ रुक गया। मैं काँप उठा। धीरे से मैंने अपना हाथ उनकी कमर पर रख दिया – जैसे सहारा देने के बहाने।

माँ ने आँखें खोलीं, लेकिन कुछ नहीं कहा। बस अंधेरी थी, पीछे कोई नहीं देख रहा था। मैंने हिम्मत करके उनकी कमर पर हाथ फेरा। उनकी त्वचा गरम थी, नरम। वो शर्मा गईं, लेकिन हाथ हटाया नहीं। बल्कि थोड़ा और करीब सरक आईं। अब उनका सिर मेरे कंधे पर था। मैंने धीरे से उनकी गर्दन पर होंठ रख दिए – एक हल्का सा चु@@न। माँ की साँस रुक गई, लेकिन वो पीछे नहीं हटीं।

धीरे-धीरे मेरे हाथ उनकी साड़ी के नीचे सरक गए। पेटीकोट की नाड़ी खोल दी। माँ ने हल्की सी कराह ली, “बेटा… कोई देख लेगा…” लेकिन आवाज़ इतनी धीमी थी कि रोकने वाली नहीं लग रही थी। मैंने उनकी जांघों पर हाथ फेरा, ऊपर की तरफ़। उनका चू@@त गरम और गीला हो चुका था। मैंने उंगली से छुआ, तो वो काँप उठीं। बस के झटकों में मेरी उंगली अंदर-बाहर होने लगी। माँ ने अपना मुँह मेरे कंधे में दबा लिया, ताकि कराह की आवाज़ न निकले।

अब मैंने अपना लि@@ बाहर निकाला – पैंट की ज़िप खोलकर। माँ ने हाथ बढ़ाकर उसे पकड़ लिया, धीरे-धीरे सहलाने लगीं। मैंने उन्हें थोड़ा ऊपर उठाया, अपनी गोद में बिठा लिया – जैसे बच्चे को बिठाते हैं, लेकिन अब पोज़िशन अलग थी। साड़ी ऊपर थी, पेटीकोट भी। मैंने धीरे से अपना ल@ंड उनके चू@@त पर रखा और एक झटके में अंदर धकेल दिया। माँ की आँखें बंद हो गईं, मुँह से हल्की सी सिसकारी निकली।

बस के हर झटके के साथ मैं धक्का मार रहा था। माँ की टांगें मेरी कमर पर लिपटी हुईं, हाथ मेरी पीठ पर नाखून गाड़े हुए। हम दोनों चुप थे, सिर्फ़ साँसों की आवाज़ और बस की आवाज़। माँ की चू@@त कसकर मेरे ल@ंड को जकड़ रही थी। मैंने उनकी स्त@@ को ब्लाउज के ऊपर से दबाया, नि@@ल को चूसा। माँ बोलीं, “जोर से… हाय बेटा… फाड़ दो मुझे…”

स्पीड बढ़ गई। बस रुकी नहीं थी, लेकिन हमारा सफर अलग था। अचानक माँ का शरीर काँपने लगा, “आ रहा है… मैं झ@@ड़ रही हूँ…” और वो जोर से मेरे से लिपट गईं। मैं भी रुक नहीं पाया – पूरी व@@र्य उनके अंदर छोड़ दी। दोनों थककर एक-दूसरे से चिपके रहे। साड़ी ठीक की, कोई कुछ नहीं समझा।

सुबह पहुँचते-पहुँचते माँ ने मेरे कान में फुसफुसाया, “अगली बार भी ऐसे ही सफर करेंगे, बेटा।” मैंने बस मुस्कुराकर सिर हिलाया। वो रात की बस यात्रा अब हमारी सबसे यादगार यात्रा बन गई थी।

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