बॉस संग दफ्तर में चुदाई—>
रात के ग्यारह बज चुके थे और ऑफिस की ऊँची इमारत के उस बाईसवें माले पर सन्नाटा पसरा हुआ था सिवाय उस एक केबिन के जहाँ स्नेहा अभी भी फाइलों के ढेर में डूबी हुई थी। स्नेहा, जिसकी उम्र करीब बत्तीस साल थी, अपने काम में जितनी माहिर थी, उसका शरीर उससे कहीं ज्यादा मोहक और सुडौल था। आज उसने गहरे नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी, जो उसके अंगों से इस कदर चिपकी थी जैसे उसकी दूसरी त्वचा हो। जब वह चलती थी, तो उसका पिछवाड़ा एक लय में हिलता था जो किसी भी मर्द की धड़कनें बढ़ा दे। केबिन के कांच के पार से उसे अपने बॉस रजत देख रहे थे। रजत एक कड़क मिजाज लेकिन बेहद प्रभावशाली व्यक्तित्व के मालिक थे, जिनकी उम्र करीब पैंतालीस थी।
स्नेहा जब अपनी सीट से उठी तो उसकी साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसक गया, जिससे उसके उभरे हुए तरबूज की गहरी खाई और गोलाई साफ झलकने लगी। वह अपने हाथों को ऊपर उठाकर अंगड़ाई ले रही थी, जिससे उसका पेट और कमर की कोमलता और भी निखर उठी थी। रजत ने अपने केबिन का दरवाजा खोला और धीरे से बाहर आए। स्नेहा की नजरें उनसे मिलीं और एक अजीब सी बिजली दौड़ गई। स्नेहा के तरबूज उसकी सांसों के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे, जिससे उन पर लगे छोटे-छोटे मटर अब अपनी मौजूदगी का एहसास कराने लगे थे। रजत की निगाहें स्नेहा के उन रसीले अंगों पर टिक गई थीं, जिन्हें देखकर उनके मन में सदियों की प्यास जाग उठी थी।
रजत धीरे-धीरे स्नेहा के पास आए और बोले, ‘स्नेहा, बहुत देर हो गई है, तुम्हें अब घर जाना चाहिए।’ स्नेहा ने अपनी मखमली आवाज में जवाब दिया, ‘बस सर, ये आखिरी फाइल बची है।’ जैसे ही स्नेहा ने फाइल रजत की ओर बढ़ाई, उनके हाथ आपस में टकराए। वह पहला स्पर्श ही इतना कामुक था कि दोनों के शरीर में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। रजत ने अपना हाथ हटाया नहीं, बल्कि स्नेहा की कोमल हथेली को धीरे से सहलाया। स्नेहा की आँखें झुक गईं, लेकिन उसने अपना हाथ पीछे नहीं खींचा। उसके मन में एक द्वंद्व चल रहा था—एक तरफ ऑफिस की गरिमा और दूसरी तरफ एक दबी हुई तीव्र इच्छा जो सालों से उसके भीतर सुलग रही थी।
रजत की सांसें अब स्नेहा की गर्दन पर महसूस हो रही थीं। उन्होंने धीरे से स्नेहा की कमर पर अपना हाथ रखा और उसे अपनी ओर खींचा। स्नेहा की साड़ी के नीचे दबे हुए उसके भारी तरबूज अब रजत की चौड़ी छाती से सट गए थे। स्नेहा ने एक हल्की सी आह भरी और अपनी आँखें मूंद लीं। रजत ने स्नेहा के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके होंठों को अपने होंठों से ढंक दिया। उन दोनों के बीच होंठों का यह रसपान इतना गहरा था कि दुनिया की सारी सुध-बुध खो गई। स्नेहा ने अपने हाथ रजत की गर्दन के पीछे डाल दिए और उसे और जोर से अपनी ओर खींचने लगी। कमरे का तापमान अचानक बढ़ गया था और दोनों के शरीर पसीने से भीगने लगे थे।
रजत ने धीरे-धीरे स्नेहा की साड़ी के पल्लू को नीचे गिरा दिया, जिससे उसके विशाल और सख्त तरबूज अब सिर्फ एक पतले से ब्लाउज की कैद में थे। रजत ने अपनी उंगलियों से स्नेहा के ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। जैसे ही ब्लाउज खुला, स्नेहा के दूधिया और गोरे तरबूज पूरी तरह आजाद हो गए। उनके बीच की गहरी खाई रजत को निमंत्रण दे रही थी। रजत ने झुककर उन मटरों को अपने मुंह में लिया और उन्हें चूसने लगे। स्नेहा के मुंह से सिसकारियां निकलने लगीं और वह रजत के बालों में अपनी उंगलियां फंसाकर उन्हें और जोर से अपने अंगों की ओर दबाने लगी। उसे महसूस हो रहा था कि रजत की पेंट के नीचे उनका खीरा अब पूरी तरह से अकड़ कर तैयार हो चुका है।
रजत ने स्नेहा को ऑफिस की बड़ी सी मेज पर लिटा दिया। उसने स्नेहा की साड़ी और पेटीकोट को ऊपर सरकाया, जिससे स्नेहा की रेशमी जांघें और उसके बीच का वह घना जंगल साफ दिखने लगा। स्नेहा की खाई अब पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और उससे एक भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी। रजत ने अपनी उंगलियों से उस खाई को सहलाया, जिससे स्नेहा का पूरा शरीर कांप उठा। उसने अपनी उंगली से उस खाई में खुदाई शुरू की, जिससे स्नेहा की कराहें केबिन की दीवारों से टकराने लगीं। वह अपने कूल्हों को ऊपर उठाकर रजत की उंगलियों का साथ देने लगी। रजत ने अब और इंतजार न करते हुए अपनी पेंट उतारी और अपना विशाल और कड़क खीरा बाहर निकाला।
खीरे की लंबाई और मोटाई देखकर स्नेहा की आँखें फटी रह गई थीं। रजत ने स्नेहा की दोनों टांगों को अपने कंधों पर रखा और अपने खीरे के अगले हिस्से को स्नेहा की उस गीली और तंग खाई के मुहाने पर टिका दिया। स्नेहा ने घबराहट और उत्तेजना में अपनी मुट्ठियां भींच लीं। जैसे ही रजत ने एक गहरा धक्का मारा, उनका आधा खीरा उस तंग खाई के भीतर समा गया। स्नेहा के मुंह से एक चीख निकल गई, ‘उफ्फ… सर… बहुत बड़ा है!’ लेकिन रजत ने उसे चूमकर शांत किया और धीरे-धीरे अपने खीरे को पूरी तरह भीतर उतार दिया। अब उनकी खुदाई की प्रक्रिया पूरी रफ्तार पकड़ चुकी थी। हर धक्के के साथ स्नेहा के तरबूज जोर-जोर से उछल रहे थे और मेज की चू-चू की आवाज पूरे कमरे में गूंज रही थी।
रजत अब पूरी ताकत से स्नेहा को खोद रहे थे। वह कभी स्नेहा को मेज पर लिटाकर सामने से खुदाई करते, तो कभी उसे उल्टा करके उसके पिछवाड़े की ओर से खुदाई शुरू कर देते। स्नेहा इस आनंद के सागर में पूरी तरह डूब चुकी थी। उसे लग रहा था जैसे उसका पूरा अस्तित्व उस खीरे के इर्द-गिर्द सिमट गया है। उसकी खाई से निकलने वाला रस अब उनके अंगों को और भी चिकना बना रहा था। रजत ने स्नेहा के पिछवाड़े को अपने हाथों से पकड़कर जोर-जोर से झटके देने शुरू किए। स्नेहा की चीखें और सिसकारियां अब बेकाबू हो चुकी थीं। वह बार-बार कह रही थी, ‘हाँ… और जोर से… मुझे और खोदो!’ कमरे में सिर्फ उनके टकराने की आवाजें और भारी सांसें ही सुनाई दे रही थीं।
करीब आधे घंटे की उस भीषण खुदाई के बाद, दोनों का शरीर पसीने से लथपथ हो गया था। स्नेहा अब अपने रस छूटने के करीब थी। उसने रजत को कसकर पकड़ लिया और उसके पैरों में कंपन होने लगा। अचानक स्नेहा का शरीर जोर से अकड़ा और उसकी खाई से भारी मात्रा में रस निकलने लगा। स्नेहा के इस चरम आनंद को देखकर रजत भी अब खुद को रोक नहीं पाए। उन्होंने अपने खीरे को गहराई तक धंसाया और अपना सारा गरम रस स्नेहा की उस पवित्र खाई के भीतर उड़ेल दिया। दोनों एक-दूसरे के ऊपर ढह गए, उनकी सांसें एक-दूसरे में घुली हुई थीं और दिलों की धड़कनें मानो एक ही लय में बज रही थीं।
कुछ देर तक दोनों उसी अवस्था में पड़े रहे। सन्नाटा फिर से केबिन में लौट आया था, लेकिन अब वह सन्नाटा पहले जैसा नहीं था। स्नेहा की हालत ऐसी थी जैसे किसी ने उसे पूरी तरह निचोड़ दिया हो, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सी संतुष्टि और चमक थी। रजत ने स्नेहा के माथे को चूमा और उसे धीरे से उठाया। दोनों ने एक-दूसरे की मदद से अपने कपड़े ठीक किए। उस रात ऑफिस की उस मेज ने एक ऐसी कहानी देखी थी जो कागजों पर नहीं, बल्कि रूह और जिस्म पर लिखी गई थी। स्नेहा और रजत के बीच अब सिर्फ एक बॉस और कर्मचारी का रिश्ता नहीं रह गया था, बल्कि एक ऐसा गहरा राज जुड़ गया था जो उन्हें हमेशा एक-दूसरे के करीब रखेगा।