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भिखारी से चुदा@@ई

कोमल एक 32 साल की विवाहित महिला थी, जो दिल्ली के एक छोटे से अपार्टमेंट में अपने पति राजेश के साथ रहती थी। राजेश एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर था, जो सुबह से शाम तक ऑफिस में व्यस्त रहता था। उनकी शादी को 8 साल हो चुके थे, लेकिन कोमल की जिंदगी में वो जुनून और संतुष्टि नहीं थी जो वो चाहती थी। राजेश का स@@ ल@@फ बहुत साधारण था – हफ्ते में एक-दो बार, जल्दबाजी में, बिना किसी उत्साह के। कोमल की बॉडी अभी भी जवानी से भरी हुई थी – गोरी चमड़ी, भरे हुए स@@न, पतली कमर और गोल नितंब। वो अक्सर घर में अकेली बैठकर अपनी उंगलियों से खुद को संतुष्ट करने की कोशिश करती, लेकिन वो गहरा ऑर्गेज्म, वो दर्द और मजा का मिश्रण जो वो किताबों और वीडियो में देखती थी, वो कभी नहीं मिलता। उसकी च@@त हमेशा तरसती रहती थी किसी बड़े, मजबूत ल@@ड के लिए जो उसे रगड़-रगड़ कर च@@दे।

एक दिन, दोपहर का समय था। राजेश ऑफिस चला गया था और कोमल बाजार सब्जी लेने निकली। गर्मी की वजह से सड़कें सूनी थीं। वो अपनी स्कूटी से जा रही थी जब उसकी नजर सड़क किनारे एक भिखारी पर पड़ी। वो आदमी करीब 40 साल का होगा, गंदा, मैला-कुचैला, बाल बिखरे हुए। वो एक पेड़ के नीचे लेटा हुआ था, उसके कपड़े फटे हुए थे – पैंट का आगे का हिस्सा पूरी तरह फटा था और उसका ल@@ड बाहर निकला हुआ था। वो खड़ा था, पूरा तना हुआ – कम से कम 9 इंच लंबा और 4 इंच मोटा। काला, मोटी नसों वाला, टोपे पर चमकती हुई प्री-क@@ की बूंदें। कोमल की स्कूटी रुक गई। वो स्तब्ध होकर देखती रही। उसका दिल जोर से धड़कने लगा, सांसें तेज हो गईं। “ओह गॉड… इतना बड़ा… इतना मोटा…” वो मन ही मन सोच रही थी। उसकी च@@त में अचानक गीलापन महसूस हुआ, जैसे पानी की धार बहने लगी हो। उसकी प@@टी गीली हो गई, जांघें आपस में रगड़ने लगीं। वो वहां से आगे बढ़ गई, लेकिन दिमाग में वो दृश्य घूमता रहा – वो विशाल ल@@ड, जो किसी जानवर जैसा लग रहा था।

घर पहुंचकर कोमल ने दरवाजा बंद किया और सीधे बेडरूम में चली गई। वो सोफे पर बैठ गई, लेकिन रुक नहीं पाई। “क्या था वो? एक भिखारी का… लेकिन इतना बड़ा? राजेश का तो आधा भी नहीं है।” वो सोचते हुए अपनी साड़ी ऊपर उठाई और उंगली अपनी च@@त में डाल ली। वो गीली थी, चिपचिपी। उंगली अंदर-बाहर करने लगी, लेकिन दिमाग में वो ल@@ड घूम रहा था। “अगर वो मुझे च@@दता… उफ्फ… वो मोटाई मेरी च@@त को फाड़ देगी… दर्द होगा, लेकिन मजा… वो गहरा मजा…” वो तेज-तेज उंगली करती गई, अपनी क्ल@@ट को रगड़ती गई। उसका शरीर कांपने लगा, लेकिन ऑर्गेज्म नहीं आया – सिर्फ और ज्यादा तरस बढ़ गई। पूरी रात वो करवटें बदलती रही, राजेश के साथ सोते हुए भी दिमाग में वही भिखारी था।

अगले दिन सुबह राजेश ऑफिस चला गया। कोमल ने नाश्ता किया, लेकिन मन नहीं लगा। वो तैयार हुई – एक टाइट ब्लाउज और साड़ी पहनी, जिसमें उसके स@@न उभरे हुए दिख रहे थे। “आज जाऊंगी… देखूंगी वो है या नहीं।” वो बाजार के बहाने निकल पड़ी। सड़क पर पहुंची तो वो भिखारी वही था, उसी जगह लेटा हुआ। आज उसके कपड़े और ज्यादा फटे लग रहे थे, ल@@ड फिर से बाहर, आधा खड़ा। कोमल ने स्कूटी रोकी और उतर गई। वो उसके पास गई, झुककर बोली, “भाई साहब, भूख लगी है? मेरे घर चलो, खाना दूंगी।”

भिखारी ने ऊपर देखा, उसकी आंखें चमक उठीं। उसका नाम था बब्बू, लेकिन वो कुछ नहीं बोला। कोमल ने फिर कहा, “चलो ना, मैं अकेली हूं घर में। थोड़ा साफ-सुथरा हो जाओ, खाना मिलेगा।” बब्बू उठा, उसके ल@@ड को देखकर कोमल की च@@त फिर गीली हो गई। वो उसे स्कूटी पर पीछे बिठाकर घर ले आई। घर पहुंचकर कोमल ने दरवाजा बंद किया और बब्बू को बाथरूम में भेजा, “नहा लो पहले।” बब्बू नहाया, बाहर आया तो कोमल ने उसे एक पुरानी शर्ट और पैंट दी। लेकिन बब्बू की नजर कोमल पर थी – उसके भरे स@@नों पर, कमर पर।

कोमल ने उसे सोफे पर बिठाया और चाय दी। बातें करने लगी, “तुम कहां से हो? परिवार है?” बब्बू ने कहा, “मैडम, मैं गांव से हूं, काम नहीं मिला तो यहां आ गया। अकेला हूं।” कोमल करीब बैठ गई, उसकी जांघ से सटकर। “तुम्हारा… वो… कल मैंने देखा था। बहुत बड़ा है।” बब्बू चौंक गया, लेकिन मुस्कुराया। “मैडम, आप जैसी सुंदर औरत कभी नहीं देखी।” कोमल का हाथ उसके ल@@ड पर चला गया, जो पैंट के अंदर सख्त होने लगा। “दिखाओ ना… मुझे छूने दो।”

बब्बू ने पैंट उतारी। उसका ल@@ड बाहर आ गया – पूरा 9 इंच, 4 इंच मोटा, काला और नसों से भरा। कोमल की आंखें फैल गईं। “ओह्ह… इतना बड़ा… राजेश का तो छोटा सा है।” वो घुटनों पर बैठ गई और हाथ से पकड़ लिया। मोटाई इतनी कि पूरा हाथ नहीं घेर पा रही थी। वो मुंह से च@@सने लगी, टोपे को जीभ से चाटा। “उम्म्म… कितना स्वादिष्ट… कितना गर्म।” बब्बू कराह उठा, “मैडम… आह्ह… कोई औरत ने कभी ऐसे नहीं किया।” कोमल ने गहराई से च@@सा, गले तक लिया, लेकिन मोटाई से गला दुखने लगा। वो खांसने लगी, लेकिन मजा आ रहा था।

फिर कोमल उठी और अपनी साड़ी उतार दी। उसके स@@न ब्रा से बाहर उछल पड़े – 36D साइज, गुलाबी न@@ल। बब्बू ने उन्हें पकड़ लिया, जोर से दबाया। “आह्ह… दबाओ… जोर से… दर्द हो रहा है लेकिन अच्छा लग रहा है।” बब्बू ने एक न@@ल मुंह में लिया, च@@सा, काटा। कोमल की च@@त बह रही थी। वो बेड पर लेट गई, टांगें फैलाईं। “च@@दो मुझे… अपना ये राक्षस डालो अंदर।” बब्बू ऊपर आया, ल@@ड को च@@त पर रगड़ा। च@@त गीली थी, लेकिन मोटाई देखकर कोमल डर गई। “धीरे… उफ्फ… फट जाएगी।”

बब्बू ने धक्का दिया। टोपा अंदर गया, कोमल चीख उठी, “आआआआह्ह्ह… दर्द हो रहा है… इतना मोटा… फाड़ दिया तुमने।” लेकिन मजा भी आ रहा था – वो दर्द जो मीठा था। बब्बू ने और धक्का दिया, आधा ल@@ड अंदर। कोमल की च@@त खिंच रही थी, दीवारें फैल रही थीं। “ओह्ह गॉड… गहरा… और गहरा… च@@दो मुझे भिखारी… मैं तुम्हारी र@@ी हूं आज।” बब्बू ने पूरा ल@@ड डाल दिया, 9 इंच पूरा अंदर। कोमल का शरीर कांप उठा, आंखों से आंसू आ गए। “आह्ह… दर्द… लेकिन मजा… उफ्फ… हिलाओ अब।”

बब्बू ने धक्के मारने शुरू किए – धीरे से, फिर तेज। हर धक्के में ल@@ड च@@त की गहराई छूता, जी-@@ट पर लगता। कोमल कराह रही थी, “आह्ह… हां… जोर से… फाड़ दो मेरी च@@त को… राजेश कभी ऐसे नहीं च@@दता।” बब्बू बोला, “मैडम… आपकी च@@त इतनी टाइट… गर्म… मैं रोज च@@दूंगा।” धक्के तेज हो गए, कमरा थप-थप की आवाज से गूंज रहा था। कोमल की कमर उछल रही थी, स@@न हिल रहे थे। वो अपनी क्ल@@ट रगड़ रही थी। अचानक ऑर्गेज्म आया – गहरा, तीव्र। “आआआआह्ह्ह… कमिंग… ओह्ह फक… मेरी च@@त फट रही है… पानी निकल रहा है।” उसकी च@@त ने ल@@ड को निचोड़ लिया, पानी की धार छूट गई, बब्बू का ल@@ड गीला हो गया। लेकिन बब्बू नहीं रुका, और तेज च@@दता रहा।

फिर बब्बू ने उसे घोड़ी बनाया। कोमल घुटनों पर झुकी, नितंब ऊपर। बब्बू ने पीछे से ल@@ड डाला – इस बार और गहरा गया। “आह्ह… पीछे से… इतना गहरा… मेरी बच्चेदानी छू रहा है।” बब्बू ने बाल पकड़े, कमर पकड़ी और जोर-जोर से ठोकने लगा। “ले र@@ी… ले मेरा ल@@ड… भिखारी का ल@@ड ले।” कोमल चिल्ला रही थी, “हां… च@@दो… मैं तुम्हारी रखैल हूं… दर्द हो रहा है लेकिन रोकना मत।” दूसरा ऑर्गेज्म आया – और गहरा, शरीर झनझना उठा, पैर कांपने लगे। बब्बू ने और 10 मिनट च@@दा, फिर बोला, “मैडम… आने वाला है।” कोमल ने कहा, “अंदर ही डालो… भर दो मेरी च@@त को।” बब्बू ने कराहते हुए व@@य छोड़ा – गर्म, गाढ़ा, च@@त भर गई। कोमल तीसरी बार झड़ी, “ओह्ह… गर्म… भर गया… परफेक्ट।”

दोनों थककर लेट गए। कोमल की च@@त दुख रही थी, सूजी हुई, लेकिन संतुष्टि थी। “तुम रोज आना… मैं तुम्हें रखूंगी।” बब्बू मुस्कुराया। उस दिन से कोमल की जिंदगी बदल गई – वो अब संतुष्ट थी, लेकिन तरस अभी भी बाकी थी।

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