गर्मियों की उन लंबी और बोझिल दोपहरियों में जब सूरज की तपिश दीवारों को झुलसाने लगती थी, उस वक्त घर के भीतर का सन्नाटा भी एक अलग ही कहानी बुन रहा होता था। मैं कॉलेज की छुट्टियों में अपने मामा के घर आया हुआ था, जहाँ मेरी मामी सुमन रहती थीं, जो अपनी उम्र के तीसरे दशक के मध्य में थीं और जिनकी सुंदरता पूरे मोहल्ले में मशहूर थी। सुमन मामी का बदन किसी सजी हुई मूरत की तरह था, उनके उभरे हुए और रसीले ‘तरबूज’ साड़ी के पल्लू से झांकने की कोशिश करते थे, जैसे उन्हें बाहर की हवा की सख्त जरूरत हो। मामा अक्सर काम के सिलसिले में शहर से बाहर रहते थे, और उस दिन भी घर में सिर्फ मैं और मामी अकेले थे, रसोई की खिड़की से आती हल्की धूप उनके चेहरे को और भी ज्यादा चमका रही थी। मैंने उन्हें कई बार चोरी-छिपे देखा था, जब वे झुककर काम करती थीं तो उनके ‘पिछवाड़े’ का भारीपन और गोलाई मेरी धड़कनों को एक नई रफ्तार दे देती थी, जिसे देखकर मेरा मन मचल उठता था।
सुमन मामी का व्यक्तित्व जितना शांत था, उनकी आँखों में उतनी ही गहरी शरारत छिपी रहती थी, जो कभी-कभी मुझे देखते ही मुस्कुरा उठती थीं। उस दोपहर मैं रसोई के पास से गुजर रहा था, तभी मैंने देखा कि मामी ऊपर के डिब्बे से कुछ उतारने की कोशिश कर रही थीं, जिससे उनकी साड़ी कमर से ऊपर खिसक गई थी। उनके पेट की गोलाई और नाभि का वह गहरा गड्ढा देखकर मेरा ‘खीरा’ अपनी जगह पर अंगड़ाई लेने लगा और पजामे के भीतर अपनी मौजूदगी का अहसास कराने लगा। मैंने हिम्मत जुटाई और उनके पास जाकर मदद की पेशकश की, जैसे ही मैंने हाथ बढ़ाकर डिब्बा उतारा, मेरा शरीर उनके रेशमी बदन से हल्का सा टकरा गया। वह स्पर्श बिजली के झटके की तरह था, जिसने हम दोनों के बीच की झिझक की दीवार को एक पल में हिलाकर रख दिया था, और हम दोनों की नजरें एक-दूसरे से टकराकर फौरन झुक गईं।
मामी के चेहरे पर एक अजीब सी लाली छा गई थी, उनकी साँसें थोड़ी तेज चलने लगी थीं, जिससे उनके भारी ‘तरबूज’ ऊपर-नीचे होने लगे थे। रसोई की उस छोटी सी जगह में हम दोनों के बीच का तनाव साफ महसूस किया जा सकता था, मानो हवा में भी कामुकता का जहर घुल गया हो। मैंने देखा कि उनके ब्लाउज के भीतर से उनके ‘मटर’ अब पूरी तरह से अकड़ चुके थे, जो पतले कपड़े के ऊपर से साफ झलक रहे थे और मुझे अपनी ओर बुला रहे थे। मेरा मन और शरीर दोनों एक अघोषित युद्ध लड़ रहे थे, लेकिन उनकी आँखों में छिपी वह मूक सहमति मुझे आगे बढ़ने का इशारा दे रही थी। मैंने धीरे से अपना हाथ उनकी पतली कमर पर रखा, उनकी त्वचा मखमल की तरह मुलायम और आग की तरह गर्म थी, जिसने मेरे भीतर की उत्तेजना को और भी भड़का दिया।
जैसे ही मेरा हाथ उनकी कमर से सरकते हुए उनके ‘पिछवाड़े’ के पास पहुँचा, उन्होंने एक गहरी आह भरी और अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे वह बरसों से इसी स्पर्श का इंतजार कर रही हों। मैंने उन्हें धीरे से अपनी ओर खींचा और उनके गले के पास अपनी साँसें छोड़ने लगा, जहाँ से चमेली के तेल और पसीने की मिली-जुली एक नशीली खुशबू आ रही थी। मामी ने पलटकर मुझे देखा और अपनी कांपती हुई उंगलियों से मेरे बालों को सहलाने लगीं, उनकी आँखों में अब शर्म नहीं, बल्कि एक बेपनाह प्यास थी। हम दोनों की धड़कनें अब एक लय में बज रही थीं, और रसोई का वह कोना हमारी गुप्त ‘खुदाई’ का गवाह बनने के लिए पूरी तरह तैयार खड़ा था। मैंने झुककर उनके होठों का रस पीना शुरू किया, वह अहसास इतना गहरा और भावुक था कि मुझे अपनी सुध-बुध खोने का डर सताने लगा।
धीरे-धीरे मेरे हाथ उनके शरीर के हर हिस्से को टटोलने लगे, मैंने साड़ी के पल्लू को नीचे गिराया तो उनके विशाल ‘तरबूज’ पूरी तरह से आजाद होकर मेरे सामने आ गए। मैंने अपने हाथों में उन रसीले फलों को भरा और उन्हें हल्के से दबाने लगा, जिससे मामी के मुँह से सिसकारी फूट पड़ी और उन्होंने अपना सिर मेरे कंधे पर टिका दिया। उनके ‘मटर’ अब मेरे अंगूठे के नीचे रगड़ खा रहे थे, जिससे उनके शरीर में एक सिहरन दौड़ रही थी और उनकी टांगें आपस में रगड़ने लगी थीं। मुझे महसूस हुआ कि उनकी ‘खाई’ से अब रस रिसने लगा है, क्योंकि उनकी पेटीकोट के पास का हिस्सा गीला दिखने लगा था, जो हमारी आने वाली ‘खुदाई’ का स्पष्ट संकेत था। मैंने उनके कानों के पास फुसफुसाते हुए कहा कि वह कितनी सुंदर हैं, और मामी ने बस मुझे और कसकर पकड़ लिया, जैसे वह मुझे अपने भीतर समा लेना चाहती हों।
मैंने धीरे से उनके कपड़े उतारना शुरू किया, एक-एक करके हर पर्दा हटता गया और उनका दूधिया बदन रसोई की मद्धम रोशनी में चमकने लगा। जब वह पूरी तरह निर्वस्त्र हुईं, तो उनके ‘पिछवाड़े’ की विशालता और उनकी ‘खाई’ के चारों ओर मौजूद घने काले ‘बाल’ देखकर मेरा ‘खीरा’ पूरी तरह से पत्थर की तरह सख्त हो गया। मैंने उन्हें रसोई के स्लैब पर बैठाया और उनके दोनों पैरों को फैलाकर उनकी ‘खाई’ का निरीक्षण करने लगा, जो गुलाबी और गीली होकर मेरा स्वागत करने के लिए बेताब थी। मैंने अपनी उंगली को उस गहराई में उतारा और धीरे-धीरे उसे अंदर-बाहर करने लगा, मामी की कराहें अब रसोई की दीवारों से टकराकर वापस आ रही थीं। वह अपने हाथ स्लैब पर टिकाकर पीछे की ओर झुक गईं, जिससे उनके ‘तरबूज’ और भी ज्यादा तन गए थे, और मैं बारी-बारी से उन्हें अपने मुँह में लेकर उनका आनंद लेने लगा।
मामी की ‘खाई’ अब पूरी तरह से सैलाब की तरह बह रही थी, उन्होंने मेरे पजामे की डोरी खींची और मेरे ‘खीरे’ को बाहर निकाल लिया, जो अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ उनके सामने खड़ा था। उन्होंने उसे अपने कोमल हाथों में पकड़ा और उसे धीरे से सहलाने लगीं, जिससे मुझे स्वर्ग जैसा सुख महसूस होने लगा, फिर उन्होंने उसे अपने मुँह के पास ले जाकर उसे चूमना शुरू किया। उनके मुँह की गर्मी और जीभ का स्पर्श मेरे ‘खीरे’ को और भी बेकाबू बना रहा था, और मैंने महसूस किया कि अब ‘खुदाई’ शुरू करने का वक्त आ गया है। मैंने उन्हें स्लैब पर ही सीधा लिटाया, जो कि ‘सामने से खोदने’ की सबसे सही स्थिति थी, और उनके दोनों पैरों को अपने कंधों पर रख लिया ताकि गहराई तक पहुँच सकूँ। जैसे ही मैंने अपने ‘खीरे’ की नोक को उनकी ‘खाई’ के मुहाने पर रखा, हम दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देखा, जहाँ अटूट विश्वास और जुनून की आग जल रही थी।
मैंने एक गहरा धक्का दिया और मेरा ‘खीरा’ आधी लंबाई तक उनकी तंग ‘खाई’ के भीतर समा गया, मामी ने दर्द और खुशी की एक मिली-जुली चीख निकाली और मेरी बाहों को कसकर पकड़ लिया। वह जगह इतनी तंग थी कि मुझे अंदर जाने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही थी, लेकिन उनकी गीलाहट ने काम आसान कर दिया था। मैंने रुक-रुक कर धक्के लगाने शुरू किए, हर धक्के के साथ मेरा ‘खीरा’ उनकी ‘खाई’ की गहराइयों को नाप रहा था और मामी अपनी कमर उठाकर मेरा साथ दे रही थीं। रसोई के बर्तन आपस में टकराकर एक लयबद्ध संगीत पैदा कर रहे थे, और हमारी ‘खुदाई’ अब अपनी पूरी रफ्तार पकड़ने लगी थी। “ओह राहुल, तुम तो बहुत गहरे जा रहे हो, मुझे बहुत अच्छा लग रहा है,” मामी ने सिसकते हुए कहा, और उनके उन शब्दों ने मेरे भीतर एक नया जोश भर दिया।
काफी देर तक ‘सामने से खोदने’ के बाद मैंने उन्हें पलटने के लिए कहा, क्योंकि मुझे उनके ‘पिछवाड़े’ का आनंद लेना था, जो पीछे से देखने पर पहाड़ियों की तरह लग रहे थे। वह घुटनों के बल बैठ गईं और उन्होंने अपना सिर नीचे झुका लिया, जिससे उनका ‘पिछवाड़ा’ ऊपर की ओर उठ गया और उनकी ‘खाई’ पीछे से साफ दिखने लगी। मैंने पीछे से अपना ‘खीरा’ फिर से उनकी गहराई में उतारा, यह ‘पिछवाड़े से खोदने’ का तरीका बेहद रोमांचक था क्योंकि हर धक्के के साथ मेरे अंडकोष उनके ‘पिछवाड़े’ से टकरा रहे थे। आवाजें अब और भी तेज हो गई थीं, चपाक-चपाक की आवाज पूरी रसोई में गूँज रही थी और मामी का पूरा बदन पसीने से नहा चुका था। उनकी ‘खाई’ अब पूरी तरह से खुल चुकी थी और मेरा ‘खीरा’ बिना किसी बाधा के अंदर-बाहर हो रहा था, जिससे हम दोनों का ‘रस छूटने’ की कगार पर पहुँच गया था।
मामी अब पूरी तरह से बेसुध हो चुकी थीं, उनकी आँखें ऊपर चढ़ गई थीं और वह पागलों की तरह अपना सिर हिला रही थीं, “और तेज राहुल, मुझे पूरी तरह से खोदो, आज मेरा सारा रस निकाल दो!” उनकी यह मांग सुनकर मैंने अपनी गति और बढ़ा दी, मेरा पूरा शरीर अब एक मशीन की तरह काम कर रहा था। मुझे महसूस हुआ कि उनकी ‘खाई’ के भीतर की दीवारें अब मेरे ‘खीरे’ को बुरी तरह जकड़ रही हैं, जिसका मतलब था कि उनका ‘रस निकलने’ वाला है। अचानक उन्होंने एक लंबी और तीखी चीख निकाली और उनका शरीर पूरी तरह से कांपने लगा, उनकी ‘खाई’ से गर्म रस का फव्वारा छूटा जिसने मेरे ‘खीरे’ को पूरी तरह भिगो दिया। उसी पल, मैं भी अपने आप को रोक नहीं पाया और मैंने अपने ‘खीरे’ का सारा गर्म और गाढ़ा रस उनकी गहराई के अंतिम छोर तक पहुँचा दिया।
हम दोनों एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े, हमारी साँसें इतनी तेज थीं जैसे हमने कोई बहुत बड़ा युद्ध जीत लिया हो, रसोई का फर्श अब हमारे पसीने और ‘रस’ से भीग चुका था। मामी ने मुझे अपनी बाहों में भर लिया और मेरे माथे पर एक प्यार भरा चुंबन दिया, उनकी आँखों में अब एक संतुष्टि और सुकून की चमक थी जो पहले कभी नहीं देखी थी। वह पल इतना भावुक था कि हमें समय का अहसास ही नहीं रहा, हम बस उसी अवस्था में लेटे रहे, एक-दूसरे की त्वचा को महसूस करते हुए। इस ‘खुदाई’ ने हमारे रिश्ते को एक नया आयाम दे दिया था, जहाँ अब कोई परदा नहीं था, सिर्फ एक-दूसरे की जरूरत और बेपनाह चाहत थी। धीरे-धीरे हम दोनों ने अपने कपड़े समेटे और खुद को साफ किया, लेकिन वह गर्मी और वह अहसास अभी भी हमारे रोम-रोम में बसा हुआ था।
जब हम रसोई से बाहर आए, तो घर का सन्नाटा अभी भी वैसा ही था, लेकिन हम दोनों के भीतर एक नई हलचल मच चुकी थी जो ताउम्र रहने वाली थी। मामी ने मुस्कुराते हुए मेरी ओर देखा और फिर से रसोई के काम में लग गईं, जैसे कुछ हुआ ही न हो, लेकिन उनके चेहरे की वह लाली सब कुछ बयां कर रही थी। मैंने भी अपने कमरे में जाकर लेट गया और उस अद्भुत दोपहर की यादों को अपने मन में सहेजने लगा, यह सोचकर कि यह तो बस शुरुआत है। इस ‘खुदाई’ ने हमारे बीच के उस सूनेपन को भर दिया था जिसे बरसों से किसी ने नहीं छुआ था, और अब हमें अगले मौके का इंतजार था।
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