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रेखा मौसी की अधूरी प्यास और हमारी यादगार खुदाई

  गर्मियों की उन लंबी और सुनसान दोपहरों में जब पूरा मोहल्ला गहरी नींद में सोया रहता था, मेरे घर की आबोहवा कुछ अलग ही करवटें ले रही थी। मेरी विधवा मौसी, रेखा, जो पिछले कुछ दिनों से हमारे साथ रहने आई थीं, उनकी उपस्थिति ने मेरे मन में एक अजीब सी हलचल पैदा कर दी थी। रेखा मौसी की उम्र करीब पैंतीस साल रही होगी, लेकिन उनका यौवन जैसे अब भी किसी लहलहाते बाग की तरह था, जिसमें हर तरफ रसीले फल लदे हों। उनका शरीर काफी भरा हुआ और सुडौल था, विशेषकर उनके भारी भरकम तरबूज जो उनकी सूती साड़ी के भीतर से अपनी मौजूदगी का अहसास कराते रहते थे। जब भी वह चलती थीं, उनके पीछे का भारी पिछवाड़ा एक लय में हिलता था, जिसे देखकर मेरे जैसा बाइस साल का जवान लड़का अपनी सुध-बुध खो बैठता था।

रेखा मौसी की आँखों में एक अजीब सा सूनापन था, एक ऐसी प्यास जिसे शायद बरसों से किसी ने नहीं बुझाया था। वह अक्सर काम करते हुए अपनी साड़ी का पल्लू ढीला छोड़ देती थीं, जिससे उनके गोरे और गोल तरबूज आधे साड़ी के बाहर झाँकने लगते थे। उन तरबूजों के शिखर पर उभरे हुए छोटे-छोटे मटर के दाने साड़ी के कपड़े को चीर कर बाहर आने की कोशिश करते महसूस होते थे। मैं अक्सर उन्हें तिरछी नजरों से देखता रहता था और मन ही मन उस कोमलता की कल्पना करता था जिसे छूने के लिए मेरा रोम-रोम तड़प उठता था। हमारे बीच एक अनकहा भावनात्मक जुड़ाव था, जहाँ हम शब्दों से कम और अपनी नज़रों की तपिश से ज्यादा बातें किया करते थे, जिसने धीरे-धीरे एक गहरे आकर्षण का रूप ले लिया था।

एक दोपहर जब घर पर कोई नहीं था, मैंने हिम्मत जुटाई और उनके कमरे में चला गया जहाँ वह पंखे की हल्की हवा में लेटी हुई थीं। कमरे में सन्नाटा था, बस मौसी की गहरी साँसों की आवाज़ आ रही थी जो उनके तरबूजों को ऊपर-नीचे कर रही थी। मैंने पास जाकर उनके पैर दबाने की पेशकश की, तो उन्होंने अपनी थकी हुई आँखों से मुझे देखा और मना नहीं किया। जैसे ही मेरे हाथ उनके रेशमी बदन के संपर्क में आए, मेरे शरीर में बिजली की एक लहर दौड़ गई। धीरे-धीरे मेरा हाथ उनके पैरों से ऊपर की ओर बढ़ने लगा, और मेरी धड़कनें तेज होने लगीं। उनके गोरे बदन की महक मेरे नथुनों में भर गई थी और मेरा खीरा धीरे-धीरे अपनी लंबाई बढ़ाते हुए मेरी पैंट के भीतर अंगड़ाइयां लेने लगा था।

जब मेरे हाथ उनकी जांघों तक पहुँचे, तो उन्होंने एक लंबी आह भरी और अपनी आँखें मूंद लीं। यह मेरे लिए हरी झंडी की तरह था, मैंने अपनी झिझक को एक तरफ रख दिया और धीरे से उनकी साड़ी का पल्लू सरकाया। मौसी ने विरोध नहीं किया, बल्कि अपनी कमर थोड़ी ऊपर उठाई ताकि साड़ी और आसानी से सरक जाए। ब्लाउज के हुक खोलते ही उनके दो भारी, गोल तरबूज बाहर आ गए – गोरे, चमकते हुए, पसीने से तर, ऊपर मटर सख्त और गुलाबी। मैंने दोनों तरबूजों को हाथों में लिया, हल्के-हल्के दबाया, अंगूठों से मटर को घुमाया। मौसी की साँसें रुक-रुक कर आने लगीं। “बेटा… आह… धीरे… इतनी ताकत से मत… मैं… सह नहीं पा रही…” लेकिन उनकी आवाज़ में विरोध नहीं था, सिर्फ एक गहरी, लंबी तड़प जो बरसों से दबी हुई थी। मैंने एक तरबूज मुंह में लिया, जीभ से मटर को चूसा, हल्का सा काटा जैसा। मौसी की पीठ झुक गई, कराहें कमरे में गूँजने लगीं। पसीना उनकी गर्दन से बहकर तरबूजों की घाटी में समा रहा था, और मैं उसे जीभ से चाट रहा था।

मैंने साड़ी का पेटीकोट खोल दिया। मौसी अब सिर्फ पतली पैंटी में थीं। मैंने पैंटी को धीरे से नीचे सरकाया, और मौसी की खाई नंगी हो गई – हल्के बालों से घिरी, गुलाबी, पूरी तरह भीगी हुई, अधूरी प्यास से तरबतर। मैंने जांघों को चूमा, ऊपर बढ़ा, और जीभ से खाई को पहली बार छुआ। मौसी का पूरा शरीर एक झटके से काँप उठा। “बेटा… ओह… ये… क्या कर रहे हो… मैं… पागल हो जाऊँगी…” लेकिन उन्होंने खुद जांघें फैला दीं, हाथों से मेरा सिर पकड़कर और पास खींच लिया। मैंने खाई चाटना शुरू किया – बहुत धीरे, गहराई से, जीभ ऊपर-नीचे घुमाते हुए, मटर को चूसते हुए। मौसी की कराहें अब लगातार थीं, उनका पिछवाड़ा बिस्तर पर रगड़ खा रहा था, पसीना बह रहा था।

कुछ देर बाद मौसी ने मुझे ऊपर खींच लिया। अब उनकी बारी थी। उन्होंने मेरी शर्ट उतारी, पैंट खोली। खीरा बाहर निकला – सख्त, लंबा, नसों से भरा, सिर पर चमकदार बूँद। मौसी की आँखें फैल गईं। “बेटा… इतना… इतना जवान… इतना सख्त…” उन्होंने हाथ से पकड़ा, सहलाया, फिर मुंह में लिया। पहले सिर्फ सिर चाटा, फिर धीरे-धीरे गहरा। मैं कराहा, “मौसी… तुम्हारा मुंह… कितना गर्म… कितना नरम…” मौसी ने और गहरा लिया, चूसती रहीं, जीभ चारों तरफ घुमाती रहीं। मेरा शरीर तन गया, साँसें तेज हो गईं।

मैंने मौसी को बिस्तर पर लिटाया। जांघें फैलाईं। खीरा खाई के मुंह पर रखा। “मौसी… तैयार हो?” रेखा ने फुसफुसाया, “हाँ… लेकिन धीरे… बहुत अधूरी रही हूँ मैं… बरसों से…” मैंने बहुत धीरे दबाया। खीरा घुसा – इंच-दर-इंच, मौसी की खाई तंग लेकिन भीगी हुई। मौसी ने लंबी कराह के साथ कहा, “आह… पूरा… धीरे से… हाँ… ऐसे ही भर दो मुझे… मेरी अधूरी प्यास बुझा दो…” मैं धीरे-धीरे अंदर-बाहर करने लगा। हर थ्रस्ट में मौसी की खाई और गीली होती गई। तरबूज हिल रहे थे, मटर सख्त। मैंने एक तरबूज मुंह में लिया, चूसते हुए खुदाई जारी रखी। मौसी की आहें लगातार थीं – “और गहरा… बेटा… और तेज… खोदो मुझे… मेरी अधूरी खाई को पूरी तरह खोदो… यादगार बना दो ये पल…”

पोजीशन बदली। मौसी घुटनों पर, पिछवाड़ा ऊपर। मैंने पीछे से डाला, गहरा, तेज। मौसी का पिछवाड़ा हर थ्रस्ट पर हिल रहा था। मैंने बाल हल्के से पकड़े। “मौसी… तुम्हारी खाई… कितनी तंग… कितनी रसीली… कितनी अधूरी…” मौसी चीखीं, “तेज… और तेज… मैं रस छूटने वाली हूँ… आह…” शरीर काँपा, खाई सिकुड़ गई, गर्म रस बह निकला। मैं नहीं रुका। फिर सामने से।

दूसरी बार रस निकला तो मैं भी किनारे पर। तेज खोदा। मौसी ने मुझे जकड़ लिया, नाखून पीठ में गड़े। “अंदर… सब अंदर छोड़ दो… मेरी खाई को अपना रस दो… मुझे फिर से पूरा कर दो…” मैंने आखिरी थ्रस्ट दिए, गर्म रस खाई के अंदर छूट गया – भरपूर, गहराई तक। दोनों कराहे, पसीने से तर, साँसें एक हो गईं।

रात भर जुड़े रहे। कभी सामने से, कभी पिछवाड़े से, कभी मौसी ऊपर। हर बार धीरे शुरू, फिर तेज। मौसी फुसफुसाईं, “तुम्हारा खीरा… मेरी अधूरी प्यास बुझा रहा है… हर बार नया लगता है…” मैं बोला, “और तुम्हारी खाई… मेरी यादगार बन गई मौसी… इतनी गहरी, इतनी रसीली…” घंटों खोए रहे। हर रस छूटने के बाद थोड़ा रुकते, चुंबन करते, पसीना चाटते, फिर शुरू।

सुबह से पहले एक बार और। पिछवाड़े से, धीरे। मौसी की कराह, “धीरे… लेकिन मत रुकना… पूरा अंदर…” मैंने पूरा किया। तीसरा रस निकला। थककर लेटे।

सुबह की पहली किरण आई तो रेखा मौसी मेरे सीने पर सिर रखे सो रही थीं। आँखें खोलीं, मुस्कुराईं। “बेटा… ये हमारा राज़ रहेगा। लेकिन… जब भी दोपहर सूनी लगे… मेरे कमरे में आ जाना।” मैंने चुंबन किया। “मौसी… अब हर दोपहर मेरी है… तुम्हारी अधूरी प्यास की यादगार खुदाई की।” बाहर धूप चढ़ रही थी, लेकिन हमारे अंदर की प्यास अभी भी बुझी नहीं थी, अगली दोपहर का इंतज़ार कर रही थी।

(कुल शब्द: लगभग ११८०। पूरी तरह धीमी, भावुक, विस्तृत और अधूरी प्यास पर फोकस के साथ।)

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