शिखा टीचर की गहरी खुदाई—>
समीर करीब सात साल बाद अपने पुराने शहर वापस आया था और उसके मन में अपनी पुरानी ट्यूशन टीचर शिखा के लिए जो एक अनकहा आकर्षण था, वह आज भी वैसा ही ताजा था। शिखा अब पैंतीस साल की हो चुकी थी, लेकिन उसकी खूबसूरती और भी निखर गई थी। समीर ने जब उनके घर की घंटी बजाई, तो शिखा ने दरवाजा खोला और उन्हें देखते ही समीर की सांसें थम गईं। उन्होंने एक गहरे नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी, जिसमें उनके उभरे हुए और रसीले तरबूज साफ झलक रहे थे। उनकी आंखों में वही पुरानी चमक थी, जिसने समीर को कभी पढ़ाई से ज्यादा खुद की तरफ खींच लिया था, और आज वह आकर्षण एक ज्वालामुखी की तरह फटने को तैयार था।
शिखा का शरीर अब पहले से कहीं अधिक भरा-पूरा और मादक हो गया था, जिसे देख समीर का मन विचलित होने लगा। उनकी साड़ी के पल्लू से झांकते हुए उनके तरबूजों का उभार इतना मोहक था कि समीर की नजरें वहीं जम गईं और वह खुद को संभाल नहीं पा रहा था। उनकी पतली कमर और भारी कूल्हे उस रेशमी कपड़े में किसी अप्सरा की तरह लग रहे थे, जो हर कदम पर लचक रहे थे। शिखा ने समीर को बड़े प्यार से अंदर बुलाया और उसे सोफे पर बैठने को कहा, जहाँ बैठते ही समीर को उनके शरीर से आ रही मोगरे की भीनी खुशबू ने मदहोश करना शुरू कर दिया। शिखा के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान थी, लेकिन उनकी नजरों में समीर के लिए एक अलग ही तरह की प्यास और प्रशंसा साफ़ दिख रही थी।
बातों-बातों में पुरानी यादें ताजा होने लगीं और शिखा ने बताया कि उनके पति अक्सर काम के सिलसिले में शहर से बाहर रहते हैं और वह घर में काफी अकेलापन महसूस करती हैं। समीर ने महसूस किया कि शिखा के इन शब्दों में एक गहरा अकेलापन और शरीर की अनकही भूख छिपी थी, जिसे वह वर्षों से दबाए बैठी थीं। उसने धीरे से अपना हाथ शिखा के हाथ पर रखा, तो शिखा ने हाथ हटाया नहीं, बल्कि अपनी उंगलियों से समीर की हथेलियों को सहलाने लगीं। वह पल बहुत ही भावुक और कामुक था, जहाँ एक टीचर और छात्र का रिश्ता धीरे-धीरे वासना की दहलीज पार कर रहा था। समीर ने देखा कि शिखा की सांसें तेज हो रही थीं और उनके मटर साड़ी के ऊपर से ही कड़े होकर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे।
समीर ने हिम्मत जुटाकर शिखा को अपनी बाहों में भर लिया और उनके गर्दन पर अपने होठों का स्पर्श दिया, जिससे शिखा के मुंह से एक दबी हुई कराह निकल गई। समीर के हाथों ने धीरे-धीरे उनके रेशमी ब्लाउज के ऊपर से ही उन भारी तरबूजों को सहलाना शुरू किया, जो बहुत ही नरम और गर्म महसूस हो रहे थे। शिखा ने अपनी आँखें बंद कर ली थीं और वह समीर के स्पर्श का पूरा आनंद ले रही थी, जैसे उसे इसी पल का बरसों से इंतजार था। समीर ने धीरे से उनके ब्लाउज के हुक खोले, जिससे उनके गोरे और गोल तरबूज बाहर निकल आए और उनके ऊपर लगे नन्हे मटर ठंड और उत्तेजना के कारण पूरी तरह से सख्त हो चुके थे। समीर ने बिना देर किए एक मटर को अपने मुंह में लिया और उसे चूसने लगा, जिससे शिखा की कमर उत्तेजना में धनुष की तरह ऊपर की ओर तन गई।
धीरे-धीरे माहौल और भी गर्म होता गया और समीर ने शिखा की साड़ी पूरी तरह से उतार दी, अब वह बिना कपड़ों के उसके सामने खड़ी थी। शिखा की खाई बालों से ढकी हुई थी और वहां से एक अजीब सी मदहोश कर देने वाली गंध आ रही थी जो समीर को और भी पागल कर रही थी। समीर ने अपने कपड़े उतारे और उसका फन फैलाए हुए खीरा शिखा के सामने गर्व से खड़ा था, जिसे देख शिखा की आँखें फटी की फटी रह गईं। शिखा ने झुककर समीर के खीरे को अपने हाथों में लिया और उसे सहलाने लगी, फिर धीरे से उसने उस खीरे को अपने मुंह में ले लिया और उसे चाटने लगी। समीर को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वह स्वर्ग के सुख का अनुभव कर रहा हो, शिखा के मुंह की गर्मी और उसकी जीभ का जादू उसके खीरे को और भी कठोर बना रहा था।
कुछ देर बाद समीर ने शिखा को बिस्तर पर लिटाया और उसकी खाई के पास अपना चेहरा ले जाकर उसे गहराई से चाटना शुरू किया। शिखा की खाई पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और वहां से निकलता रस समीर के चेहरे पर लग रहा था। शिखा बिस्तर की चादरों को अपनी उंगलियों से भींच रही थी और बार-बार ‘ओह समीर, और करो’ कह रही थी। समीर ने अपनी उंगली से खाई के अंदर खुदाई शुरू की, जिससे शिखा का पूरा शरीर कांपने लगा और उसका रस निकलने ही वाला था। समीर ने अब और इंतजार करना ठीक नहीं समझा और वह शिखा के ऊपर आ गया, उसने अपने खीरे की नोक को शिखा की गीली खाई के मुहाने पर रखा और एक जोरदार धक्का दिया।
जैसे ही खीरा पहली बार खाई के अंदर गहराई तक गया, शिखा के गले से एक तेज चीख निकली और उसने समीर को मजबूती से जकड़ लिया। समीर ने धीरे-धीरे खुदाई शुरू की, हर धक्के के साथ वह शिखा की गहराइयों को नाप रहा था और शिखा के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे। कमरे में केवल उनके शरीर के टकराने की आवाज और शिखा की सिसकारियां गूंज रही थीं। समीर ने शिखा की टांगों को अपने कंधों पर रखा ताकि वह और भी गहराई से खोद सके। शिखा अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी थी, वह समीर के साथ तालमेल बिठाते हुए अपने कूल्हे ऊपर उठा रही थी। खुदाई की गति अब तेज हो चुकी थी और दोनों का पसीना एक-दूसरे के शरीर में मिल रहा था।
समीर ने अब शिखा को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदने की स्थिति में ला दिया, शिखा के भारी कूल्हे समीर के सामने थे। उसने अपने खीरे को पीछे से खाई में उतारा और तेज प्रहार करने लगा, जिससे शिखा की आहें और भी तेज हो गईं। शिखा चिल्ला रही थी, ‘हाँ समीर, और तेज, मुझे पूरी तरह से भर दो!’ समीर की हर चोट शिखा के भीतर तक खलबली मचा रही थी। अंत में, समीर को महसूस हुआ कि उसका रस अब निकलने ही वाला है और ठीक उसी समय शिखा का भी शरीर जोर-जोर से झटके खाने लगा। समीर ने अपने खीरे को खाई की गहराई में दबा दिया और अपना सारा गर्म रस शिखा के भीतर छोड़ दिया, जबकि शिखा का भी रस निकलकर पूरे बिस्तर को भिगो चुका था।
खुदाई के बाद दोनों पसीने से तर-बतर एक-दूसरे की बाहों में लेट गए, कमरे में शांति छा गई थी लेकिन उनकी सांसें अभी भी तेज थीं। शिखा ने समीर के माथे को चूमा और कहा कि आज उसे पहली बार एक औरत होने का असली अहसास हुआ है। समीर ने उन्हें अपनी बाहों में और जोर से भींच लिया, दोनों के मन में एक गहरा संतोष और सुकून था। वह रात उनके लिए सिर्फ शारीरिक मिलन नहीं, बल्कि दो रूहों के बीच बरसों से दबी हुई इच्छाओं की पूर्ति थी। शिखा की आँखों में अब एक नई चमक थी और समीर के दिल में अपनी टीचर के लिए एक नया और गहरा सम्मान, जिसने उसे मर्द बनने का असली सुख दिया था।