रात के ग्यारह बज रहे थे और पूरे घर में सन्नाटा पसरा हुआ था, सिर्फ छत पर लगे पुराने पंखे की घरघराहट सुनाई दे रही थी। शीतल भाभी अपने कमरे में पलंग पर लेटी हुई थीं, उनकी आँखों में नींद नहीं बल्कि एक अजीब सी बेचैनी थी। उनके पति काम के सिलसिले में पिछले छह महीनों से विदेश में थे और उनकी जवानी की आग उन्हें हर रात तड़पाती थी। शीतल भाभी की उम्र कोई 32 साल रही होगी, उनका शरीर किसी पके हुए रसीले आम की तरह था, जिसकी बनावट देखकर किसी का भी जी ललचा जाए। उनकी सांवली त्वचा और कसरती बदन पर कॉटन की पतली साड़ी चिपकी हुई थी, जिससे उनके शरीर के उतार-चढ़ाव साफ झलक रहे थे।
समीर उसी घर के नीचे वाले कमरे में रहता था, जो शीतल भाभी का देवर लगता था और अभी कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर रहा था। समीर की उम्र 24 साल थी और वह काफी हट्टा-कट्टा और कसरती शरीर का मालिक था, जिसकी चौड़ी छाती और मजबूत बाजू शीतल को हमेशा आकर्षित करते थे। समीर भी अपनी भाभी की खूबसूरती का कायल था, वह अक्सर छिप-छिपकर उन्हें काम करते हुए देखता रहता था। उस रात गर्मी बहुत ज्यादा थी, समीर को नींद नहीं आ रही थी, तो वह पानी पीने के बहाने ऊपर भाभी के कमरे की तरफ गया। कमरे का दरवाजा हल्का सा खुला था और अंदर से एक हल्की खुशबू आ रही थी जो समीर के अंदर की आग को भड़काने के लिए काफी थी।
समीर ने देखा कि शीतल भाभी ने साड़ी का पल्लू नीचे गिरा रखा था और उनके गोल-गोल भारी तरबूज ब्लाउज के अंदर से बाहर निकलने को बेताब लग रहे थे। समीर की सांसें तेज हो गईं, उसने देखा कि भाभी अपनी आँखें बंद किए हुए अपने ही शरीर को सहला रही थीं और उनके मुँह से हल्की-हल्की सिसकारियां निकल रही थीं। वह धीरे से कमरे के अंदर दाखिल हुआ, उसके दिल की धड़कन इतनी तेज थी कि उसे लग रहा था भाभी सुन लेंगी। शीतल ने जैसे ही समीर की मौजूदगी महसूस की, उन्होंने झटके से आँखें खोलीं, लेकिन उन्होंने खुद को ढका नहीं, बल्कि समीर की आँखों में देखते हुए एक गहरी सांस भरी।
समीर ने बिना कुछ कहे शीतल के पास जाकर उनके कंधे पर हाथ रखा, तो शीतल का पूरा शरीर एक बार कांप उठा। उन्होंने समीर का हाथ पकड़ लिया और उसे अपने तरबूज के ऊपर रख दिया, समीर को भाभी के बदन की गर्मी महसूस हुई। समीर ने धीरे से उनके ब्लाउज के हुक खोलना शुरू किए और जैसे ही ब्लाउज खुला, दो विशाल तरबूज आजाद होकर बाहर आ गए, जिनके ऊपर लगे गुलाबी मटर ठंडक और उत्तेजना की वजह से बिल्कुल सख्त हो चुके थे। समीर ने झुककर उन मटरों को अपने मुँह में लिया और धीरे-धीरे उन्हें सहलाने लगा, जिससे शीतल के गले से एक लंबी कराह निकली और उन्होंने समीर के बालों को कसकर पकड़ लिया।
शीतल ने समीर को अपनी ओर खींचते हुए उसके होठों का रस पीना शुरू किया, दोनों की जीभ एक-दूसरे से लड़ रही थी जैसे कोई युद्ध छिड़ा हो। समीर ने अपनी भाभी की साड़ी और पेटीकोट को एक झटके में नीचे कर दिया, अब शीतल पूरी तरह से कुदरती रूप में उसके सामने थीं। उनकी कमर के नीचे का हिस्सा और वह गहरी खाई देखकर समीर का खीरा बिल्कुल पत्थर की तरह सख्त हो गया था और पजामे को फाड़ने की कोशिश कर रहा था। समीर ने धीरे से भाभी के घुटने मोड़े और उनकी खाई के पास बैठकर उसे गौर से देखने लगा, जो घने बालों से ढकी हुई थी और पूरी तरह से गीली हो चुकी थी।
समीर ने अपनी जीभ निकाली और उस खाई को धीरे-धीरे चाटना शुरू किया, शीतल का बदन थरथराने लगा और वह बिस्तर की चादर को अपने हाथों में भींचने लगीं। जैसे-जैसे समीर की जीभ खाई के अंदर जा रही थी, शीतल के मुँह से निकलने वाली आवाजें तेज होती जा रही थीं, वह बार-बार कह रही थीं, ‘ओह समीर, कितना मजा आ रहा है, आज मुझे पूरा खोद डालो।’ समीर ने फिर अपनी उंगली उठाई और उसे भाभी की खाई के अंदर डाल दिया, वह अंदर से इतनी गरम और तंग थी कि समीर का मन किया कि वह अभी अपना खीरा उसके अंदर डाल दे।
आखिरकार समीर ने अपना पजामा उतारा और उसका साढ़े सात इंच का मोटा और सख्त खीरा उछलकर बाहर आ गया, जिसे देखकर शीतल की आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने तुरंत समीर के खीरे को अपने दोनों हाथों में पकड़ लिया और उसे अपने मुँह में लेकर चूसने लगीं, जैसे कोई प्यासा पानी पीता है। समीर को ऐसा लग रहा था जैसे वह जन्नत में हो, जब भाभी का गरम मुँह उसके खीरे को चूम रहा था। कुछ देर बाद समीर ने भाभी को बिस्तर पर लिटाया और उनके दोनों पैरों को अपने कंधों पर रख लिया, वह अब खुदाई शुरू करने के लिए पूरी तरह तैयार था।
समीर ने अपने खीरे की टोपी को भाभी की खाई के मुहाने पर रखा और एक जोर का धक्का मारा, खीरा आधा अंदर चला गया। शीतल के मुँह से एक चीख निकली, लेकिन वह दर्द की नहीं बल्कि चरम आनंद की थी, उन्होंने समीर की पीठ पर अपने नाखूनों के निशान बना दिए। समीर ने रुकने के बजाय दूसरा जोर का धक्का मारा और पूरा खीरा जड़ तक खाई के अंदर समा गया, शीतल की आँखें पलट गईं और उनका पूरा बदन अकड़ गया। समीर ने अब धीरे-धीरे अपनी कमर को चलाना शुरू किया, खुदाई की आवाज पूरे कमरे में गूंजने लगी—थप-थप, थप-थप।
शीतल भाभी अब पूरी तरह से इस खेल में डूब चुकी थीं, वह समीर के धक्कों के साथ अपनी कमर ऊपर उठा रही थीं ताकि खीरा और गहराई तक जा सके। समीर ने उन्हें उल्टा किया और पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, यह स्थिति शीतल को और भी ज्यादा उत्तेजित कर रही थी। समीर के हर धक्के के साथ शीतल के भारी तरबूज हवा में उछल रहे थे और उनका पूरा शरीर पसीने से नहा गया था। समीर ने अपनी गति और बढ़ा दी, अब वह किसी जंगली जानवर की तरह भाभी को खोद रहा था, कमरे में सिर्फ उनकी भारी सांसों और जिस्मों के टकराने की आवाजें आ रही थीं।
लगभग आधे घंटे की कड़ी खुदाई के बाद समीर को महसूस हुआ कि अब उसका रस निकलने वाला है, उसने शीतल के कान में फुसफुसाते हुए कहा, ‘भाभी, अब मेरा रस छूटने वाला है।’ शीतल ने पीछे मुड़कर देखा और कहा, ‘मेरा भी रस निकलने वाला है समीर, आज मुझे अपने रस से पूरी तरह भिगो दो।’ समीर ने आखिरी के कुछ बहुत तेज धक्के मारे और अपना पूरा खीरा जड़ तक अंदर धंसा दिया। अगले ही पल समीर का गरम-गरम रस फुहारों की तरह शीतल की खाई के अंदर भर गया और शीतल का भी रस निकलना शुरू हो गया, दोनों एक-दूसरे से चिपककर बिस्तर पर गिर पड़े।
खुदाई खत्म होने के बाद दोनों के शरीर पसीने से लथपथ थे और सांसें अभी भी तेज चल रही थीं, लेकिन उनके चेहरों पर एक अजीब सी संतुष्टि थी। शीतल समीर की छाती पर अपना सिर रखकर लेटी हुई थीं और समीर उनके बालों के साथ खेल रहा था। शीतल ने समीर के गाल को चूमा और धीरे से कहा, ‘तुमने आज मुझे वो सुख दिया है जो तुम्हारे भैया ने कभी नहीं दिया, आज से यह घर और यह खाई सिर्फ तुम्हारी है।’ समीर ने उन्हें और कसकर पकड़ लिया, वह जानते थे कि यह तो बस एक नई और बेहद कामुक शुरुआत है जो हर रात इसी तरह दोहराई जाएगी।