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साली की मदहोश चु@@ई

साली की मदहोश चु@@ई—>उस रात की खामोशी में एक अजीब सी तड़प थी जो समीर के दिल की धड़कनों को तेज कर रही थी। समीर अपनी पत्नी की छोटी बहन सरिता के घर पर रुका हुआ था क्योंकि उसकी पत्नी एक पारिवारिक समारोह में शामिल होने दूसरे शहर गई हुई थी। घर में सिर्फ समीर और उसकी जवान साली सरिता ही थे। सरिता जिसकी उम्र महज तेईस साल थी और उसके शरीर का हर अंग जैसे जवानी की दहलीज पर अपनी पूरी रंगत बिखेर रहा था। समीर ने देखा कि सरिता आज कुछ ज्यादा ही खिली-खिली लग रही थी। उसकी पतली कमर और भारी कूल्हों का मेल उसे किसी अप्सरा जैसा बना रहा था। समीर की नजरें बार-बार सरिता के उन उभरते हुए अंगों पर जा टिकती थीं जिन्हें वह अक्सर नजरअंदाज करने की कोशिश करता था।

सरिता के शरीर की बनावट बहुत ही मादक थी और उसने जो पीला सलवार कमीज पहना था वह उसके अंगों की गोलाई को बखूबी निखार रहा था। समीर ने गौर किया कि सरिता के तरबूज इतने बड़े और रसीले लग रहे थे कि कमीज का कपड़ा उन्हें छुपा पाने में नाकाम साबित हो रहा था। जब वह चलती थी तो उसके तरबूज एक अजीब सी लय में ऊपर-नीचे होते थे जिसे देखकर समीर के अंदर का खीरा करवटें लेने लगता था। सरिता का पिछवाड़ा भी काफी गोल और गदराया हुआ था जो हर कदम पर थिरकता रहता था। समीर ने मन ही मन सोचा कि उसकी साली कितनी बदल गई है और उसके शरीर का हर हिस्सा अब खुदाई के लिए जैसे पुकार रहा है। उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी जो समीर को अपनी ओर खींच रही थी।

समीर और सरिता के बीच हमेशा से एक खामोश सा रिश्ता रहा था जिसमें सम्मान के साथ-साथ एक दबी हुई चाहत भी थी। सरिता अक्सर समीर से मजाक करती थी लेकिन उन मजाकों में एक अलग ही गहराई छिपी होती थी। आज रात जब दोनों ड्राइंग रूम में बैठे बातें कर रहे थे तो सरिता ने समीर के हाथ पर अपना हाथ रखा। उस स्पर्श ने समीर के पूरे शरीर में बिजली की लहर दौड़ा दी। दोनों की आंखों में एक-दूसरे के लिए छिपी हुई प्यास साफ झलक रही थी। सरिता की सांसें कुछ तेज चलने लगी थीं और वह समीर के थोड़े और करीब आ गई। समीर ने महसूस किया कि उनके बीच का यह भावनात्मक जुड़ाव अब शारीरिक खिंचाव में तब्दील हो रहा है और उसे रोक पाना अब मुश्किल होता जा रहा था।

रात का सन्नाटा गहराता जा रहा था और हॉल में केवल पंखे की आवाज गूंज रही थी। समीर ने धीरे से सरिता के चेहरे की ओर देखा जो शर्म से लाल हो रहा था लेकिन उसकी आंखों में झिझक के साथ-साथ एक गहरी रजामंदी भी थी। आकर्षण इतना प्रबल था कि समीर ने अपनी उंगलियां सरिता के बालों में फंसा दीं। सरिता ने अपनी आंखें मूंद लीं और एक लंबी आह भरी। वह झिझक जो सालों से उनके बीच एक दीवार बनकर खड़ी थी अब धीरे-धीरे पिघलने लगी थी। समीर ने महसूस किया कि सरिता का शरीर कांप रहा था लेकिन वह पीछे नहीं हटी बल्कि उसने अपना सिर समीर के कंधे पर रख दिया। मन का यह संघर्ष अब समाप्त हो चुका था और हवस की नई इबारत लिखी जाने वाली थी।

समीर ने अपना हाथ धीरे से नीचे ले जाते हुए सरिता के एक तरबूज पर रख दिया। सरिता ने एक जोर की सिसकी ली और समीर की शर्ट को कसकर पकड़ लिया। समीर ने देखा कि उसके हाथ के दबाव से तरबूज के बीच के मटर सख्त होकर कपड़े के ऊपर से ही नजर आने लगे थे। समीर ने धीरे-धीरे उन तरबूजों को सहलाना शुरू किया और सरिता के गले पर अपने होठों का रस पीने लगा। सरिता की सांसें अब समीर के कानों में गरम हवा की तरह टकरा रही थीं। उसका पूरा शरीर कामुकता की अग्नि में जल रहा था। समीर ने उसकी कमीज के बटन धीरे-धीरे खोलने शुरू किए जिससे सरिता के गोरे और चमकदार तरबूज पूरी तरह बाहर आ गए।

जैसे ही सरिता के तरबूज आजाद हुए समीर ने उन पर अपना मुंह टिका दिया और उन रसीले फलों का आनंद लेने लगा। सरिता के मटर अब पूरी तरह सख्त हो चुके थे जिन्हें समीर अपनी जीभ से सहला रहा था। सरिता मदहोशी में समीर का सिर अपने तरबूजों में भींच रही थी और उसकी कराहें कमरे के सन्नाटे को चीर रही थीं। समीर का खीरा अब पूरी तरह से अकड़ चुका था और पजामे के अंदर अपनी जगह बनाने के लिए छटपटा रहा था। सरिता ने भी अब अपनी शर्म छोड़ दी थी और वह समीर के खीरे को कपड़े के ऊपर से ही अपने हाथों में लेकर सहलाने लगी थी जिससे समीर को एक असीम सुख की अनुभूति हो रही थी।

समीर ने धीरे से सरिता को सोफे पर लिटा दिया और उसकी सलवार के नाड़े को खोलने लगा। जैसे ही सलवार नीचे उतरी सरिता की जांघों के बीच की गहरी और नम खाई समीर के सामने थी। उस खाई के आसपास हल्के-हल्के काले बाल थे जो उसे और भी उत्तेजक बना रहे थे। समीर ने अपनी उंगली से खाई को छूना शुरू किया तो पाया कि वह पूरी तरह से गीली हो चुकी थी। सरिता अपनी कमर को ऊपर-नीचे झटक रही थी और समीर से और भी ज्यादा गहराई की मांग कर रही थी। समीर ने अपनी जीभ से उस खाई को चाटना शुरू किया जिससे सरिता का शरीर धनुष की तरह तन गया और वह जोर-जोर से समीर का नाम पुकारने लगी।

अब समीर से और इंतजार नहीं हो रहा था। उसने अपना खीरा बाहर निकाला जो अब लोहे की रॉड की तरह सख्त और गरम हो चुका था। उसने सरिता की दोनों टांगों को फैलाया और अपने खीरे की नोक को उस रेशमी खाई के मुहाने पर टिका दिया। सरिता ने समीर की आंखों में देखा और उसे आगे बढ़ने का इशारा किया। समीर ने एक जोरदार धक्के के साथ अपने खीरे को सरिता की तंग खाई में उतार दिया। सरिता के मुंह से एक चीख निकली लेकिन वह दर्द की नहीं बल्कि उस चरम सुख की थी जिसका उसे बरसों से इंतजार था। खाई बहुत तंग थी लेकिन समीर के खीरे ने अपनी जगह बना ली थी और अब वह धीरे-धीरे अंदर-बाहर होने लगा था।

खुदाई की प्रक्रिया अब अपनी पूरी रफ्तार पकड़ चुकी थी। समीर ने सामने से खोदना शुरू किया था और हर धक्के के साथ उसका खीरा सरिता की खाई की गहराइयों को नाप रहा था। सरिता की आंखें ऊपर चढ़ गई थीं और वह पागलों की तरह समीर की पीठ पर अपने नाखून गड़ा रही थी। कमरे में केवल उनके जिस्मों के टकराने की आवाज और सरिता की मदहोश कराहें गूंज रही थीं। समीर ने सरिता के दोनों हाथों को अपने हाथों में जकड़ लिया और अपनी रफ्तार और तेज कर दी। सरिता का पूरा शरीर पसीने से तरबतर था और उसके तरबूज पागलों की तरह उछल रहे थे। वह बार-बार कह रही थी कि मुझे और जोर से खोदो समीर मुझे आज अपनी पूरी खुदाई दे दो।

समीर ने कुछ देर बाद सरिता की पोजीशन बदली और उसे घुटनों के बल टिकाकर पिछवाड़े से खोदना शुरू कर दिया। इस पोजीशन में समीर का खीरा और भी गहराई तक जा रहा था। सरिता का पिछवाड़ा समीर के पेट से टकरा रहा था जिससे एक मादक आवाज पैदा हो रही थी। सरिता ने अपना सिर तकिए में छुपा लिया था और वह लगातार सिसकारियां ले रही थी। समीर ने उसके एक हाथ से तरबूज को पकड़ा और दूसरे हाथ से उसकी कमर को पकड़कर खुदाई जारी रखी। सरिता की खाई से अब बहुत सारा रस निकल रहा था जो उनके मिलन को और भी चिकना और सुखद बना रहा था। दोनों ही कामदेव के वश में होकर एक-दूसरे को पूरी तरह आत्मसात कर रहे थे।

अंतिम क्षणों में समीर ने सरिता को फिर से सीधा लिटाया और अपनी पूरी ताकत लगाकर खुदाई करने लगा। सरिता का शरीर अब जवाब देने लगा था और वह चरम सीमा के बिल्कुल करीब थी। अचानक सरिता ने समीर को कसकर जकड़ लिया और उसका पूरा शरीर कांपने लगा। उसकी खाई से रस का फव्वारा छूट गया और उसी पल समीर ने भी अपना सारा गरम रस सरिता की खाई की गहराइयों में उड़ेल दिया। दोनों एक-दूसरे में सिमटे हुए काफी देर तक वैसे ही लेटे रहे। उनकी सांसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं लेकिन वह अहसास अब भी उनके दिलों में जिंदा था। सरिता की आंखों में एक अजीब सी संतुष्टि थी और समीर को लग रहा था जैसे उसने आज एक नई दुनिया की खोज कर ली हो।

खुदाई के बाद की वह शांति बहुत ही सुखद थी। सरिता का चेहरा अब भी गुलाबी था और उसके बिखरे हुए बाल और पसीने से भीगा शरीर उसकी खूबसूरती को और बढ़ा रहे थे। समीर ने उसके माथे को चूमा और उसे अपनी बाहों में भर लिया। सरिता ने समीर के सीने पर अपना सिर रखा और धीरे से बोली कि तुमने मुझे आज स्वर्ग दिखा दिया। उस रात के बाद उनके बीच का रिश्ता बदल गया था जिसमें अब एक गहरा राज और अटूट शारीरिक आकर्षण शामिल था। दोनों जानते थे कि यह एक गलत कदम हो सकता है लेकिन उस पल की खुशी के आगे उन्हें दुनिया की कोई परवाह नहीं थी। वह रात उनकी यादों में हमेशा के लिए एक रसीली कहानी बनकर दर्ज हो गई थी।

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