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सूनी दोपहर में मामी का रसीला सान्निध्य


सूनी दोपहर में मामी का रसीला सान्निध्य—>

गर्मियों की वह सुस्त दोपहर आज भी नीरज के जेहन में ताज़ा है, जब सूरज की तपिश ने पूरे गाँव को खामोश कर दिया था। नीरज अपने मामा के घर छुट्टियों में आया हुआ था और मामा किसी काम से शहर गए हुए थे। घर में सिर्फ वह और उसकी जवान मामी, श्वेता, अकेले थे। श्वेता मामी की उम्र करीब चौंतीस वर्ष थी, लेकिन उनका शरीर किसी कच्ची कली की तरह खिला हुआ था। उन्होंने एक पतली सूती साड़ी पहनी थी, जो पसीने के कारण उनके बदन से चिपक गई थी, जिससे उनके शरीर का हर उभार साफ झलक रहा था।

नीरज की नज़रें बार-बार मामी के उन भारी और गोल तरबूजों पर टिक जाती थीं, जो ब्लाउज की तंग सीमाओं को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। मामी का पिछवाड़ा भी काफी गदराया हुआ और मांसल था, जो चलते समय एक मदमस्त लय में हिलता था। उनकी गोरी रंगत और उन तरबूजों के ऊपर उभरे हुए छोटे-छोटे मटर के दाने साफ़ संकेत दे रहे थे कि अंदर भी गर्मी उतनी ही तीव्र है जितनी बाहर। नीरज का मन मचल उठा था और उसके पाजामे के अंदर उसका अपना खीरा भी अब अपनी जगह बनाने के लिए फड़फड़ाने लगा था।

श्वेता मामी ने रसोई से नीरज को आवाज़ दी, उनकी आवाज़ में एक अजीब सी खनक और प्यास थी। जब नीरज वहाँ पहुँचा, तो देखा कि मामी सिंक के पास खड़ी होकर बर्तन धो रही थीं। झुकने की वजह से उनका साड़ी का पल्लू खिसक गया था और उनके तरबूजों की गहरी घाटी नीरज की आँखों के सामने पूरी तरह खुली हुई थी। नीरज के दिल की धड़कनें तेज हो गईं और उसने धीरे से पीछे जाकर मामी के कंधों पर हाथ रख दिया। मामी एक पल के लिए ठिठकीं, लेकिन उन्होंने विरोध नहीं किया, बल्कि एक गहरी आह भरी।

मामी की इस मौन स्वीकृति ने नीरज का हौसला बढ़ा दिया। उसने अपने हाथों को नीचे सरकाया और उनके रेशमी पेट को सहलाते हुए ऊपर की ओर बढ़ाया। जैसे ही नीरज की उँगलियाँ उन नरम तरबूजों के संपर्क में आईं, मामी के मुँह से एक सिसकारी निकली। नीरज ने उनके कानों के पास जाकर फुसफुसाया, मामी आप आज बहुत सुंदर और रसीली लग रही हो। श्वेता ने पीछे मुड़कर अपनी मदहोश आँखों से नीरज को देखा और कहा, नीरज, ये तुम क्या कर रहे हो, अगर मामा आ गए तो? लेकिन उनके शब्दों में डर नहीं, बल्कि और ज्यादा करीब आने का न्योता था।

नीरज ने उनके ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोलने शुरू किए। जैसे ही आखिरी हुक खुला, मामी के दोनों आज़ाद तरबूज उछलकर सामने आ गए। उन पर मौजूद गुलाबी मटर अब पूरी तरह सख्त हो चुके थे। नीरज ने अपनी जीभ से उन मटरों को सहलाना शुरू किया, जिससे मामी के पैरों तले जमीन खिसकने लगी। उन्होंने नीरज के बाल पकड़ लिए और उसे अपने और करीब खींच लिया। नीरज ने अब अपनी उँगलियों से उनकी साड़ी के नीचे बनी गहरी खाई को टटोलना शुरू किया, जो पहले से ही काफी गीली और गर्म हो चुकी थी।

मामी की साँसें अब उखड़ने लगी थीं। नीरज ने उन्हें रसोई के प्लेटफॉर्म पर ही बिठा दिया और उनकी साड़ी पूरी तरह उतार दी। उनकी खाई के पास काले घने बाल एक जंगल की तरह फैले हुए थे। नीरज ने अपना हाथ नीचे ले जाकर खाई में उंगली से धीरे-धीरे खुदाई शुरू की। मामी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और अपना पिछवाड़ा हवा में उठा दिया। वह बार-बार कह रही थीं, नीरज, और गहराई से खोदो, आज मुझे पूरी तरह से खाली कर दो। नीरज ने अपनी उँगलियों की गति बढ़ाई और खाई के रस को अपने हाथों पर महसूस किया।

अब नीरज के सब्र का बाँध टूट चुका था। उसने अपना पजामा नीचे किया और अपना साढ़े सात इंच का सख्त और गरम खीरा बाहर निकाला। मामी ने जब उस विशाल खीरे को देखा, तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने झुककर उस खीरे को अपने मुँह में ले लिया और उसे किसी आइसक्रीम की तरह चूसने लगीं। खीरा अब पूरी तरह से गीला और और भी सख्त हो चुका था। नीरज को लगा कि उसका रस बस अब छूटने ही वाला है, लेकिन उसने खुद पर काबू पाया और मामी को बेड की तरफ ले गया।

उसने मामी को सीधा लिटाया और उनके दोनों पैरों को अपने कंधों पर रख लिया। यह सामने से खुदाई करने वाली सबसे बेहतरीन स्थिति थी। नीरज ने अपने खीरे की नोक को उस रेशमी और गीली खाई के मुहाने पर रखा और एक ही झटके में उसे आधा अंदर उतार दिया। मामी के मुँह से एक चीख निकली, पर वह दर्द की नहीं, असीम आनंद की थी। नीरज ने अब धीरे-धीरे अपनी कमर चलानी शुरू की। हर धक्के के साथ खीरा पूरी तरह से खाई की गहराइयों को छू रहा था। कमरे में केवल खुदाई की आवाज़ें और उनकी आहें गूँज रही थीं।

नीरज ने फिर मामी को पलटा और उन्हें घुटनों के बल बिठा दिया ताकि वह पिछवाड़े से खुदाई कर सके। यह नज़ारा और भी कामुक था, क्योंकि मामी का पिछवाड़ा किसी दो बड़े पहाड़ों की तरह ऊपर की ओर उठा हुआ था। नीरज ने अपने खीरे को फिर से खाई में डाला और अब की बार रफ्तार और भी बढ़ा दी। मामी अपने दोनों हाथों से चादर को कसकर पकड़े हुए थीं। वह चिल्ला रही थीं, हाँ नीरज, और जोर से खोदो, फाड़ दो अपनी मामी की इस खाई को, आज सारा रस निकाल दो।

लगभग पंद्रह मिनट की ताबड़तोड़ खुदाई के बाद, दोनों ही चरम सीमा पर पहुँचने वाले थे। नीरज का खीरा अब पूरी तरह से गरम हो चुका था और मामी की खाई भी अब थरथराने लगी थी। अचानक, एक झटके के साथ नीरज के खीरे से गरम रस की बौछार हुई जो सीधे मामी की खाई के सबसे अंदरूनी हिस्से में जा गिरी। उसी समय मामी का भी रस छूट गया और वह बेदम होकर बिस्तर पर गिर पड़ीं। दोनों का पसीना एक-दूसरे में मिल चुका था और कमरे की हवा में एक अजीब सी गंध फैल गई थी।

कुछ देर बाद, जब उनकी साँसें सामान्य हुईं, तो मामी ने नीरज को अपनी बाहों में कस लिया। उनकी आँखों में एक अलग ही चमक थी और चेहरे पर संतुष्टि का भाव। उन्होंने नीरज के माथे को चूमा और कहा, तुमने आज मुझे वो सुख दिया है जिसकी मुझे सालों से तलाश थी। नीरज ने भी उनके उन पसीने से भीगे तरबूजों को सहलाते हुए कहा कि यह तो बस शुरुआत है। उस दोपहर के बाद से, जब भी घर सूना होता, नीरज और मामी की यह रसीली खुदाई की दास्तां और भी गहराई से लिखी जाने लगी।

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