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शालिनी मामी की रेशमी साड़ी और वो मदहोश कर देने वाली दोपहर

शालिनी मामी की रेशमी साड़ी और वो मदहोश कर देने वाली दोपहर—>शहर की तपती दोपहर में जब सूरज अपनी पूरी ताकत से आग उगल रहा था, तब मैं अपनी मामी शालिनी के घर के ठंडे ड्राइंग रूम में सोफे पर लेटा हुआ था। मामी की उम्र करीब 28 साल रही होगी, और उनकी काया किसी संगमरमर की मूरत जैसी तराशी हुई थी। उनके शरीर का हर हिस्सा जैसे जवानी की एक नई कहानी कहता था। उनके गोरे रंग पर काली साड़ी बिजली की तरह चमकती थी। जब भी वह चलती थीं, उनके शरीर की बनावट और उनके तरबूज साड़ी के नीचे से ऐसे उभरते थे कि किसी का भी मन डोल जाए। उनकी कमर पतली थी लेकिन उनके नीचे का हिस्सा, उनका पिछवाड़ा काफी चौड़ा और भारी था, जो हर कदम के साथ एक लय में हिलता था। मैं अपनी पढ़ाई के सिलसिले में उनके यहाँ रुका हुआ था, लेकिन मेरा मन किताबों से ज्यादा मामी के उन मदमस्त उतार-चढ़ावों में भटकता रहता था।

मामी का स्वभाव बहुत ही कोमल और ममतामयी था, लेकिन उस ममता के पीछे एक दबी हुई आग भी थी जो कभी-कभी उनकी आँखों में झलक जाती थी। उस दिन मामा ऑफिस गए हुए थे और घर में हम दोनों के अलावा कोई नहीं था। मामी रसोई में खाना बना रही थीं और पसीने की कुछ बूंदें उनके गले से फिसलकर उनके तरबूज के बीच की गहरी घाटी में समा रही थीं। मैं बस उन्हें दूर से निहारे जा रहा था। उनकी साड़ी का पल्लू बार-बार खिसक रहा था, जिससे उनके उभरे हुए अंगों का प्रदर्शन और भी कामुक हो रहा था। मेरे मन में एक अजीब सा द्वंद्व चल रहा था—एक तरफ रिश्तों की मर्यादा थी और दूसरी तरफ वह अनियंत्रित इच्छा जो मुझे उनकी तरफ खींच रही थी। वह बार-बार अपने बालों को ठीक करतीं और जब वह झुकती थीं, तो उनके पिछवाड़े का उभार और भी ज्यादा साफ दिखाई देता था।

तभी अचानक बिजली चली गई और कमरे में सन्नाटा छा गया। रसोई की गर्मी से बेहाल होकर मामी बाहर आईं और पसीने को पोंछते हुए मेरे पास सोफे पर बैठ गईं। उनके शरीर से एक भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी, जो पसीने और इत्र का एक नशीला मिश्रण थी। उन्होंने मुझसे कहा, ‘आर्यन, बहुत गर्मी है, जरा पंखा झल दो।’ मैंने हाथ वाला पंखा लिया और उन्हें हवा करने लगा। हवा के झोंकों से उनकी साड़ी का पल्लू थोड़ा और सरक गया, जिससे उनके मटर जैसे दाने साड़ी के पतले कपड़े के नीचे से साफ दिखने लगे। मेरी धड़कनें तेज हो गई थीं। मैंने हिम्मत जुटाई और धीरे से अपना हाथ उनकी मखमली पीठ पर रखा। उन्होंने एक बार मेरी तरफ देखा, उनकी आँखों में झिझक थी, लेकिन विरोध नहीं था। वह पल जैसे ठहर सा गया था।

मेरा हाथ धीरे-धीरे उनकी पीठ से फिसलते हुए उनकी कमर तक पहुँचा। उन्होंने एक गहरी सांस ली और अपनी आँखें मूंद लीं। यह इशारा मेरे लिए काफी था। मैंने उन्हें धीरे से अपनी तरफ खींचा और उनके गुलाबी होंठों पर अपना चेहरा ले गया। हमारे बीच की दूरियाँ मिटने लगी थीं। मैंने धीरे-धीरे उनके गालों को सहलाया और फिर उनके कानों के पास जाकर फुसफुसाया। मामी के शरीर में एक थरथराहट सी दौड़ गई। उन्होंने धीरे से मेरे बालों में अपनी उंगलियां फँसा दीं। मैंने उनकी साड़ी के पल्लू को पूरी तरह से हटा दिया, जिससे उनके विशाल तरबूज अब सिर्फ एक पतले ब्लाउज में कैद थे। उनकी सांसें तेज चलने लगी थीं और मेरा खीरा भी अपनी पूरी ताकत के साथ मेरे पजामे के अंदर सर उठाने लगा था।

मैंने धीरे से उनके ब्लाउज के हुक खोले और जैसे ही वह बंधन मुक्त हुए, उनके दूधिया सफेद तरबूज बाहर निकल आए। उनके मटर के दाने अब ठंडी हवा के स्पर्श से और भी सख्त हो गए थे। मैंने अपनी जीभ से उन मटर के दानों को सहलाना शुरू किया, जिससे मामी के मुंह से एक धीमी सी आह निकली। वह बार-बार मेरा नाम पुकार रही थीं। फिर मेरा हाथ उनकी साड़ी के नीचे गया और मैंने उनके पिछवाड़े को जोर से भींचा। उनकी कोमलता और गर्माहट ने मुझे पागल कर दिया था। अब वह भी मेरी टी-शर्ट उतारने लगी थीं। जब हमारा शरीर पूरी तरह से नग्न हुआ, तो मैंने पहली बार उनकी गहरी खाई को करीब से देखा। वह खाई रेशमी बालों से ढकी हुई थी और पूरी तरह से गीली हो चुकी थी।

मैंने अपनी उंगली से उनकी खाई को टटोलना शुरू किया, जिससे वह बिस्तर पर तड़पने लगीं। उनकी खाई का रस मेरी उंगलियों पर चिपक गया था। फिर मैंने अपने खीरे को उनके हाथों में दिया। उन्होंने उसे मजबूती से पकड़ा और उसे प्यार से सहलाने लगीं। कुछ देर बाद, उन्होंने मेरा खीरा मुंह में लेना शुरू किया। उनके मुंह की गर्माहट और जीभ की फिसलन ने मुझे स्वर्ग का अहसास कराया। मैं बस उनकी गर्दन पकड़कर उन्हें प्रोत्साहित कर रहा था। मामी पूरी तरह से लय में थीं। जब मुझे लगा कि अब बर्दाश्त नहीं होगा, तो मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया और उनके दोनों पैरों को ऊपर उठाकर उनकी खाई के दरवाजे पर अपना खीरा टिका दिया। मैंने धीरे से दबाव डाला और मेरा खीरा उनकी संकरी खाई के अंदर सरकने लगा।

मामी ने दर्द और आनंद के मिले-जुले अहसास में मेरी पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए। जैसे ही मेरा पूरा खीरा उनकी खाई में समाया, कमरे में सन्नाटा टूट गया और सिर्फ हमारे शरीर के टकराने की आवाजें गूँजने लगीं। मैं सामने से खोदना शुरू कर चुका था। हर धक्के के साथ मामी की आँखें ऊपर चढ़ जाती थीं। वह कह रही थीं, ‘और जोर से आर्यन, आज मुझे पूरी तरह से खोदो।’ उनकी बातें सुनकर मेरा जोश दोगुना हो गया। फिर मैंने उन्हें घुमाया और पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। उनका पिछवाड़ा इतना मुलायम और भारी था कि हर धक्के पर वह थरथराता था। हम दोनों पसीने में नहा चुके थे, लेकिन खुदाई की रफ्तार कम नहीं हो रही थी। अंत में, जब हम दोनों अपनी चरम सीमा पर पहुँचे, तो मेरा सारा रस उनकी खाई के अंदर छूट गया और उनका भी रस निकलकर बाहर बहने लगा।

उस गहरी खुदाई के बाद हम दोनों एक-दूसरे की बाहों में ढीले पड़ गए। मामी की हालत बेहाल थी, उनकी सांसें अभी भी तेज थीं और उनके चेहरे पर एक अजीब सी संतुष्टि थी। हमने करीब आधे घंटे तक कोई बात नहीं की, बस एक-दूसरे की धड़कनों को सुनते रहे। वह अहसास इतना गहरा था कि उसने हमारे रिश्ते को एक नई परिभाषा दे दी थी। मामी ने मेरे माथे को चूमा और धीरे से कहा, ‘तुमने मुझे आज वो सुख दिया है जो शायद मुझे कभी नहीं मिला।’ उस दोपहर के बाद, हमारे बीच की झिझक खत्म हो गई थी और वह कमरा हमारी उन गुप्त मुलाकातों का गवाह बन गया जहाँ हर बार एक नई कहानी लिखी जाती थी।

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