सूनी दोपहर में बुआ की मदहोश चाहत और गहरी खुदाई—>
दोपहर की उस तपती खामोशी में घर के सभी लोग शहर में एक शादी में गए हुए थे और पूरा घर सन्नाटे में डूबा हुआ था। मैं अपने कमरे में लेटा हुआ था कि तभी सुनीता बुआ कमरे में आईं और उन्होंने सिर दर्द की शिकायत की। सुनीता बुआ की उम्र ३८ साल थी, लेकिन उनके शरीर की बनावट किसी भी जवान लड़की को मात दे सकती थी। उनके चेहरे पर एक अजीब सी कशिश थी और उनकी आँखों में एक गहरा खालीपन था जो शायद उनके अकेलेपन की कहानी बयां कर रहा था।
बुआ ने पीले रंग की साड़ी पहनी हुई थी जिसमें उनके बड़े-बड़े और गदराए हुए तरबूज साफ झलक रहे थे और उनकी कमर का घेराव बहुत ही आकर्षक लग रहा था। जब वह बेड पर मेरे पास बैठीं, तो उनकी देह से उठती मोगरे की खुशबू ने मेरे दिमाग को सुन्न कर दिया। उनके तरबूज साड़ी के ब्लाउज को फाड़कर बाहर आने को बेताब लग रहे थे और उनकी गहरी खाई की कल्पना मात्र से मेरे शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। बुआ की त्वचा रेशम की तरह मुलायम और चमकदार थी।
मैंने धीरे से अपना हाथ उनके सिर पर रखा और मालिश करने लगा, लेकिन मेरा ध्यान उनके भावनात्मक दर्द पर भी था। उन्होंने बताया कि फूफाजी उन्हें समय नहीं देते और वह खुद को बहुत उपेक्षित महसूस करती हैं। उनकी बातों में छिपा वह दर्द और उनकी सांसों की बढ़ती हुई गर्मी मुझे एक अलग ही दुनिया में ले जा रही थी। हमारे बीच का यह भावनात्मक जुड़ाव धीरे-धीरे एक शारीरिक आकर्षण में बदलने लगा था और कमरे का तापमान जैसे बढ़ने लगा था।
मालिश करते-करते मेरा हाथ अनजाने में उनके कंधे से फिसलकर उनके तरबूज के ऊपरी हिस्से को छू गया। बुआ ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई और उन्होंने गहरी सांस ली। मेरा मन झिझक रहा था कि यह सही है या गलत, लेकिन उनकी मदहोश कर देने वाली महक और उनके शरीर की गर्मी ने मेरी सारी हिचकिचाहट को खत्म कर दिया। वह पल हमारे बीच के मन के संघर्ष के खत्म होने का गवाह था।
मेरा हाथ अब पूरी तरह से उनके रेशमी तरबूजों पर था और मैं उन्हें धीरे-धीरे सहलाने लगा था। बुआ के मटर जैसे छोटे हिस्से अब साड़ी के ऊपर से ही सख्त महसूस होने लगे थे, जिससे पता चल रहा था कि वह भी इसी पल का इंतजार कर रही थीं। मैंने धीरे से उनके होंठों का स्पर्श किया और हमारा पहला चुंबन इतना गहरा था कि जैसे दो आत्माएं एक-दूसरे में समा जाना चाहती हों। उनकी सांसों की कंपकंपी मेरे कानों में संगीत की तरह गूँज रही थी।
मैंने धीरे से उनकी साड़ी के पल्लू को हटाया और उनके तरबूजों को आज़ाद कर दिया जो अब पूरी तरह से मेरे सामने अपनी पूरी रंगत में थे। उनके मटर जैसे हिस्सों को जब मैंने अपने मुंह में लिया, तो बुआ के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली आह निकली। फिर मेरा हाथ नीचे की ओर बढ़ा जहाँ उनकी खाई के पास के काले बाल मेरी उंगलियों को सहला रहे थे। उनकी खाई अब पूरी तरह से गीली और चिपचिपी हो चुकी थी जो खुदाई के लिए तैयार थी।
बुआ ने धीरे से मेरे कपड़े उतारे और मेरे सख्त और विशाल खीरे को अपने हाथों में ले लिया। उनके कोमल हाथों का स्पर्श मेरे खीरे पर होते ही मेरी नसों में बिजली सी दौड़ गई। उन्होंने कुछ देर तक मेरे खीरे को अपने मुँह में लेकर उसे प्यार से सहलाया और खीरा चूसने की प्रक्रिया शुरू की। उनके मुँह की गर्मी और जीभ का वह अहसास मुझे सातवें आसमान पर ले जा रहा था और मैं बस उनकी जुल्फों को पकड़े हुए इस आनंद में खोया रहा।
अब समय आ गया था उस असली खेल का जिसके लिए हम दोनों तड़प रहे थे। मैंने बुआ को बेड पर लेटाया और सामने से खुदाई (missionary) शुरू करने की तैयारी की। जैसे ही मेरा कठोर खीरा उनकी तंग और रसीली खाई के द्वार पर पहुँचा, बुआ ने जोर से मेरी पीठ को जकड़ लिया। धीरे-धीरे मैंने अपने खीरे को उनकी खाई की गहराइयों में उतारना शुरू किया। वह अहसास इतना सुखद और तंग था कि मुझे लगा जैसे मैं किसी स्वर्ग की खाई में उतर रहा हूँ।
हमारी खुदाई अब अपनी पूरी रफ्तार पकड़ चुकी थी और कमरे में सिर्फ हमारे शरीरों के टकराने की आवाज़ और बुआ की सिसकारियां गूँज रही थीं। मैं लगातार उनके तरबूजों को मसल रहा था और नीचे से पूरी ताकत के साथ उनकी खाई को खोद रहा था। बुआ बार-बार मुझे और जोर से खोदने के लिए कह रही थीं और उनका शरीर हर धक्के के साथ ऊपर की ओर उछल रहा था। पसीने से लथपथ हमारे शरीर एक-दूसरे में पूरी तरह से विलीन हो चुके थे।
अंत में जब मेरा बर्दाश्त खत्म हुआ, तो मेरा सारा रस उनकी खाई की गहराइयों में छूटने लगा और ठीक उसी पल बुआ का भी रस निकल गया। हम दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए बेदम होकर बेड पर गिर पड़े। उस चरम आनंद के बाद बुआ की आँखों में एक संतुष्टि थी और मेरे मन में उनके प्रति एक गहरा सम्मान और जुड़ाव। उस दोपहर की वह खुदाई हमारे बीच एक ऐसा राज बन गई थी जिसे हम दोनों ताउम्र अपने सीने में दफन रखने वाले थे।