पुरानी मोहब्बत का नया अहसास और बाग की तन्हाई—>कॉलेज के उन बीते हुए गलियारों से निकलकर आज दस साल बाद समीर और कविता एक बार फिर आमने-सामने थे। समीर ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि अपनी पुरानी क्रश से वह इस तरह एक सुनसान और आलीशान फार्महाउस के पिछले हिस्से में बने घने बाग में मिलेगा। कविता अब पहले से कहीं ज्यादा निखर गई थी, उसकी उम्र अब तीस के करीब थी लेकिन उसके बदन की ढलान और कसावट किसी मदमस्त कर देने वाली सुराही की तरह थी। शाम के धुंधलके में जब हल्की ठंडी हवा चल रही थी, कविता ने एक गहरे बैंगनी रंग की रेशमी साड़ी पहन रखी थी जो उसके जिस्म के हर उतार-चढ़ाव को बड़ी बेरहमी से बयां कर रही थी। समीर की नजरें बार-बार उसके उन उभरे हुए तरबूज पर टिक जाती थीं, जो ब्लाउज की तंग सीमा को तोड़कर बाहर आने को बेताब दिख रहे थे।
समीर और कविता एक पुराने पत्थर के बेंच पर बैठे थे, जहाँ चारों तरफ मोगरे और रात की रानी की खुशबू फैली हुई थी। उनके बीच की बातचीत में पुरानी यादें और अनकही बातें तैर रही थीं, लेकिन दोनों के दिलों में एक अजीब सी बेचैनी थी जो शब्दों से परे थी। समीर ने महसूस किया कि जब भी वह कविता की आँखों में देखता, कविता अपनी नजरें झुका लेती और उसके गालों पर गुलाबी रंगत छा जाती। कविता की साड़ी का पल्लू हवा के झोंके से बार-बार खिसक रहा था, जिससे उसके गोरे पेट की चिकनाई और गहरी नाभि साफ दिखाई दे रही थी। समीर का मन हुआ कि वह बस अपना हाथ बढ़ाए और उस रेशमी त्वचा को छू ले, लेकिन सालों की झिझक उसे रोके हुए थी।
बातों-बातों में समीर का हाथ गलती से कविता के हाथ पर पड़ गया और दोनों के बीच जैसे बिजली कौंध गई। कविता ने हाथ हटाया नहीं, बल्कि उसकी उंगलियां समीर की उंगलियों में धीरे से फंस गईं। समीर ने देखा कि कविता की सांसें अब थोड़ी तेज चलने लगी थीं और उसके तरबूज साड़ी के नीचे तेजी से ऊपर-नीचे हो रहे थे। समीर ने धीरे से फुसफुसाते हुए कहा, ‘कविता, तुम आज भी उतनी ही खूबसूरत हो जितनी कॉलेज के पहले दिन थी।’ कविता ने मुस्कुराते हुए समीर की ओर देखा और उसकी आँखों में छिपी प्यास समीर को सब कुछ समझा गई। उसने समीर का हाथ पकड़कर अपने चेहरे के पास ले जाकर अपनी बंद आँखों पर रख लिया, जिससे समीर के अंदर दबी हुई बरसों की इच्छाएं एक झटके में जाग उठीं।
समीर अब और खुद को काबू में नहीं रख पाया, उसने अपनी जगह से उठकर कविता के बिल्कुल पास जाकर बैठ गया। उसके शरीर की गर्मी कविता को महसूस हो रही थी, और कविता की सिसकारी हवा में गूंज उठी जब समीर ने अपना हाथ उसके कंधे पर रखा। साड़ी का पल्लू अब पूरी तरह से नीचे गिर चुका था, जिससे उसके भारी और गोल-मटोल तरबूज अब समीर की नजरों के ठीक सामने थे। समीर ने अपनी उंगलियों से साड़ी के कपड़े के ऊपर से ही उन तरबूजों को सहलाना शुरू किया, तो कविता ने अपनी गर्दन पीछे की ओर झुका दी और एक गहरी आह भरी। समीर ने महसूस किया कि उन रेशमी तरबूजों के बीचों-बीच स्थित मटर अब कड़े हो चुके थे, जो उसकी उंगलियों को साफ़ महसूस हो रहे थे।
समीर ने अपना चेहरा कविता के गले के पास ले जाकर उसकी खुशबू को गहराई से महसूस किया और फिर धीरे से उसके कानों के पास फुसफुसाया, ‘मैं सालों से बस इसी पल का इंतजार कर रहा था।’ कविता ने कांपते हुए हाथों से समीर के बालों को पकड़ लिया और उसे अपनी ओर और करीब खींच लिया। समीर का हाथ अब कविता की कमर से होता हुआ साड़ी के नीचे जा रहा था, जहाँ उसे उसकी रेशमी और मुलायम त्वचा का स्पर्श मिला। जैसे ही समीर का हाथ कविता की जांघों के बीच की उस रहस्यमयी खाई के पास पहुँचा, कविता की देह पूरी तरह से धनुष की तरह तन गई। वह खाई अब पूरी तरह से नम हो चुकी थी, जिसका गीलापन समीर की उंगलियों को एक अलग ही नशे का अहसास करा रहा था।
समीर ने अब धीरे से कविता को उस बेंच पर लिटा दिया और उसकी साड़ी के बंधनों को पूरी तरह से मुक्त कर दिया। कविता अब समीर के सामने बिल्कुल उसी अवस्था में थी जैसे कुदरत ने उसे बनाया था। उसके गोरे बदन पर चाँदनी की रोशनी पड़ रही थी, जिससे उसके शरीर का हर अंग चमक रहा था। समीर ने देखा कि उसकी खाई के चारों ओर काले और घने बाल फैले हुए थे, जो उस कुदरती सुंदरता को और भी कामुक बना रहे थे। समीर ने अपनी जीभ से उसके तरबूजों को चूमना और चाटना शुरू किया, और जब उसने एक मटर को अपने मुंह में लेकर धीरे से दबाया, तो कविता के मुंह से एक लंबी और तीखी कराह निकली।
कविता अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी थी, उसने समीर की पेंट की बेल्ट को खोलना शुरू किया और जल्द ही उसका खीरा उसके हाथों में था। समीर का खीरा अब पूरी तरह से अकड़ चुका था और वह कविता के हाथों की पकड़ में अपनी पूरी मजबूती के साथ खड़ा था। कविता ने उस खीरे को अपनी आँखों से लगाया और फिर धीरे से उसे अपने मुंह में ले लिया। कविता द्वारा खीरा चूसने की उस क्रिया ने समीर के दिमाग की सारी नसें हिला दीं। वह एक हाथ से कविता के बालों को सहला रहा था और दूसरा हाथ उसके पिछवाड़े की गोलाई को महसूस कर रहा था। कविता का खीरा चूसना इतना आनंददायक था कि समीर को लगा जैसे उसका रस अभी निकल जाएगा, लेकिन उसने खुद को रोका।
समीर ने अब कविता को सीधा लेटने का इशारा किया और उसके दोनों पैरों को उठाकर अपने कंधों पर रख लिया। यह सामने से खोदना शुरू करने का सबसे सही पल था। समीर ने अपने खीरे की नोक को कविता की उस गीली और तंग खाई के मुहाने पर टिकाया और धीरे से दबाव डाला। कविता की आँखों से हल्का सा आंसू निकल आया लेकिन वह दर्द का नहीं, बल्कि बरसों की प्यास बुझने का सुख था। जैसे ही समीर का आधा खीरा उस खाई के भीतर समाया, कविता ने अपने नाखून समीर की पीठ में गड़ा दिए। समीर ने एक गहरा धक्का मारा और पूरा खीरा खाई की गहराइयों में समा गया। दोनों के शरीर एक-दूसरे से पूरी तरह चिपक गए और पसीने की बूंदें एक-दूसरे में मिल रही थीं।
समीर ने खुदाई की गति को अब धीरे-धीरे बढ़ाना शुरू किया। हर धक्के के साथ कविता का पूरा शरीर हिल रहा था और उसके तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे। ‘ओह समीर… और तेज… मुझे और गहराई तक खोदो…’ कविता मदहोशी में बड़बड़ा रही थी। समीर ने उसके हाथों को ऊपर की ओर कसकर पकड़ लिया और अपनी पूरी ताकत के साथ खुदाई जारी रखी। बाग के उस शांत माहौल में केवल उनके शरीरों के टकराने की आवाज और उनकी तेज सांसें ही सुनाई दे रही थीं। समीर ने महसूस किया कि कविता की खाई अब और भी ज्यादा गीली और गरम हो चुकी थी, जो उसके खीरे को कसकर जकड़े हुए थी।
थोड़ी देर बाद समीर ने कविता को पलटा दिया और उसे घुटनों के बल खड़ा कर दिया। पिछवाड़े से खोदना समीर की सबसे बड़ी फैंटेसी थी। कविता का पिछवाड़ा इस स्थिति में और भी ज्यादा भरा हुआ और आकर्षक लग रहा था। समीर ने फिर से अपने खीरे को पीछे से उसकी खाई में उतारा और इस बार खुदाई की लय और भी ज्यादा आक्रामक थी। कविता के दोनों हाथ ज़मीन पर टिके थे और वह हर धक्के पर जोर-जोर से कराह रही थी। समीर ने उसके मटर को अपने हाथों से सहलाते हुए खुदाई जारी रखी, जिससे कविता का उत्तेजना का स्तर सातवें आसमान पर पहुँच गया।
खुदाई अब अपने चरम पर पहुँच रही थी। समीर को महसूस हुआ कि उसके खीरे के अंदर का दबाव अब बाहर निकलने को बेताब है। कविता भी अब पूरी तरह से कांपने लगी थी, उसकी खाई की दीवारें समीर के खीरे को अंदर ही अंदर भींच रही थीं। ‘समीर… मेरा रस निकलने वाला है… मुझे और जोर से खोदो!’ कविता चिल्लाई। समीर ने अपनी गति को और तेज कर दिया और आखिरी के कुछ जोरदार धक्के मारे। अचानक कविता का पूरा शरीर थरथराया और उसकी खाई से गरम रस का फव्वारा छूट पड़ा। ठीक उसी समय समीर ने भी अपने खीरे का सारा गरम रस कविता की उस गहरी खाई के अंदर उड़ेल दिया।
दोनों कुछ देर तक उसी अवस्था में एक-दूसरे से लिपटे रहे, उनकी सांसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। समीर कविता के ऊपर ही लेट गया और उसके माथे को चूम लिया। कविता की आँखों में एक अजीब सी शांति और संतुष्टि थी। उस बाग की चांदनी में उन दोनों के नंगे बदन एक-दूसरे की गर्मी का अहसास कर रहे थे। सालों का वह भावनात्मक और शारीरिक अधूरापन आज पूरी तरह से भर चुका था। कविता ने समीर को कसकर गले लगा लिया और कहा, ‘आज मुझे अहसास हुआ कि मैं सच में जी रही हूँ।’ समीर ने बस मुस्कुराकर उसे और करीब खींच लिया, और वह रात उन दोनों की जिंदगी की सबसे यादगार और रसीली रात बन गई।