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जिम वाली अंजलि मैम के साथ सुनसान पार्क की वह मदहोश शाम


जिम वाली अंजलि मैम के साथ सुनसान पार्क की वह मदहोश शाम—>

अंजलि मैम, जो पिछले छह महीनों से मेरी जिम ट्रेनर थीं, उनका व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था कि कोई भी पुरुष उन्हें देखते ही अपनी सुध-बुध खो दे। उनकी उम्र करीब तीस के आसपास रही होगी, लेकिन उनकी कसरत से तराशी गई देह किसी बीस साल की युवती को भी मात देती थी। उनके शरीर का हर हिस्सा जैसे किसी शिल्पी ने बड़ी फुर्सत में गढ़ा था। जब भी वे जिम में टाइट लेगिंग्स और स्पोर्ट्स ब्रा पहनकर कसरत करतीं, तो उनके पीछे से उभरता हुआ भारी पिछवाड़ा और सामने की ओर तने हुए उनके रसीले तरबूज हर किसी की आँखों में बस जाते थे। अंजलि मैम की त्वचा का रंग हल्का सांवला था, जो पसीने की बूंदों के साथ और भी ज्यादा चमकने लगता था। मैं अक्सर कसरत के बहाने उन्हें टकटकी लगाकर देखता रहता, विशेषकर जब वे झुकतीं और उनके तरबूजों की गहरी घाटी साफ नजर आती।

उस शाम जिम की छुट्टी थी, और हमने शहर के किनारे स्थित एक सुनसान पुराने पार्क में मिलने का फैसला किया था। शाम के धुंधलके में पार्क बिल्कुल शांत था, बस झींगुरों की आवाज सुनाई दे रही थी। अंजलि मैम एक हल्के नीले रंग की स्लीवलेस कुर्ती और सफेद पटियाला सलवार में आई थीं। उस ढीले लिबास में भी उनके अंगों की बनावट छिप नहीं पा रही थी। उनके तरबूज कुर्ती के कपड़े को चीरकर बाहर आने को बेताब लग रहे थे। हम एक पुराने पत्थर के बेंच पर बैठ गए। जैसे-जैसे अंधेरा गहराने लगा, हमारी बातों का सिलसिला भी गहरा होता गया। मैंने महसूस किया कि अंजलि मैम की सांसें कुछ तेज हो रही थीं और उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी।

मैंने धीरे से अपना हाथ उनकी कमर पर रखा। उनकी रेशमी त्वचा के स्पर्श ने मेरे पूरे शरीर में बिजली की एक लहर दौड़ा दी। अंजलि मैम ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि वे थोड़ा और मेरे करीब खिसक आईं। मैंने उनकी मखमली गर्दन पर अपने होठों का स्पर्श किया, तो उनके मुंह से एक हल्की सी कराह निकली। उनका पूरा शरीर कांपने लगा था। मेरा हाथ उनकी कमर से नीचे सरकते हुए उनके भारी और गोल पिछवाड़े पर जा टिका। सलवार के कपड़े के ऊपर से भी उनके पिछवाड़े की गोलाई और सख्ती का एहसास लाजवाब था। उन्होंने अपना सिर मेरे कंधे पर टिका दिया और अपनी आँखें मूंद लीं।

धीमी गति से बढ़ती इस उत्तेजना में मैंने उनके चेहरे को हाथों में भरा और उनके होठों का रसपान करना शुरू कर दिया। उनके होठों से एक मादक खुशबू आ रही थी। मेरा हाथ उनकी कुर्ती के अंदर गया और सीधे उनके रेशमी तरबूजों को अपनी मुट्ठी में भर लिया। वे बिना किसी बंधन के थे, बहुत ही कोमल और गर्म। जैसे ही मैंने उनके बीच में मौजूद छोटे-छोटे मटरों को अपनी उंगलियों से सहलाया, अंजलि मैम ने कसकर मेरा हाथ पकड़ लिया। उनके मटर अब पूरी तरह से सख्त हो चुके थे, जो मेरी हथेलियों पर चुभ रहे थे। वे जोर-जोर से सांसें लेने लगीं और उनके तरबूजों की धड़कन मैं अपनी हथेली पर महसूस कर सकता था।

अब सब्र का बांध टूट रहा था। मैंने उन्हें बेंच से उठाकर पास ही की घनी झाड़ियों के पीछे ले गया, जहाँ घास की एक मखमली चादर बिछी थी। मैंने धीरे से उनकी कुर्ती ऊपर की और उनके दोनों विशाल तरबूजों को पूरी तरह आजाद कर दिया। चाँदनी की हल्की रोशनी में उनके उभरे हुए मटर किसी मोती की तरह चमक रहे थे। मैंने झुककर एक तरबूज को अपने मुंह में भरा और उनके मटर को जीभ से सहलाने लगा। अंजलि मैम मेरा सिर अपने सीने से चिपकाए हुए बस आहें भर रही थीं। उनकी एक सिसकी ने मेरे अंदर की आग को और भड़का दिया। मेरा हाथ उनकी सलवार के अंदर सरकते हुए उस रेशमी खाई तक पहुँच गया, जहाँ घने बाल मौजूद थे।

जैसे ही मेरी उंगली उनकी खाई के स्पर्श में आई, मैंने पाया कि वह पहले से ही काफी गीली हो चुकी थी। उनकी खाई का द्वार बहुत ही कोमल और गर्माहट से भरा था। मैंने अपनी उंगली से खोदना शुरू किया, तो वे कमर उचकाकर मेरा साथ देने लगीं। उनकी खाई से एक चिपचिपा रस निकल रहा था जो मेरी उंगलियों को फिसलन भरा बना रहा था। वे सिसकते हुए कह रही थीं, ‘ओह राहुल… तुम बहुत शरारती हो गए हो, कितना तड़पाओगे मुझे?’ उनकी ये बातें सुनकर मेरा खीरा भी अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ मेरी पतलून को फाड़ देने पर आमादा था।

मैंने अपनी पतलून उतारी और अपने सख्त खीरे को उनके हाथों में दे दिया। अंजलि मैम ने जैसे ही मेरे खीरे को छुआ, उनकी आँखों में एक अलग ही प्यास नजर आई। उन्होंने अपने नाजुक हाथों से मेरे खीरे को सहलाया और फिर उसे धीरे से अपने मुंह में भर लिया। जब उन्होंने मेरे खीरे को चूसना शुरू किया, तो मुझे लगा जैसे मेरा स्वर्ग यहीं है। उनकी जीभ का मेरे खीरे की नोक पर चलना मुझे पागल बना रहा था। कुछ ही पलों में मैंने उन्हें लेटने का इशारा किया। उन्होंने अपनी टांगें फैला दीं और उनकी रसभरी खाई अब पूरी तरह से मेरे सामने खुली थी।

मैंने अपने खीरे की नोक को उनकी खाई के मुहाने पर टिकाया। अंजलि मैम ने कसकर मेरी पीठ में अपने नाखून गड़ा दिए। मैंने एक झटके के साथ अपने आधे खीरे को उनकी तंग खाई के अंदर उतार दिया। उनके मुंह से एक लंबी चीख निकली जो रात के सन्नाटे में कहीं खो गई। उनकी खाई इतनी तंग थी कि मेरा खीरा चारों तरफ से दब रहा था। मैंने धीरे-धीरे खुदाई शुरू की। जैसे-जैसे मेरा खीरा उनकी खाई की गहराई को नाप रहा था, वैसे-वैसे उनकी सिसकियां तेज होती जा रही थीं। ‘हाँ राहुल… और जोर से खोदो… पूरी गहराई तक जाओ,’ वे बेहाल होकर बोल रही थीं।

खुदाई की गति अब तेज हो गई थी। हर बार जब मेरा खीरा उनकी खाई से बाहर आता और फिर पूरी ताकत से अंदर जाता, तो एक अजीब सी छप-छप की आवाज आती थी। अंजलि मैम के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके मटर पूरी तरह से तन चुके थे। मैंने उनके दोनों पैरों को अपने कंधों पर रखा और पिछवाड़े को थोड़ा ऊपर उठाकर फिर से खुदाई शुरू की। अब मेरा खीरा उनकी खाई के सबसे गहरे कोने को छू रहा था। अंजलि मैम के शरीर में एक अजीब सी थरथराहट होने लगी। उनके चेहरे के भाव बता रहे थे कि वे बस अब चरम सीमा तक पहुँचने ही वाली हैं।

अचानक अंजलि मैम ने मुझे कसकर जकड़ लिया और उनके शरीर में तेज कंपन हुआ। उनकी खाई से ढेर सारा रस छूटने लगा, जिसने मेरे खीरे को पूरी तरह भिगो दिया। उसी पल मेरे खीरे ने भी अपना सारा गर्म रस उनकी खाई की गहराई में छोड़ दिया। हम दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए वहीं घास पर गिर पड़े। हमारी सांसें अभी भी बेकाबू थीं और पसीना एक-दूसरे के शरीर में मिल रहा था। वह रात और वह सुनसान पार्क हमारी इस अटूट प्यास और खुदाई का गवाह बन गया था। कुछ देर तक हम मौन रहे, बस एक-दूसरे के शरीर की गर्माहट को महसूस करते रहे। अंजलि मैम ने मेरे माथे को चूमा और धीरे से कहा, ‘तुमने तो आज मुझे मेरी ही ट्रेनिंग का मजा चखा दिया।’

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