समीर ने अभी दो दिन पहले ही इस नए शहर के एक शांत अपार्टमेंट में अपना सामान शिफ्ट किया था। दोपहर की चिलचिलाती धूप खिड़की के पर्दों को चीरती हुई अंदर आ रही थी और कमरा उमस से भरा हुआ था। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई और उसने गेट खोला तो सामने कविता खड़ी थी। कविता, जो उसी के बगल वाले फ्लैट में रहती थी, एक गहरे नीले रंग की सूती साड़ी पहने हुई थी जिसमें उसकी देह के उभार साफ झलक रहे थे। समीर उसे पहली बार इतनी करीब से देख रहा था और उसकी आँखों की गहराई में एक अजीब सी बेचैनी थी।
कविता की उम्र करीब बत्तीस साल रही होगी, लेकिन उसके शरीर का ढांचा किसी कमसिन कली जैसा कसा हुआ था। साड़ी के छोटे से ब्लाउज से उसके गोल-मटोल और भारी तरबूज आधे बाहर झांक रहे थे, जिन्हें देखकर समीर के मन में हलचल मच गई। उसकी कमर का घेरा और वहां पर पड़ने वाली सिलवटें समीर की धड़कनें बढ़ा रही थीं। कविता ने मुस्कुराते हुए कहा कि उसे थोड़ी चीनी चाहिए थी, लेकिन उसकी नजरें समीर के चेहरे से ज्यादा उसके मजबूत कंधों और छाती पर टिकी हुई थीं।
समीर ने उसे अंदर बुलाया और जैसे ही वह कमरे के अंदर आई, पूरे माहौल में उसकी परफ्यूम की मीठी खुशबू घुल गई। दोनों के बीच बातों का सिलसिला शुरू हुआ और समीर को पता चला कि कविता के पति अक्सर बिजनेस के सिलसिले में शहर से बाहर रहते हैं। उसकी बातों में एक अकेलापन था, जो धीरे-धीरे एक भावनात्मक जुड़ाव में बदलने लगा। समीर ने गौर किया कि बात करते समय कविता बार-बार अपने पल्लू को ठीक कर रही थी, जिससे उसके तरबूज और भी ज्यादा उभर कर सामने आ रहे थे।
कमरे का तापमान बढ़ता जा रहा था और दोनों के बीच की झिझक धीरे-धीरे खत्म हो रही थी। समीर ने साहस जुटाकर कविता के हाथ को छुआ, जिससे वह सिहर उठी। उसके शरीर में एक कंपकंपी सी दौड़ गई और उसने अपनी पलकें झुका लीं। यह पहला स्पर्श था जिसने दोनों के दिलों में छिपी दबी हुई इच्छाओं को जगा दिया था। समीर ने देखा कि कविता के चेहरे पर पसीने की छोटी-छोटी बूंदें चमक रही थीं और उसकी सांसें तेज चलने लगी थीं, जो उसके तरबूजों को ऊपर-नीचे कर रही थीं।
समीर धीरे से उसके करीब गया और उसने अपना हाथ कविता की पतली कमर पर रखा। कविता ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि वह और भी करीब आ गई। समीर ने अपने होंठ उसके होंठों से मिला दिए और दोनों एक-दूसरे के रस में डूबने लगे। यह चुंबन इतना गहरा और भावुक था कि समीर को लगा जैसे वह किसी और ही दुनिया में पहुँच गया है। उसने महसूस किया कि कविता के हाथ उसके बालों में उलझ रहे थे और वह भी उतने ही वेग से प्रतिक्रिया दे रही थी।
समीर के हाथ अब कविता के ब्लाउज की ओर बढ़े और उसने धीरे-धीरे उसे खोलना शुरू किया। जैसे ही ब्लाउज ढीला हुआ, उसके गोरे और बड़े तरबूज समीर की आँखों के सामने पूरी तरह आजाद हो गए। उन तरबूजों के बीच में उभरे हुए मटर जैसे काले हिस्से ठंड और उत्तेजना से सख्त हो चुके थे। समीर ने अपना मुंह उन तरबूजों पर रख दिया और उन्हें प्यार से सहलाने लगा। कविता के मुंह से हल्की सी आह निकली और उसने समीर के सिर को अपने सीने से जोर से चिपका लिया।
धीरे-धीरे समीर ने उसके सारे कपड़े उतार दिए और अब कविता उसके सामने पूरी तरह से प्राकृतिक अवस्था में थी। उसकी जांघों के बीच की खाई पर काले रेशमी बाल बिखरे हुए थे, जो उसकी खूबसूरती को और बढ़ा रहे थे। समीर ने अपनी उंगली से उसकी खाई को सहलाना शुरू किया, तो वह पानी-पानी होने लगी। कविता की खाई से निकलता हुआ चिपचिपा तरल समीर की उंगलियों को भिगो रहा था। वह दर्द और मजे के मिले-जुले अहसास से कराह रही थी और अपनी पीठ धनुष की तरह मोड़ रही थी।
अब समीर ने अपना पैंट उतारा और उसका कड़क और लंबा खीरा उछलकर बाहर आ गया। कविता की नजरें जब उस खीरे पर पड़ीं, तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने अपने कांपते हाथों से उस खीरे को पकड़ा और उसे सहलाने लगी। खीरे की गर्मी और उसकी कठोरता कविता को और भी ज्यादा पागल कर रही थी। समीर ने अपना खीरा उसके मुंह के करीब लाया और कविता ने बिना किसी झिझक के उसे अपने मुंह में ले लिया। वह उस खीरे को चूसने लगी जैसे कोई स्वादिष्ट फल हो।
खीरे को चूसते समय कविता की आँखों में एक अजीब सा समर्पण था। समीर को लग रहा था कि उसका रस निकलने ही वाला है, लेकिन उसने खुद पर काबू पाया। उसने कविता को बिस्तर पर लिटाया और उसकी दोनों टांगें अपनी कमर पर रख लीं। अब समय था असली खुदाई का। समीर ने अपने खीरे की नोक को कविता की गीली खाई पर रखा और एक जोरदार धक्का दिया। खीरा आधा उसकी खाई के अंदर समा गया और कविता के मुंह से एक लंबी चीख निकली, जो कमरे की दीवारों से टकराकर वापस आई।
समीर ने रुककर उसे संभलने का मौका दिया और फिर धीरे-धीरे सामने से खोदना शुरू किया। हर धक्के के साथ खीरा उसकी खाई की गहराई को नाप रहा था। कविता की खाई इतनी तंग और गर्म थी कि समीर को लग रहा था कि उसका पूरा वजूद उसमें समा जाएगा। दोनों के शरीर पसीने से लथपथ हो चुके थे और कमरे में सिर्फ उनके जिस्मों के टकराने की आवाज गूंज रही थी। कविता समीर की पीठ पर अपने नाखून गड़ा रही थी और बार-बार ‘ओह’ और ‘आह’ की आवाजें निकाल रही थी।
कुछ देर सामने से खोदने के बाद समीर ने कविता को घुमाया और उसे बिस्तर पर घुटनों के बल खड़ा कर दिया। अब वह पिछवाड़े से खोदने की मुद्रा में थी। समीर ने पीछे से अपने खीरे को फिर से उसकी खाई में उतारा और इस बार गहराई और भी ज्यादा महसूस हो रही थी। कविता के पिछवाड़े के भारी हिस्से हर धक्के के साथ हिल रहे थे, जो समीर के जोश को और बढ़ा रहे थे। वह पागलों की तरह उसे खोद रहा था और कविता बस मजे के सागर में गोते लगा रही थी।
खुदाई की प्रक्रिया अब अपने चरम पर पहुँच चुकी थी। समीर की सांसें उखड़ रही थीं और कविता का शरीर रह-रहकर कांप रहा था। समीर ने अपनी गति और बढ़ा दी और वह तेजी से खीरे को अंदर-बाहर करने लगा। अचानक कविता ने एक जोर की कराह भरी और उसका शरीर पूरी तरह ढीला पड़ गया। उसकी खाई से रस निकलने लगा था और वह अपने चरम आनंद पर पहुँच चुकी थी। ठीक उसी पल, समीर का खीरा भी फटने को तैयार था और उसने अपना सारा रस कविता की खाई की गहराइयों में छोड़ दिया।
दोनों एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े, पूरी तरह निढाल। कमरे में अब शांति थी, सिर्फ उनकी भारी सांसों की आवाज सुनाई दे रही थी। समीर ने कविता को अपनी बाहों में भर लिया और उसके माथे को चूमा। कविता के चेहरे पर एक अजीब सी संतुष्टि और चमक थी। वह थोड़ी देर पहले की उस जंगली खुदाई और अपने अंगों के मिलन को याद कर मुस्कुरा रही थी। दोनों की हालत ऐसी थी जैसे उन्होंने कोई बड़ी जंग जीती हो, लेकिन यह जंग प्यार और वासना की थी, जिसने दो अजनबियों को हमेशा के लिए एक अटूट बंधन में बांध दिया था।