कविता अजनबी की चु@@ई—>मुंबई से दिल्ली जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस के ए-सी कोच में समीर अपनी सीट पर बैठा बाहर अंधेरे को देख रहा था तभी उसकी नजर सामने वाली बर्थ पर बैठी एक बेहद खूबसूरत महिला पर पड़ी जिसका नाम कविता था। कविता की उम्र करीब पैंतीस साल रही होगी और उसकी काया किसी अप्सरा से कम नहीं थी उसने गहरे नीले रंग की साड़ी पहनी थी जिसमें से उसके शरीर के उभार साफ नजर आ रहे थे। समीर ने देखा कि कविता के तरबूज साड़ी के पतले कपड़े के नीचे से झांक रहे थे और उनकी गोलाई इतनी मादक थी कि समीर का मन मचल उठा और उसके पैंट के अंदर उसका सोता हुआ खेरा धीरे-धीरे सिर उठाने लगा था।
कविता की शारीरिक बनावट बहुत ही आकर्षक थी उसके चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी और उसके होंठों पर लगी लाल लिपस्टिक उसे और भी कामुक बना रही थी। जब वह अपनी साड़ी का पल्लू ठीक कर रही थी तो समीर की नजरें उसके तरबूज के बीच की उस गहरी दरार पर टिक गई जिसे देखकर किसी भी मर्द का ईमान डोल जाए। समीर ने महसूस किया कि कविता भी उसे चोरी-छिपे देख रही है और जब उनकी नजरें मिलीं तो कविता के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई जिससे समीर का हौसला और भी बढ़ गया। ट्रेन की रफ्तार के साथ-साथ समीर के दिल की धड़कनें भी तेज हो रही थीं क्योंकि उसे लग रहा था कि आज रात कुछ खास होने वाला है।
समीर ने बातचीत शुरू करने के इरादे से कविता से पूछा कि वह कहां जा रही है और धीरे-धीरे बातों का सिलसिला चल पड़ा जिससे उनके बीच की झिझक कम होने लगी। बातों-बातों में समीर ने कविता के करीब होने का बहाना ढूंढा और जब ट्रेन ने एक तेज मोड़ लिया तो समीर का हाथ गलती से कविता के घुटने पर जा टिका। उस स्पर्श से कविता के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई और उसने समीर का हाथ हटाने के बजाय अपनी आंखें मूंद लीं जिससे समीर समझ गया कि उसे आगे बढ़ने का इशारा मिल चुका है। समीर ने धीरे से अपना हाथ कविता की जांघों पर ऊपर की तरफ सरकाना शुरू किया और उसके शरीर की गर्मी को महसूस करने लगा।
समीर का हाथ अब कविता के कमर के पास पहुंच चुका था जहाँ से उसने साड़ी के अंदर हाथ डालना शुरू किया और उसकी चिकनी त्वचा को महसूस किया। कविता की सांसें अब तेज होने लगी थीं और वह समीर के कानों में फुसफुसाकर कहने लगी कि कोई देख लेगा लेकिन समीर ने उसे भरोसा दिलाया कि सब सो चुके हैं। समीर ने धीरे से कविता के तरबूज को अपने हाथों में भर लिया और उन्हें हल्के से दबाने लगा जिससे कविता के मुंह से एक दबी हुई कराह निकल पड़ी। उसके तरबूज इतने नरम और मांसल थे कि समीर का जी चाह रहा था कि वह वहीं पर अपनी प्यास बुझाना शुरू कर दे और अपने खेरे को उसकी खाई में उतार दे।
समीर ने अब अपने हाथ कविता के ब्लाउज के अंदर डाले और उसके मटर जैसे कठोर हो चुके निप्पल्स को अपनी उंगलियों के बीच सहलाने लगा। कविता की उत्तेजना अब चरम पर थी और उसने समीर के हाथ को पकड़कर अपने तरबूज पर जोर से दबाया जैसे वह और भी ज्यादा दबाव चाहती हो। समीर ने अपनी जगह बदली और कविता के बगल में जाकर बैठ गया और उसके गले पर अपने होंठों से स्पर्श करने लगा। पूरे केबिन में केवल ट्रेन के चलने की आवाज और उन दोनों की भारी होती सांसों की गूंज थी जो इस माहौल को और भी ज्यादा कामुक बना रही थी।
समीर ने अब कविता की साड़ी के नीचे हाथ डाला और उसकी रेशमी जांघों को सहलाते हुए उसकी खाई के पास पहुंच गया जो अब तक पूरी तरह से गीली हो चुकी थी। जैसे ही समीर की उंगलियों ने उसकी खाई के बालों को छुआ कविता ने सिसकारी भरी और समीर के बालों को अपने हाथों से जकड़ लिया। समीर ने अपनी उंगली से खोदना शुरू किया और कविता की गहराई को महसूस करने लगा जो बहुत ही तंग और रसीली थी। कविता अपने कूल्हों को समीर की उंगली के साथ तालमेल बिठाकर हिलाने लगी और उसका शरीर कामवासना की आग में पूरी तरह से जलने लगा था।
समीर अब और इंतजार नहीं कर सकता था उसने अपनी पैंट की चेन खोली और अपना फन फैलाए हुए खेरे को बाहर निकाला जो पूरी तरह से तना हुआ और कठोर था। कविता ने जैसे ही समीर के खेरे को देखा उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं और उसने धीरे से अपना हाथ बढ़ाकर उस गर्म लोहे जैसे खेरे को थाम लिया। कविता ने अपने होंठों को समीर के खेरे के पास लाया और उसे धीरे-धीरे चूसना शुरू किया जैसे वह किसी स्वादिष्ट फल का आनंद ले रही हो। समीर के मुंह से आनंद की एक आह निकली और वह कविता के सिर को पकड़कर उसे और भी गहराई से खेरा मुंह में लेने के लिए प्रेरित करने लगा।
कुछ देर खेरा चूसने के बाद कविता ने समीर को अपने ऊपर आने का इशारा किया और समीर ने बिना देर किए उसे बर्थ पर लिटा दिया। समीर ने कविता की टांगों को फैलाया और अपनी जगह बनाई ताकि वह उसकी गहरी खाई का दीदार कर सके जो अब रस से लबालब थी। समीर ने अपने खेरे की नोक को कविता की खाई के द्वार पर रखा और एक गहरा दबाव दिया जिससे खेरा आधा अंदर चला गया। कविता की आंखों में पानी आ गया लेकिन वह दर्द से ज्यादा आनंद की अनुभूति थी और उसने समीर की पीठ को अपने नाखूनों से खुरचना शुरू कर दिया।
समीर ने अब सामने से खोदना शुरू किया और हर धक्के के साथ उसका पूरा खेरा कविता की तंग खाई में समा जाता था। ट्रेन के हर झटके के साथ समीर की खुदाई की गति भी बढ़ती जा रही थी और कविता के तरबूज हवा में तेजी से उछल रहे थे। समीर ने कविता के मटर को अपने दांतों से हल्का सा काटा जिससे वह और भी ज्यादा बेकाबू हो गई और समीर को जोर-जोर से धक्का देने के लिए कहने लगी। कमरे के अंदर केवल पसीने की गंध और दोनों के शरीर के टकराने की चप-चप वाली आवाज गूँज रही थी जो समीर के जोश को सातवें आसमान पर पहुंचा रही थी।
कविता अब पूरी तरह से समर्पण कर चुकी थी और उसने अपनी टांगें समीर के कंधों पर रख लीं ताकि समीर और भी गहराई तक खुदाई कर सके। समीर का खेरा अब कविता के गर्भाशय को छूने लगा था और उसे महसूस हो रहा था कि कविता का रस निकलने वाला है। कविता जोर-जोर से हांफ रही थी और उसका शरीर थरथराने लगा था जैसे कोई बिजली का करंट दौड़ रहा हो। समीर ने अपनी गति और बढ़ा दी और तब तक खोदता रहा जब तक कि कविता ने एक लंबी चीख के साथ अपना सारा रस नहीं छोड़ दिया और उसका शरीर ढीला नहीं पड़ गया।
कविता के रस छूटने के तुरंत बाद समीर को भी महसूस हुआ कि उसका ज्वालामुखी भी फटने वाला है और उसने अंतिम कुछ जोरदार धक्के लगाए। समीर का रस भी पूरी ताकत के साथ कविता की खाई के अंदर भर गया जिससे कविता को एक सुखद गर्मी का एहसास हुआ। दोनों एक-दूसरे की बाहों में लिपटे हुए पसीने से लथपथ लेटे रहे और उनकी धड़कनें धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं। समीर ने कविता के माथे पर एक प्यार भरा स्पर्श किया और कविता ने उसे कसकर गले लगा लिया जैसे वह इस पल को कभी खत्म नहीं होने देना चाहती थी।
उस रात की खुदाई ने उन दोनों के बीच एक अनकहा रिश्ता बना दिया था जो केवल जिस्मानी नहीं बल्कि रूहानी भी महसूस हो रहा था। ट्रेन अपनी मंजिल की ओर बढ़ रही थी लेकिन समीर और कविता के लिए वह सफर अब हमेशा के लिए यादगार बन चुका था। कविता ने समीर के कान में कहा कि वह इस रात को कभी नहीं भूल पाएगी और समीर ने मुस्कुराते हुए उसके गालों को चूम लिया। जब सुबह हुई और स्टेशन आया तो दोनों ने एक-दूसरे को विदाई दी लेकिन उनकी आंखों में फिर से मिलने का एक वादा और उस रात की गर्म यादें हमेशा के लिए कैद हो गईं थीं।