जवान साली की चु@@ई—>उस दोपहर की खामोशी में एक अलग ही बेचैनी थी, जब समीर अपनी साली कविता के घर पहुँचा। कविता के पति यानी समीर के साढ़ू भाई काम के सिलसिले में शहर से बाहर गए हुए थे और कविता घर पर बिल्कुल अकेली थी। जैसे ही कविता ने दरवाजा खोला, समीर की नजरें उसकी कत्ल करने वाली सादगी पर टिक गईं। उसने एक बेहद पतली बैंगनी रंग की शिफॉन की साड़ी पहनी हुई थी, जो उसके शरीर के हर उतार-चढ़ाव को बड़ी बेरहमी से बयां कर रही थी। समीर को देखते ही कविता के चेहरे पर एक शरारती मुस्कान आ गई, जिसने समीर के दिल की धड़कनें तेज कर दीं। कमरे के अंदर कदम रखते ही समीर को कविता के इत्र की भीनी-भीनी खुशबू ने अपनी आगोश में ले लिया, जो माहौल को और भी मदहोश बना रही थी।
कविता की उम्र मुश्किल से छब्बीस-सत्ताईस साल रही होगी, लेकिन उसका शरीर किसी तराशी हुई मूरत जैसा था। साड़ी के पतले पल्लू के पीछे से उसके उभरे हुए गोल-मटोल तरबूज साफ झलक रहे थे, जो समीर के मन में हलचल पैदा कर रहे थे। कविता जब मुड़कर पानी लेने गई, तो समीर की नजरें उसके भारी और मांसल पिछवाड़े पर जा टिकीं, जो साड़ी के कपड़े में कैद होने की नाकाम कोशिश कर रहे थे। उसकी पतली कमर और भारी कूल्हों का वह संगम इतना कामुक था कि समीर के खीरे में हल्की सी हलचल शुरू हो गई। समीर ने गहरी सांस ली और खुद को काबू करने की कोशिश की, लेकिन कविता की हर अदा उसे अपनी तरफ खींच रही थी।
दोनों ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठ गए और औपचारिक बातें होने लगीं, लेकिन उन बातों के पीछे एक अनकही प्यास छिपी थी। कविता बार-बार अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक करने का बहाना कर रही थी, जिससे उसके गोरे तरबूज और भी ज्यादा नुमाया हो रहे थे। समीर ने महसूस किया कि कविता की निगाहें भी उसके चेहरे पर टिकी हुई हैं और उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक है। समीर ने धीरे से कहा, ‘कविता, आज तुम कुछ ज्यादा ही खूबसूरत लग रही हो, नजर हटाना मुश्किल हो रहा है।’ कविता ने अपनी पलकें झुका लीं और शरमाते हुए बोली, ‘जीजाजी, आप भी न बस मीठी-मीठी बातें करना जानते हैं, कभी दिल की बात भी समझ लिया कीजिए।’
उसकी इस बात ने समीर के भीतर दबी हुई इच्छाओं की आग को हवा दे दी और वह धीरे से खिसक कर कविता के और करीब आ गया। उनके बीच की दूरी अब खत्म हो चुकी थी और समीर को कविता के शरीर की गर्मी महसूस हो रही थी। उसने अपना हाथ धीरे से कविता के कंधे पर रखा, तो वह सिहर उठी लेकिन उसने हाथ हटाया नहीं। समीर ने उसकी आँखों में झाँकते हुए पूछा, ‘क्या सच में मैं तुम्हारे दिल की बात नहीं समझता?’ कविता ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपनी आँखें मूंद लीं और एक गहरी आह भरी। समीर ने मौका पाकर उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके होंठों का मधुवन रस पीने लगा, जो कि बहुत ही मीठा और नशीला था।
समीर के स्पर्श ने कविता के भीतर की झिझक को पूरी तरह खत्म कर दिया और वह भी पूरे जोश के साथ समीर के साथ जुड़ गई। समीर के हाथ अब कविता की कमर से होते हुए उसके ब्लाउज के अंदर दाखिल हो गए, जहाँ उसे कविता के गर्म और मुलायम तरबूज महसूस हुए। जैसे ही समीर ने उसके तरबूजों को अपनी हथेलियों में भरकर दबाया, कविता के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली आह निकल पड़ी। समीर ने अपनी उंगलियों से उन तरबूजों के ऊपर लगे छोटे-छोटे मटरों को सहलाना शुरू किया, जिससे कविता का पूरा शरीर कांपने लगा। वह समीर की बाँहों में पिघलने लगी थी और उसकी साँसों की रफ्तार तेज हो गई थी।
समीर ने अब अपनी दिशा बदली और कविता की गर्दन और कंधों को चूमते हुए नीचे की ओर बढ़ने लगा। उसने कविता के ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोल दिए, जिससे उसके दूधिया सफेद तरबूज पूरी तरह आजाद हो गए। उन तरबूजों की गोलाई और उनके ऊपर के गुलाबी मटर इतने आकर्षक थे कि समीर खुद को रोक नहीं पाया और एक तरबूज को अपने मुँह में भर लिया। कविता ने समीर के बालों को अपनी उंगलियों में जकड़ लिया और जोर-जोर से सिसकारियां लेने लगी। ‘ओह जीजाजी… आप तो मुझे पागल कर देंगे… कितना सुख दे रहे हैं आप,’ कविता ने टूटते हुए स्वर में कहा, जो समीर के जुनून को और बढ़ा रहा था।
धीरे-धीरे समीर ने कविता की साड़ी और पेटीकोट भी उतार दिए, जिससे वह पूरी तरह कुदरती रूप में उसके सामने आ गई। कविता का पूरा बदन सोने की तरह दमक रहा था और उसकी टांगों के बीच की गहरी खाई काले रेशमी बालों से ढकी हुई थी। समीर ने अपनी उंगली उस खाई के मुहाने पर रखी, तो वह पूरी तरह गीली और चिपचिपी मिली, जो इस बात का सबूत थी कि कविता की खुदाई की इच्छा अब चरम पर है। समीर ने उस खाई को अपनी उंगली से खोदना शुरू किया, जिससे कविता अपनी कमर ऊपर उठाने लगी और बिस्तर की चादर को हाथों से भींचने लगी।
समीर ने अब अपने कपड़े उतार फेंके और उसका विशाल और फौलादी खीरा पूरी तरह तनकर खड़ा हो गया। जब कविता ने उस खीरे को देखा, तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गई और उसने धीरे से उस खीरे को अपने हाथ में पकड़ लिया। ‘जीजाजी, ये तो बहुत बड़ा और ताकतवर है, क्या मैं इसे चूस सकती हूँ?’ समीर ने बस सिर हिलाया और कविता ने उस खीरे को अपने मुँह में लेकर चूसना शुरू कर दिया। खीरे के चारों तरफ कविता की जीभ का जादू समीर को जन्नत का अहसास करा रहा था। कुछ देर बाद समीर ने उसे रोका और उसे बिस्तर पर चित लेटा दिया ताकि वह असली खुदाई शुरू कर सके।
समीर ने कविता की टांगों को फैलाया और अपने खीरे के अगले हिस्से को उसकी तंग और रसीली खाई के मुहाने पर टिका दिया। उसने एक गहरा धक्का दिया, तो आधा खीरा उस संकरी खाई के अंदर समा गया। कविता के मुँह से एक चीख निकली, ‘अह्ह्ह… जीजाजी… थोड़ा धीरे… बहुत तंग है आपकी ये साली।’ समीर ने उसे चूमकर शांत किया और फिर धीरे-धीरे सामने से खोदना शुरू किया। हर धक्के के साथ खीरा और गहराई तक खाई के अंदर उतर रहा था। कमरे में सिर्फ उनके शरीरों के टकराने की आवाज़ और कविता की आहें गूँज रही थीं। माहौल पूरी तरह से कामुक और उत्तेजक हो चुका था।
जैसे-जैसे खुदाई की रफ्तार बढ़ी, कविता का जोश भी दोगुना हो गया। उसने अपनी टांगें समीर की कमर के चारों तरफ लपेट लीं ताकि खीरा और अंदर तक जा सके। समीर अब पूरे जोर-शोर से खोद रहा था और कविता के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे। ‘हाँ जीजाजी… और तेज… आज अपनी इस साली की खाई को पूरा भर दीजिए… बहुत प्यासी हूँ मैं,’ कविता ने उत्तेजना में चिल्लाते हुए कहा। समीर ने उसे अब बिस्तर पर उल्टा लिटा दिया और पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। इस पोजीशन में खीरा खाई की गहराई को पूरी तरह नाप रहा था, जिससे कविता को असीम आनंद मिल रहा था।
खुदाई का यह सिलसिला काफी देर तक चलता रहा और दोनों पसीने से पूरी तरह नहा चुके थे। समीर का खीरा अब पूरी तरह से गर्म हो चुका था और उसे महसूस हुआ कि अब उसका रस छूटने वाला है। कविता भी अपनी चरम सीमा के करीब थी और उसकी खाई के अंदर की दीवारें समीर के खीरे को कसकर जकड़ रही थीं। ‘जीजाजी… मेरा रस निकलने वाला है… मुझे छोड़ना मत…’ कविता ने जोर-जोर से कांपते हुए कहा। समीर ने आखिरी कुछ जोरदार धक्के दिए और उसका सारा गरम रस कविता की खाई की गहराई में उड़ेल दिया। उसी वक्त कविता का भी रस छूट गया और वह समीर के नीचे पूरी तरह निढाल होकर गिर पड़ी।
खुदाई खत्म होने के बाद दोनों एक-दूसरे की बाँहों में लिपटे हुए भारी सांसें ले रहे थे। कमरे में एक अजीब सी संतुष्टि और शांति छाई हुई थी। कविता का चेहरा गुलाबी हो गया था और उसके चेहरे पर एक गहरी तृप्ति की मुस्कान थी। उसने समीर के सीने पर अपना सिर रखा और धीरे से बोली, ‘जीजाजी, आज आपने मुझे वो सुख दिया है जो मुझे पहले कभी नहीं मिला। मैं आपकी हमेशा ऋणी रहूंगी।’ समीर ने उसके माथे को चूमा और उसे अपनी बाँहों में और कस लिया। वह जानते थे कि यह एक ऐसी दोपहर थी जिसे वे चाहकर भी कभी भूल नहीं पाएंगे और यह रिश्ता अब एक नई गहराई तक पहुँच चुका था।