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गांव में हुई घमासान चु@@ई

एक छोटे से उत्तर भारतीय गाँव की कहानी है, जहाँ सुबह की किरणें सरसों के खेतों पर सुनहरी चमक बिखेरतीं और शाम की हवा में मिट्टी की सोंधी महक और चूल्हों से उठते धुएँ की खुशबू घुली रहती, वहाँ एक पुरानी ईंटों की हवेली में रहती थीं शीला, उम्र में अड़तीस साल की एक विधवा – गोरी त्वचा वाली जो धूप में भी चमकती रहती, कद मध्यम लेकिन शरीर वक्राकार और इतना आकर्षक कि दूर से देखने वाले की सांस रुक जाती, तरबूज जैसे बड़े-बड़े आम जो साड़ी के ब्लाउज में मुश्किल से छिपते और हर सांस के साथ हल्के से ऊपर-नीचे होकर किसी की नजरें बांध लेते, अंगूर छोटे लेकिन बहुत मीठे और संवेदनशील जो छूने भर से सख्त हो जाते और ब्लाउज के कपड़े पर उभार बना देते, कमर पतली जो पिछवाड़े की गोलाई को और उभार देती, पिछवाड़ा भारी और गोल-मटोल जो साड़ी के नीचे से भी अपनी मजबूत उपस्थिति महसूस कराता, बाल लंबे घने काले जो कमर तक लहराते और जब बंधे होते तो गर्दन पर गिरकर एक अलग ही मोह पैदा करते, चूड़ियाँ चांदी की पतली जो हर छोटी हलचल पर झनकार मारतीं और आँखें गहरी काली जिनमें एक गहन उदासी और छिपी हुई भूख हमेशा तैरती रहती, उनका पति चार साल पहले बीमारी से गुजर चुका था, अब शीला अकेली घर संभालती, खेतों में हल्का काम करती और रातें बिस्तर पर लेटकर करवटें बदलतीं जब शरीर में एक अजीब सी जलन उठती जो नींद चुरा लेती।

पास की एक छोटी झोपड़ी में रहता था उसका देवर, नाम था विजय, उम्र तीस साल की – कद लंबा और कंधे चौड़े, खेती-बाड़ी से शरीर इतना मजबूत और मांसल कि देखने वाले को लगता जैसे कोई योद्धा हो, त्वचा साँवली लेकिन चमकदार जो पसीने से और चमक उठती, मूंछें घनी काली जो चेहरे को और तेज बनातीं, आँखें तेज और गहरी जो किसी को देखकर दिल में हलचल मचा देतीं, उसका केला लंबा मोटा और बहुत सख्त जैसे कोई ताजा मजबूत गाजर जो दिन की थकान के बाद भी रात में अचानक तैयार हो जाता और कपड़ों में उभार बना देता, वह अविवाहित था लेकिन गाँव की औरतों पर नजर रखता, खासकर भाभी शीला पर जिनकी सादगी और शरीर की हर वक्र उन्हें रातों को सपनों में लाती, वह बहाने से रोज उनके घर आता, कभी पानी माँगता, कभी बातें करने बैठ जाता, मन में एक गहरा आकर्षण पनप रहा था जो उसे खुद पर काबू रखने नहीं देता लेकिन शुरू में वह झिझकता कि यह रिश्ता क्या कहलाएगा।

शीला की करीबी सहेली थीं नीता, उम्र सैंतीस साल की, पड़ोस की झोपड़ी में रहती – काठी लचीली और बहुत आकर्षक, त्वचा गेहुंआ लेकिन इतनी मुलायम कि छूने से लगे जैसे रेशम हो, संतरे जैसे गोल और रसीले आम जो साड़ी में उभरे रहते और हंसते वक्त हिलकर किसी का मन मोह लेते, खाई गहरी और हमेशा हल्की नम जो स्पर्श में एक मीठी गर्माहट देती, झाड़ी हल्की लेकिन घनी हरियाली वाली जो आकर्षण बढ़ाती, चूड़ियाँ सोने की भारी जो हर कदम पर खनकतीं और आँखें शरारत से भरी लेकिन गहरी जिनमें एक छिपी हुई इच्छा हमेशा झलकती, नीता का पति शहर में मजदूरी करता था और महीनों घर नहीं आता, वह शीला से रोज मिलती और गुप्त बातें साझा करती, उसके मन में विजय की मजबूत काठी और गहरी आवाज के प्रति एक छिपा आकर्षण था जो धीरे-धीरे बाहर आने को तैयार था लेकिन शुरू में वह खुद को रोकती कि यह दोस्ती में बाधा न बन जाए।

एक शाम गाँव की पगडंडी पर, जहाँ सूरज ढलते हुए आसमान को नारंगी रंग दे रहा था और हवा में सरसों के फूलों की हल्की महक फैली हुई थी, शीला बाजार से लौट रही थीं, हाथ में सब्जियों का थैला, साड़ी हल्की लहरा रही थी, तरबूज उभरे हुए और चूड़ियाँ खनक रही थीं जो दूर से ही ध्यान खींच रही थीं, विजय खेत से लौट रहा था, पसीने से तर-बतर, शीला को देखकर वह ठिठक गया और पास आया, “भाभी, इतनी शाम को अकेली, थैला दे दो मैं ले चलूँ,” उसकी आवाज में चिंता थी लेकिन आँखें शीला के आम पर टिकीं जो साड़ी से झलक रहे थे, शीला ने सिर झुकाकर कहा, “नहीं देवर जी, मैं ले लूँगी,” लेकिन नजरें मिलीं और उस पल में दोनों के दिल में एक चिंगारी सी जली जो सांसें तेज कर गई, विजय ने थैला ले लिया, हाथ लगते ही स्पर्श में एक गर्म करंट दौड़ा जो शीला को अंदर तक झकझोर गया, विजय की सांसें भी तेज हो गईं, वह सोच रहा था कि भाभी की गंध इतनी मीठी और मादक क्यों लग रही है जैसे कोई ताजा फल हो, वे साथ चलते रहे, बातें हल्की-फुल्की लेकिन मन में एक नई हलचल शुरू हो गई जो शाम को घर लौटने के बाद भी नहीं थमी, शीला रात को बिस्तर पर लेटीं तो वह स्पर्श बार-बार याद आया और शरीर में एक अजीब सी सिहरन दौड़ी जो खाई में हल्की नमी पैदा कर गई।

अगले दिन दोपहर खेतों में, जहाँ सूरज की तेज किरणें पसीना बहा रही थीं और हवा में मिट्टी और हरी फसलों की ताजगी फैली हुई थी, शीला फसल की सिंचाई कर रही थीं, साड़ी के पल्लू से पसीना पोंछते हुए, ब्लाउज भीगा हुआ और तरबूज की आकृति साफ झलक रही थी जो पसीने से चमक रहे थे, विजय पास के खेत से आया, पानी का बहाना बनाकर, “भाभी, इतनी गर्मी में अकेली काम कर रही हो, मैं मदद कर दूँ,” शीला ने मुस्कुराकर मना किया लेकिन विजय ने जिद की और उनके बगल में खड़ा हो गया, पानी छिड़कते वक्त उनके हाथ आपस में टकराए, उंगलियाँ फिसलीं और स्पर्श इतना गहरा था कि शीला की सांस रुक गई, विजय की आँखें उनके आम पर टिकीं जो पसीने से गीले होकर और उभर आए थे, “भाभी, आप थक गई होंगी, पानी पी लो,” विजय ने धीरे कहा और अपना पानी का लोटा शीला को दिया, शीला ने पिया लेकिन मन में उलझन थी कि यह निकटता क्यों इतनी मीठी लग रही है, वे खुद को रोकना चाहती थीं लेकिन आकर्षण इतना मजबूत था कि वे थोड़ी देर रुक गईं, छांव में बैठकर बातें कीं जिसमें विजय की मजबूत बाहें और गहरी आवाज शीला को अंदर तक छू गई, शाम तक दोनों के मन में वह स्पर्श और बातें घूमती रहीं, शीला रात को अकेली लेटीं तो शरीर में बेचैनी बढ़ गई और उंगलियाँ अनायास खाई की ओर गईं।

नीता शाम को शीला के घर आई, आंगन में दोनों बैठीं, हवा में चूल्हे की लकड़ी की महक और चाय की खुशबू फैली हुई थी, नीता ने कहा, “शीला, आज खेत में विजय भैया के साथ क्या हो रहा था, मैंने दूर से देखा,” शीला शरमा गईं, “कुछ नहीं, बस मदद कर रहे थे,” लेकिन नीता की आँखों में शरारत थी, वह जानती थी कि शीला के मन में कुछ उमड़ रहा है, “वो नजरें तो कुछ और कह रही थीं, तू अकेली बहुत है, कभी दिल को आराम दे,” नीता ने फुसफुसाया और अपना हाथ शीला के कंधे पर रख दिया, स्पर्श नरम लेकिन इतना गर्म कि शीला की सांसें तेज हो गईं, नीता की उंगलियाँ धीरे से तरबूज की ओर बढ़ीं और हल्का दबाव दिया, शीला ने रोका नहीं बल्कि आँखें बंद कर लीं, दोनों चुप रहीं लेकिन वह स्पर्श में एक गहराई आ गई जो शीला को जज्बातों की उलझन में डाल गई, नीता चली गई तो शीला देर तक सोचती रहीं कि यह क्या हो रहा है, अनिच्छा थी लेकिन आकर्षण बढ़ता जा रहा था जैसे कोई नदी का बहाव हो।

कुछ दिन बाद रात को तेज बारिश हो रही थी, गाँव की सड़कें कीचड़ से भरीं और हवा में ठंडी बूंदों की महक फैली हुई थी, शीला अकेली बिस्तर पर लेटी थीं, खिड़की से पानी की सरसराहट आ रही थी और मोमबत्ती की टिमटिमाती रोशनी कमरे में फैली हुई थी, उनका मन उदास था और शरीर में जलन थी, तभी दरवाजे पर दस्तक हुई, विजय था, पूरी तरह भीगा हुआ, “भाभी, बाहर तूफान है, रुक सकता हूँ?” शीला ने झिझकते हुए अंदर बुलाया, दोनों बैठे, गर्म चाय पीते हुए बातें शुरू हुईं – जीवन की कठिनाइयों की, अकेलेपन की दर्द की, विजय ने कहा, “भाभी, आप इतनी मजबूत हो लेकिन अकेली क्यों रहती हो, मैं हूँ ना,” शीला की आँखें नम हो गईं, “देवर जी, समाज क्या कहेगा,” लेकिन विजय का हाथ अनायास शीला के हाथ पर गया, स्पर्श में करंट सा दौड़ा जो दोनों को झकझोर गया, शीला की सांसें तेज हो गईं, विजय ने धीरे से शीला के गाल को छुआ और रस चूसना शुरू किया – होंठ हल्के से मिले, धीरे-धीरे गहरा हुआ जैसे कोई मीठे फल का रस चूस रहे हों, जीभ मिली और स्वाद इतना मीठा कि शीला कराही हल्की, उनकी चूड़ियाँ झनझना रही थीं, विजय की उंगलियाँ शीला के तरबूज पर फिसलीं और दबाव दिया तो अंगूर सख्त हो गए, शीला ने फुसफुसाया, “देवर जी, यह गलत है,” लेकिन शरीर जवाब दे रहा था और अनिच्छा के बावजूद आकर्षण इतना गहरा था कि वे रुक नहीं पाईं, गंध पसीने और बारिश की मिश्रित कमरे में फैल गई।

धीरे-धीरे निकटता बढ़ी, कमरे में मोमबत्ती की रोशनी टिमटिमा रही थी और बाहर बारिश की ध्वनियाँ गूंज रही थीं, विजय ने शीला की साड़ी का पल्लू सरकाया, तरबूज पूरी तरह उजागर हो गए, विजय की उंगलियाँ अंगूर पर फिसलीं और रस चूसना शुरू किया जैसे कोई छोटे मीठे फल को मुंह में लेकर चूस रहे हों, शीला की कराहें दबी हुईं लेकिन सांसें तेज, विजय का केला सख्त हो गया, लंबा और मोटा जैसे कोई मजबूत फल तैयार हो, शीला की उंगलियाँ विजय के केले पर गईं और दबाया, विजय कराहा, फिर शीला की साड़ी पूरी तरह सरका दी, खाई गहरी और रसीली दिख रही थी चारों तरफ झाड़ी हल्की हरियाली वाली, विजय ने उंगलियाँ खाई में डालीं और धीरे-धीरे घुमाया, शीला की चूड़ियाँ खनक रही थीं और शरीर कांप रहा था, “भाभी, मैं रुक नहीं पा रहा,” विजय ने कहा और अपना केला शीला की खाई के मुहाने पर रखा, धीरे से खुदाई शुरू हुई – बहुत धीमी गति से, गहराई में लगाते हुए, पहले आधा केला अंदर, फिर पूरा, शीला की कराह ऊँची हो गई लेकिन बारिश की आवाज में दब गई, पोजीशन पहले विजय ऊपर, शीला नीचे लेटी हुई, खुदाई गहन हो गई जैसे फल को पूरी गहराई में लगाना हो, रस निकलने की तैयारी में शरीर मिल गए।

नीता अगले दिन शाम को आई और शीला ने सब बता दिया, नीता की आँखें चमक उठीं, “मैं भी शामिल हो सकती हूँ?” शीला शरमा गईं लेकिन मन में सहमति थी, रात को तीनों मिले, कमरे में अगरबत्ती की महक और मोमबत्ती की रोशनी, विजय ने शीला को बाहों में लिया, रस चूसना गहन हुआ, नीता ने शीला के पिछवाड़े को दबाया और उंगलियाँ खाई में डालीं, विजय का केला शीला की खाई में धीरे घुसा – खुदाई शुरू, धीमी लेकिन बहुत गहरी, नीता नीचे से शीला के अंगूर चूस रही थी, शीला की चूड़ियाँ खनक रही थीं और कराहें कमरे में गूंज रही थीं, पोजीशन बदली – शीला ऊपर सवार होकर, विजय नीचे, खुदाई तेज हुई जैसे फल को पूरी ताकत से गहराई में लगाना, नीता के संतरे विजय के मुंह में, रस निकलने की क्रिया हुई एक साथ जैसे कई फल पककर रस छोड़ दें, सांसें तेज, गंध पसीने और अगरबत्ती की मिश्रित, तीनों थककर लेट गए लेकिन जज्बात और गहरे हो गए।

इसके बाद हर रात मिलन होने लगा, कभी विजय और शीला अकेले खुदाई गहन करते, विभिन्न पोजीशन में – कभी खड़े होकर पिछवाड़े से, खुदाई गहरी और तेज, कभी लेटकर बगल से, केला पूरी गहराई तक लगाते हुए, रस निकलना बार-बार, कभी नीता शामिल होकर तीनों क्रॉस खुदाई करते, नीता की खाई में विजय का केला, शीला नीता के आम चूसती, ध्वनियाँ कराहों और चूड़ियों की झनकार से भरी, पर्यावरण में रात की ठंडी हवा और बारिश की बूंदें जो खिड़की से आतीं, भावनाएँ उलझीं लेकिन अनिच्छा कम हो गई, आकर्षण इतना मजबूत कि कोई रोक नहीं पाता, गाँव बाहर से शांत रहा लेकिन हवेली की दीवारें उन गुप्त रातों की गवाह बनीं जहाँ स्पर्श, गंध, ध्वनियाँ और रस निकलना एक साथ चलता रहा, रिश्ते गहरे हो गए और यह राज हमेशा छिपा रहा क्योंकि ऐसे गाँवों में कुछ बातें कभी बाहर नहीं आतीं।

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