
रितु भाभी हमारे पड़ोस में रहती थीं और उनके पति अक्सर काम के सिलसिले में शहर से बाहर रहा करते थे। भाभी का व्यक्तित्व जितना सौम्य था, उनका शरीर उतना ही कामुक और भरा हुआ था। जब भी वह छत पर कपड़े सुखाने आती थीं, तो उनके रेशमी ब्लाउज के भीतर कैद उनके भारी और गोल-गोल तरबूज मेरी आँखों को अपनी ओर खींच लेते थे। उनके चलने के अंदाज में एक ऐसी लचक थी कि उनके पीछे का उभरा हुआ भारी पिछवाड़ा हर कदम पर एक अलग ही धुन छेड़ता नजर आता था। मैं कॉलेज से लौटते समय अक्सर उन्हें खिड़की से देखता रहता था और उनके उस सुडौल शरीर की कल्पनाओं में खोया रहता था।
एक दोपहर जब पूरा मोहल्ला सो रहा था, भाभी ने मुझे अपने घर कुछ भारी सामान खिसकाने के लिए बुलाया। जैसे ही मैं उनके घर में दाखिल हुआ, कमरे के सन्नाटे में उनकी सांसों की हल्की आवाज भी सुनाई दे रही थी। उन्होंने एक ढीली नाइटी पहनी हुई थी, जिसमें से उनके विशाल तरबूज साफ तौर पर अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे। जब मैं अलमारी खिसका रहा था, तो अचानक मेरा हाथ उनके हाथ से छू गया। उस एक स्पर्श ने मेरे शरीर में बिजली की लहर दौड़ा दी। मैंने देखा कि भाभी की आँखों में भी एक अजीब सी चमक और चेहरे पर हल्की लाली छा गई थी, जैसे वह भी इसी पल का इंतजार कर रही हों।
हम दोनों के बीच की झिझक अब धीरे-धीरे कम होने लगी थी और सन्नाटे को हमारी तेज होती धड़कनों ने भर दिया था। मैंने हिम्मत जुटाकर अपना हाथ उनकी कमर पर रखा और उन्हें अपनी ओर खींचा। भाभी ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि अपनी आँखें मूंद लीं और अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया। उनके शरीर की खुशबू मुझे और भी बावरा बना रही थी। मैंने धीरे से अपना हाथ ऊपर उठाया और उनके उन नरम तरबूजों को सहलाना शुरू किया। जैसे ही मेरी उँगलियों ने उनके तरबूजों के ऊपर के नन्हे और सख्त मटर को छुआ, उनके मुँह से एक मदहोश कर देने वाली आह निकल गई जिसने कमरे की शांति को भंग कर दिया।
अब संयम का बांध टूट चुका था। मैंने उन्हें बाहों में भरकर उनके होठों का रस पीना शुरू किया। हमारी सांसें एक-दूसरे में समा रही थीं। धीरे-धीरे हम बिस्तर की ओर बढ़े, जहाँ भाभी ने अपनी नाइटी उतार दी और उनका पूरा कुंवारा बदन मेरे सामने था। उनकी गहरी खाई के ऊपर के काले बाल और उनके उभार देख मेरा खीरा अपनी पूरी ताकत के साथ अकड़ गया था। मैंने उनके पैरों के बीच बैठ कर उनकी उस रेशमी खाई को निहारना शुरू किया। मेरी उंगलियां धीरे-धीरे उनकी खाई की गहराई को नाप रही थीं और भाभी बिस्तर की चादरों को अपनी मुट्ठी में भींच रही थीं।
भाभी ने धीरे से मेरे कपड़ों को हटाया और जब मेरा कठोर खीरा उनके सामने आया, तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गई। उन्होंने बहुत प्यार से मेरे खीरे को अपने हाथों में लिया और उसे सहलाने लगीं। कुछ ही पलों में उन्होंने अपना मुँह खोला और मेरे खीरे को चूसना शुरू कर दिया। उनके मुँह की गरमाहट और उनकी जीभ का जादू मेरे पूरे शरीर को कपा रहा था। वह कभी धीरे-धीरे तो कभी तेजी से खीरा मुँह में ले रही थीं, जिससे मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरा सारा रस अभी निकल जाएगा। मैंने उनके बालों को पकड़कर उन्हें और भी गहराई से खीरा चूसने के लिए प्रेरित किया।
अब खुदाई का असली समय आ चुका था। मैंने भाभी को सीधा लिटाया और उनकी टांगों को कंधों पर रख लिया। मेरी आँखों में वासना और प्यार का मेल था। मैंने अपने खीरे की नोक को उनकी गीली और तंग खाई के दरवाजे पर रखा। जैसे ही मैंने धीरे से पहला धक्का मारा, भाभी की एक तीखी कराह निकली और उन्होंने मुझे मजबूती से पकड़ लिया। मैंने धीरे-धीरे पूरा खीरा उनकी खाई के अंदर उतार दिया। वह लम्हा इतना सुखद था कि हम दोनों ही कुछ पलों के लिए थम गए। फिर मैंने सामने से खोदना शुरू किया। हर धक्के के साथ मेरे अंडकोष उनके पिछवाड़े से टकरा रहे थे और एक मीठी आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी।
भाभी बार-बार कह रही थीं, ‘विवेक, और जोर से खोदो, आज मुझे पूरी तरह अपनी बना लो।’ उनकी इन बातों ने मेरी गति और भी बढ़ा दी। थोड़ी देर बाद मैंने उन्हें घुमाया और उन्हें बिस्तर पर घुटनों के बल खड़ा कर दिया। पीछे से देखने पर उनके पिछवाड़े का नजारा किसी जन्नत से कम नहीं था। मैंने पीछे से खोदना शुरू किया, तो वह घोड़ी की तरह हिचकोले खाने लगीं। मेरे हर धक्के के साथ उनके तरबूज आगे-पीछे झूल रहे थे। खुदाई इतनी गहरी और दमदार थी कि भाभी की आँखों से खुशी के आंसू झलक आए थे। हम दोनों पसीने से तर-बतर थे, लेकिन हमारी प्यास बुझने का नाम नहीं ले रही थी।
अंत में, जब हम दोनों अपनी चरम सीमा पर थे, मैंने अपनी गति को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया। भाभी भी नीचे से अपनी कमर को उछाल-उछाल कर मेरा साथ दे रही थीं। अचानक, उनकी खाई के भीतर एक जबरदस्त कंपन हुआ और उनका रस छूटने लगा। उसी पल, मेरे खीरे ने भी अपनी सारी गरमाहट और रस उनकी खाई की गहराइयों में उडेल दिया। हम दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए बिस्तर पर गिर पड़े। हमारी सांसें अभी भी तेज थीं और जिस्म एक-दूसरे की खुशबू में डूबे हुए थे। रितु भाभी के चेहरे पर जो संतुष्टि थी, उसने मुझे अहसास कराया कि यह खुदाई सिर्फ जिस्मानी नहीं, बल्कि रूहानी भी थी।