दिन की तेज धूप पड़ रही थी, और हम ननिहाल जाते हुए थककर एक छोटे से खेत के किनारे रुक गए थे। दूर एक बेर का पेड़ दिखा, लाल-लाल बेर झुंड में लटके हुए, जैसे कोई मीठा लालच दे रहा हो। मा ने साड़ी का पल्लू सर पर ठीक करते हुए कहा, “बेटा, देख कितने अच्छे बेर लगे हैं। चढ़ जा, तोड़ लाओ कुछ। रास्ते में खा लेंगे, प्यास भी लगी है।”
मुझे लगा आसपास कोई नहीं दिख रहा। खेत सुनसान था, सिर्फ हवा में सरसों के पौधों की सरसराहट। मैंने जूते उतारे, पेड़ पर चढ़ गया। शाखाएं मजबूत थीं, जल्दी ही मैं ऊपर पहुंच गया। नीचे मा खड़ी थीं, हाथों से छांव बनाकर मुझे देख रही थीं। मैं बेर चुन-चुनकर तोड़ रहा था, नीचे फेंक रहा था। मा उन्हें साड़ी के पल्लू में इकट्ठा कर रही थीं, मुस्कुरा रही थीं।
तभी अचानक नीचे से एक गहरी, मोटी आवाज गूंजी, “अरे कौन है वहां? चोरी कर रहे हो?” मैंने नीचे देखा – एक हट्टा-कट्टा आदमी खड़ा था। उम्र चालीस के आसपास, चौड़ा सीना, मोटी बाहें, दाढ़ी में सफेद बाल, लेकिन आंखें तेज। वो खेत का मालिक लग रहा था। उसकी कमीज पसीने से भीगी हुई थी, जैसे अभी-अभी खेत में काम करके आया हो। “ये मेरा खेत है! उतर नीचे!”
मैं घबरा गया। पैर कांपने लगे। धीरे-धीरे नीचे उतरा। पैर जमीन पर लगते ही उसने मेरी कलाई पकड़ ली। उसकी उंगलियां लोहे जैसी मजबूत थीं। “चल, सजा मिलेगी।” मा डर गईं, आगे बढ़ीं, “मालिक जी, माफ कर दो… बस दो-चार बेर… बच्चा है मेरा।” मालिक ने मा की तरफ देखा। उसकी नजर मा के चेहरे पर ठहरी, फिर नीचे साड़ी पर, जहां स्त@#@ हल्के से उठ-गिर रहे थे सांसों के साथ। उसकी आंखों में गुस्सा कम हुआ, जगह ले ली एक अजीब सी चमक ने। “बच्चे की चोरी की सजा बच्चे को नहीं, मां को मिलनी चाहिए।”
मा कांप उठीं। “नहीं… ऐसा मत कहो…” लेकिन मालिक ने मेरी कलाई छोड़ दी और मा का हाथ पकड़ लिया। “चुप। चलो अंदर।” वो हमें खेत के पीछे वाले छोटे झोपड़े में ले गया। अंदर हल्की रोशनी, एक पुरानी चारपाई, हवा में मिट्टी और घास की महक। दरवाजा बंद करते ही मालिक ने मा को दीवार से सटा दिया। मा की सांसें तेज हो गईं, आंखें नम।
मैं एक कोने में खड़ा था, डर से पसीना छूट रहा था। मालिक ने मा के गाल पर हाथ फेरा, धीरे से। “डरो मत। सजा प्यार से दूंगा।” फिर उसने मा के होंठों पर चु@#@न शुरू कर दिया। मा ने पहले विरोध किया, हाथ आगे किए, लेकिन धीरे-धीरे उनके हाथ नीचे गिर गए। मालिक के होंठ गर्म थे, मजबूत। मा की आंखें बंद हो गईं, एक हल्की आह निकली। मैं देखता रहा, मन में तूफान – ये क्या हो रहा है मेरी मा के साथ?
मालिक ने मा की साड़ी का पल्लू सरका दिया। मा के स्त@#@ बाहर आए – बड़े, नरम, नि@#@ल सख्त हो चुके थे। मालिक ने एक स्त@#@ हाथ में लिया, सहलाया, फिर नि@#@ल मुंह में ले लिया। मा की कराह निकल गई, “अह्ह… नहीं…” लेकिन शरीर झुक गया उसके आगे। मालिक की जीभ नि@#@ल पर घूम रही थी, चूस रही थी। मा का शरीर सिहर रहा था, पसीना गर्दन पर बह रहा था।
फिर मालिक ने मा को चारपाई पर लिटा दिया। साड़ी पूरी ऊपर कर दी। मा की चू@#@त दिखी – गीली, तैयार। मालिक ने अपनी कमीज उतारी, पैंट खोली। उसका ल@#ंड बाहर आया – मोटा, लंबा, नसें उभरी हुईं, कड़ा। मैं शर्म से आंखें मोड़ लेना चाहता था, लेकिन देखता रहा। मालिक ने ल@#ंड मा की चू@#@त पर रखा, धीरे से अंदर डाला। मा ने जोर की आह भरी, “आह… धीरे…” मालिक ने सामने से चु@#@ई शुरू की। हर धक्के पर मा का शरीर हिल रहा था, स्त@#@ उछल रहे थे। मा की कराहें अब दर्द से ज्यादा मजा लेने वाली हो गईं – “अह्ह… मालिक…”
मैं देखते-देखते खुद को रोक नहीं पाया। मेरा ल@#ंड पैंट के अंदर कड़ा हो गया था, बहुत ज्यादा। मैंने हाथ पैंट के ऊपर से रखकर धीरे-धीरे सहलाना शुरू कर दिया। मा की नजर अचानक मेरी तरफ पड़ी। वो देख रही थीं कि मैं अपनी मा की चु@#@ई देखकर ल@#ंड सहला रहा हूं। उनकी आंखों में शर्म, आश्चर्य और एक अजीब सी चमक आई। लेकिन मालिक ने मुझे देख लिया। उसने जोर से कहा, “साले, तू जा बाहर! यहां क्या कर रहा है? बाहर जा!”
मैं घबरा गया। दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया। लेकिन दिल नहीं माना। झोपड़ी के एक कोने में छोटा सा छेद था, पुरानी लकड़ी में। मैंने उस छेद से अंदर झांका। मालिक अब मा को पूरी तरह पलट चुका था। मा का ग@#@ड ऊंचा था, मालिक का ल@#ंड ग@#@ड में धीरे-धीरे घुस रहा था। मा की कराहें अब जोरों की – “आह… मालिक… जोर से…” मालिक पीछे से धक्के दे रहा था, उसके मजबूत हाथ मा के स्त@#@ पकड़े हुए थे।
मैं छेद से सब देख रहा था। दृश्य इतना तीव्र था कि मेरा ल@#ंड अब पैंट में फटने को था। मैंने पैंट का बटन खोला, ल@#ंड बाहर निकाला। हाथ से पकड़कर धीरे-धीरे ऊपर-नीचे करने लगा। अंदर मा की चू@#@त और ग@#@ड मालिक के ल@#ंड से भर गए थे। मालिक की गति तेज हो गई थी, हर धक्के पर मा का शरीर आगे-पीछे हो रहा था। मा की कराहें अब पूरी तरह इच्छा से भरी हुईं – “अह्ह… हां… ऐसे ही…”
मेरा हाथ तेज हो गया। मा की वो हालत देखकर मेरा शरीर कांप रहा था। पसीना मेरी पीठ पर बह रहा था। अंदर मालिक ने जोर का धक्का दिया, “आह… रस निकल रहा है…” मा भी कांप उठीं, उनकी चू@#@त से रस छूटा। ठीक उसी पल मेरे ल@#ंड से भी रस निकल गया। मैंने मुट्ठी मारी, और गर्म रस मेरे हाथ पर छूट गया। मैं कांपते हुए दीवार से टिक गया।
अंदर सब शांत हो चुका था। मा धीरे से उठीं, साड़ी संवारी। उनकी आंखें थकी हुई थीं, लेकिन चेहरे पर एक अजीब सी शांति। मालिक ने कपड़े ठीक किए। मैं जल्दी से ल@#ंड अंदर किया, पैंट ठीक की। दरवाजा खुला। मालिक बाहर निकला, “अब सजा पूरी। अगली बार बेर तोड़ने आएगा तो पहले पूछ लेना।”
मा बाहर आईं। उनकी नजर मेरी तरफ पड़ी, लेकिन कुछ नहीं कहा। बस हाथ पकड़कर चल पड़ीं। मैं चुपचाप उनके पीछे-पीछे। बाहर धूप अभी भी तेज थी, लेकिन मेरे अंदर सब कुछ बदल गया था। बेर तोड़ने गए थे, लेकिन जो टूटा, वो कुछ और था – कुछ ऐसा जो सालों तक याद रहेगा।