गांव के किनारे पर पेट्रोल पंप था, जहाँ दिनभर ट्रकों की आवाज़ गूंजती और शाम ढलते ही जगह सुनसान हो जाती। पंप के ठीक पीछे फैला हुआ खेत था – ऊँची-ऊँची सरसों की फसलें, जो हवा में हल्की सरसराहट करतीं और शाम की ठंडी हवा में मिट्टी की सोंधी महक फैलातीं। सूरज डूब रहा था, आसमान नारंगी-गुलाबी हो चुका था, और हवा में ठंडक घुलने लगी थी। पेट्रोल पंप बंद हो चुका था, लेकिन पीछे के खेत में पाँच सेल्समैन इकट्ठे थे – राजू, सोनू, मंटू, विक्की और दीपक। सबकी उम्र २५ से ३५ के बीच, शरीर मेहनत से तना हुआ, त्वचा धूप से साँवली लेकिन चमकदार, मूंछें घनी, आँखें तेज। वे दिनभर गाँव-गाँव घूमकर सामान बेचते थे और शाम को यहीं बैठकर थकान मिटाते थे। आज बातें गर्म हो गईं।
सरिता खेत से लौट रही थीं – उम्र ३२ साल की, गोरी त्वचा वाली, कद मध्यम लेकिन शरीर इतना भरपूर और लुभावना कि साड़ी में हर वक्र साफ झलकता था। बड़े-बड़े रसीले आम जो ब्लाउज में समेटे नहीं समेटते और चलते वक्त हल्के से हिलते, छोटे मीठे अंगूर जो साड़ी के कपड़े पर हल्का उभार बना देते, कमर पतली, पिछवाड़ा गोल-मटोल और भारी जो साड़ी के नीचे से अपनी मौजूदगी जताता। बाल लंबे काले, चूड़ियाँ चांदी की पतली जो हर कदम पर खनकतीं। पति शहर में मजदूरी करता था, सरिता अकेली घर संभालती। आज शाम वह थकी हुई, पसीने से तर, साड़ी हल्की भीगी हुई थी।
सेल्समैनों की नजर उन पर पड़ी। राजू ने पहले आवाज़ दी, “अरे भाभी, इतनी शाम को अकेली कहाँ?” सरिता ने सिर झुका लिया, “घर जा रही हूँ।” सोनू ने हँसकर कहा, “थक गई लग रही हो, थोड़ा बैठ जाओ, पानी पी लो।” सरिता झिझकीं लेकिन थकान से घास पर बैठ गईं। बातें शुरू हुईं – फसल की, मौसम की, फिर धीरे-धीरे व्यक्तिगत। मंटू ने कहा, “भाभी, पति जी कब आएँगे?” सरिता ने शर्माकर कहा, “पता नहीं, महीनों हो गए।” विक्की ने नजरें मिलाकर कहा, “अकेली रहना मुश्किल होता है ना?” सरिता चुप रहीं लेकिन शरीर में सिहरन दौड़ गई।
धीरे-धीरे वे सरिता के करीब आ गए। राजू ने उनका हाथ पकड़ा, “भाभी, डरो मत, हम सब अच्छे आदमी हैं।” सरिता ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की लेकिन सोनू ने पीछे से पकड़ लिया। सरिता की सांसें तेज हो गईं, “छोड़ो… कोई देख लेगा।” लेकिन खेत सुनसान था, फसलें ऊँची थीं, कोई नहीं दिख रहा था। दीपक ने कहा, “यहाँ कोई नहीं आएगा, बस थोड़ा आराम कर लो।” सरिता की आँखें नम हो गईं लेकिन शरीर में एक अजीब सी गर्मी फैल रही थी।
राजू ने पहले सरिता की साड़ी का पल्लू सरकाया। बड़े रसीले आम उभर आए, ब्लाउज से बाहर झाँकते हुए। राजू ने दोनों हाथों से उन्हें दबाया, अंगूर पर उंगलियाँ फिसलाईं। सरिता कराही हल्की, “नहीं… प्लीज…” लेकिन आवाज़ में दर्द के साथ मजा भी था। सोनू ने पीछे से पिछवाड़ा दबाया, गोल-मटोल भारी हिस्सा हाथ में आया। सरिता का शरीर काँप रहा था। मंटू ने साड़ी पूरी ऊपर की, गहरी रसीली जगह दिखी, चारों तरफ हल्की हरियाली वाली झाड़ी। विक्की ने उंगलियाँ वहाँ फिसलाईं, सरिता की सांस रुक गई, “ओह… धीरे…”
राजू ने सरिता को घुटनों पर बिठाया। अपना केला निकाला – लंबा, मोटा, सख्त। सरिता की आँखें चौड़ी हो गईं। राजू ने केला उनके मुंह के पास रखा। सरिता ने झिझकते हुए रस चूसना शुरू किया – धीरे-धीरे, जीभ से लपेटते हुए, जैसे कोई मीठा फल हो। राजू कराहा, “आह… अच्छा लग रहा है भाभी…” सरिता की चूड़ियाँ खनक रही थीं, मुंह में गहराई तक ले रही थीं।
सोनू ने पीछे से सरिता का पिछवाड़ा फैलाया। अपना केला गोल-मटोल पिछवाड़े के मुहाने पर रखा। धीरे से धकेला – गहन खुदाई शुरू हुई, पिछवाड़े में गहराई में लगाते हुए। सरिता की कराह मुंह में दब गई, लेकिन शरीर काँप रहा था। दर्द और मजा मिश्रित – “आह… धीरे… बहुत गहरा…” सोनू ने लयबद्ध गति से आगे बढ़ाया, पिछवाड़ा हिल रहा था।
मंटू ने सरिता की गहरी रसीली खाई में अपना केला लगाया। सरिता अब तीन जगह से भरी हुई थीं – मुंह में राजू का केला, खाई में मंटू का, पिछवाड़े में सोनू का। विक्की ने सरिता के एक हाथ में अपना केला पकड़ा, दीपक ने दूसरे हाथ में। सरिता के दोनों हाथों में केले थे, धीरे-धीरे ऊपर-नीचे कर रही थीं। सरिता का शरीर पूरी तरह भर गया था – खाई में गहराई, पिछवाड़े में दबाव, मुंह में स्वाद, हाथों में स्पर्श।
खुदाई एक साथ चल रही थी – मुंह में राजू धीरे-धीरे गहराई तक, खाई में मंटू लयबद्ध धक्के दे रहा था, पिछवाड़े में सोनू गहन और तेज। सरिता की कराहें दबी हुईं लेकिन लगातार – “आह… ओह… बहुत… बहुत गहरा…” चूड़ियाँ खनक रही थीं, शरीर पसीने से तर, सांसें तेज। दर्द था लेकिन मजा इतना कि सरिता खुद को रोक नहीं पा रही थीं। रसीले आम हिल रहे थे, अंगूर सख्त हो चुके थे।
पोजीशन बदली – सरिता को घास पर लिटाया। राजू नीचे लेटा, सरिता ऊपर सवार हो गईं। राजू का केला खाई में पूरी गहराई तक। सोनू पीछे से पिछवाड़े में। मंटू ने मुंह में दिया। विक्की और दीपक ने हाथों में केले दिए। सरिता अब पूरी तरह पाँच जगह से घिरी हुई थीं। खुदाई जारी – ऊपर-नीचे, आगे-पीछे, मुंह में गहराई तक। सरिता की कराहें ऊँची हो गईं, “आह… नहीं… और… और गहरा…” शरीर काँप रहा था, रस निकलने की लहरें बार-बार उठ रही थीं।
फिर सबने बारी-बारी सरिता को अलग-अलग जगहों से लिया। कभी राजू खाई में, सोनू पिछवाड़े में, मंटू मुंह में। कभी विक्की खाई में, दीपक पिछवाड़े में। कभी तीन एक साथ – एक खाई में, एक पिछवाड़े में, एक मुंह में। हाथों में दो केले। सरिता का शरीर हर जगह से महसूस कर रहा था – खाई में गहराई, पिछवाड़े में दबाव, मुंह में स्वाद, हाथों में स्पर्श। दर्द था लेकिन मजा इतना कि सरिता खुद धक्के देने लगीं। रस निकलना बार-बार – सरिता का शरीर काँपता, रस छूटता, जैसे फल पककर रस छोड़ दे। सेल्समैन भी एक-एक करके रस निकाल रहे थे।
खुदाई लंबी चली – घंटों तक। पोजीशन बदलती रहीं – कभी सरिता घुटनों पर, कभी लेटी हुई, कभी सवार होकर। हर जगह से गहन स्पर्श, हर जगह से गहराई। सरिता की कराहें कभी दर्द की, कभी मजा की – “आह… बस… और नहीं… लेकिन… और…” चूड़ियाँ खनकती रहीं, सांसें तेज रहीं, गंध पसीने, मिट्टी और फसलों की मिश्रित। आखिरकार सब थक गए। सरिता घास पर लेटी रहीं, शरीर पसीने से तर, साड़ी बिखरी हुई, आँखें बंद। सेल्समैनों ने कपड़े ठीक किए। राजू ने कहा, “भाभी, कल फिर मिलेंगे?” सरिता ने शर्म से सिर हिलाया लेकिन मन में संतुष्टि थी।
वे सब चुपचाप उठे। सरिता घर लौटीं, लेकिन खेत की वह शाम उन्हें हमेशा याद रही – दर्द, मजा, शर्म, संतुष्टि सब मिश्रित। गाँव बाहर से शांत रहा लेकिन खेत की फसलें उस लंबी गहन शाम की गवाह बनीं।