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नेहा भाभी की चु@@ई


नेहा भाभी की चु@@ई —>

दोपहर की उस तपती हुई खामोशी में घर के भीतर एक अजीब सी बेचैनी तैर रही थी जो शब्दों से परे थी। नेहा भाभी, जिनकी उम्र लगभग २८ वर्ष थी, सोफे पर अधलेटी होकर कोई पुरानी मैगजीन पलट रही थीं, लेकिन उनकी नजरें शायद कहीं और ही खोई हुई थीं। उनकी देह की बनावट ऐसी थी कि कोई भी मर्द उन्हें देखते ही अपनी सुध-बुध खो बैठे, खासकर जब उनकी साड़ी का पल्लू बार-बार उनके कंधे से ढलक कर उनके भारी और रसीले तरबूजों की झलक दिखा देता था। उनके शरीर के उतार-चढ़ाव किसी ढलान वाली घाटी की तरह थे जो देखने वाले की धड़कनें बढ़ा देते थे। मैं कमरे के दूसरे कोने में बैठा पढ़ रहा था, लेकिन मेरी पूरी एकाग्रता उनके हिलते हुए पैरों और उनके मखमली बदन पर जमी हुई थी। उनके गोरे बदन पर पसीने की छोटी-छोटी बूंदें चमक रही थीं जो उनकी कामुकता में चार चाँद लगा रही थीं।

नेहा भाभी के तरबूज इतने उभरे हुए और पुष्ट थे कि उनकी चोली के बटन हमेशा तनाव में रहते थे, जैसे वे बस अभी आज़ाद होना चाहते हों। जब भी वह लंबी सांस लेतीं, उनके वे तरबूज ऊपर-नीचे होते और मुझे उनके भीतर छिपे उन नन्हे मटरों की याद दिलाते जो शायद इस वक्त ठंडक के लिए तड़प रहे होंगे। उनकी कमर पतली थी, लेकिन उनके कूल्हे या कहें कि उनका पिछवाड़ा इतना भरा हुआ और गोल था कि साड़ी के कपड़े में भी उसकी गोलाई साफ़ झलकती थी। उनकी त्वचा का रंग एकदम कंचन जैसा साफ था और उनके चेहरे पर एक ऐसी मासूमियत थी जो उनकी भीतरी दबी हुई आग को और भी गहरा बना देती थी। उनकी आँखों में एक अजीब सी प्यास थी जो शायद सालों से अधूरी थी और मैं अपनी तरुणाई के जोश में उस प्यास को अपनी आँखों से पढ़ पा रहा था।

हमारे बीच का रिश्ता वैसे तो देवर और भाभी का था, लेकिन पिछले कुछ हफ्तों से हम दोनों की नजरों में एक अलग ही खिंचाव महसूस होने लगा था। वह जब भी रसोई में काम करतीं, मैं किसी न किसी बहाने वहाँ पहुँच जाता और उनके करीब से गुजरते हुए उनके बदन की खुशबू को अपने भीतर उतार लेता। उनके शरीर से उठती वह चंदन और पसीने की मिली-जुली महक मेरे खीरे को तंग कर देती थी और मुझे अपनी पैंट में दबाव महसूस होने लगता था। नेहा भाभी भी शायद यह जानती थीं, तभी तो वह कभी-कभी जानबूझकर झुक जातीं जिससे उनके तरबूजों की गहरी दरार मुझे साफ़ दिखाई दे जाए। उस दिन दोपहर को घर में कोई नहीं था, सब किसी रिश्तेदार की शादी में गए थे और हम दोनों अकेले इस खामोश मकान में अपनी अपनी इच्छाओं से लड़ रहे थे।

अचानक नेहा भाभी ने मुझे पास बुलाया और कहा कि उनके पैर में कुछ मोच आ गई है, जरा तेल लगा दो। मैं जैसे इसी पल का इंतजार कर रहा था, मैं धीरे से उनके कदमों के पास जा बैठा। जैसे ही मेरा हाथ उनके नर्म तलवों और फिर उनकी पिंडलियों पर लगा, एक बिजली सी मेरे शरीर में दौड़ गई। मैंने देखा कि नेहा भाभी की सांसें तेज चलने लगी थीं और उनके तरबूज अब और भी तेजी से ऊपर-नीचे हो रहे थे। मेरा हाथ धीरे-धीरे ऊपर की ओर सरकने लगा, उनकी मखमली जांघों को छूते हुए मैं उनके रेशमी बालों के करीब पहुँचने लगा जो उनकी साड़ी के नीचे छिपे थे। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर ली थीं और उनके होंठों से एक हल्की सी आह निकली, जिसने मुझे और भी हिम्मत दे दी।

मेरी धड़कनें अब मेरे सीने को फाड़ने को बेताब थीं, मैंने हिम्मत करके अपना हाथ उनकी साड़ी के भीतर डाल दिया जहाँ उनकी गहरी और नम खाई मेरा इंतजार कर रही थी। जैसे ही मेरी उंगलियों ने उनकी खाई के किनारों को छुआ, वह सिहर उठीं और उन्होंने अपना हाथ मेरे सिर पर रख दिया। उनकी खाई इतनी मुलायम और गर्म थी जैसे कि कोई रेशमी मखमल का टुकड़ा हो। मैंने महसूस किया कि वह पहले से ही गीली हो चुकी थीं, उनकी खाई से रस रिस रहा था जो इस बात का सबूत था कि वह भी उतनी ही बेताब थीं जितना कि मैं। मैंने अपनी उंगली से खोदना शुरू किया, धीरे-धीरे उनकी गहराई को नापते हुए मैं उनकी आहों के सुर में सुर मिलाने लगा।

नेहा भाभी अब पूरी तरह से अपने होश खो चुकी थीं, उन्होंने मुझे अपनी ओर खींचा और मेरा मुँह अपने तरबूजों पर दबा दिया। मैंने पागलों की तरह उनके तरबूजों को सहलाना शुरू किया और उनके उन छोटे-छोटे मटरों को अपने दाँतों के बीच धीरे से दबाया। वह कराह उठीं और कहने लगीं, ‘ओह रोहन, अब और नहीं रहा जाता, मुझे अपनी प्यास बुझानी है।’ मैंने उनकी साड़ी और ब्लाउज को उतार कर एक तरफ फेंक दिया, अब वह कुदरत के उस सुंदर रूप में मेरे सामने थीं जिसका सपना मैंने हर रात देखा था। उनके बदन के बाल सोने की तरह चमक रहे थे और उनकी खाई अब पूरी तरह से मेरे सामने उजागर थी। मैंने अपना खीरा बाहर निकाला, जो अब पूरी तरह से तन चुका था और अपनी मंजिल पाने के लिए बेताब था।

मैंने सबसे पहले उनके चरणों से शुरुआत की और धीरे-धीरे ऊपर आते हुए उनकी खाई को चाटना शुरू किया। वह बिस्तर पर छटपटाने लगीं, उनकी हथेलियाँ चादर को कस कर जकड़ रही थीं। मेरी जीभ जब उनकी खाई के अंदरूनी हिस्सों को सहलाती, तो उनके मुँह से सिसकारियां निकलने लगतीं। वह बार-बार कह रही थीं, ‘रोहन, बस करो, अब अपना खीरा मेरे भीतर डाल दो, मैं फट रही हूँ।’ मैंने उनकी बात मानी और उन्हें सामने से खोदना शुरू किया। जैसे ही मेरा खीरा उनकी तंग खाई के भीतर गया, हमें दोनों को एक ऐसा अहसास हुआ जैसे कि पूरी दुनिया ठहर गई हो। वह काफी तंग थीं, लेकिन उनके भीतर का गीलापन मुझे गहराई तक समाने में मदद कर रहा था।

मैने अपनी गति बढ़ाई, हर धक्के के साथ नेहा भाभी का पिछवाड़ा उछल रहा था और उनके तरबूज बुरी तरह झूल रहे थे। कमरे में थप-थप की आवाजें गूँजने लगी थीं जो हमारी उस खुदाई की लय को और भी कामुक बना रही थीं। नेहा भाभी ने अपनी टांगें मेरी कमर पर लपेट लीं ताकि मैं और गहराई तक खोद सकूँ। वह बार-बार मेरे कानों में फुसफुसा रही थीं कि मैं उन्हें और जोर से खोदूँ। पसीने से लथपथ हमारे शरीर आपस में चिपक रहे थे और हर रगड़ एक नया रोमांच पैदा कर रही थी। मैंने उन्हें घुमाया और पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, यह स्थिति और भी उत्तेजक थी क्योंकि यहाँ से उनकी गोलाई और भी स्पष्ट थी।

अंततः, वह चरम सीमा आ ही गई जब हम दोनों की सहनशक्ति जवाब देने लगी। मेरी कमर में एक तेज मरोड़ उठी और मेरा सारा रस उनकी खाई की गहराइयों में छूटने लगा। नेहा भाभी ने भी मुझे कस कर पकड़ लिया और उनका भी रस निकलना शुरू हो गया। वह पूरी तरह से निढाल हो चुकी थीं और उनकी साँसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। हम दोनों उसी हालत में बिस्तर पर लेटे रहे, एक-दूसरे के जिस्म की गर्मी महसूस करते हुए। वह अनुभव इतना गहरा और भावुक था कि उस पल के बाद हमारे बीच का रिश्ता हमेशा के लिए बदल गया। नेहा भाभी की आँखों में अब एक संतुष्टि थी और मेरे मन में उनके प्रति एक नया सम्मान और प्रेम, जो इस शारीरिक मिलन से ही संभव हुआ था।

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