अजनबी हमसफर की ट्रेन में चु@@ई—>
रात के ग्यारह बज चुके थे और राजधानी एक्सप्रेस अपनी पूरी रफ़्तार से पटरियों पर दौड़ रही थी। समीर अपनी लोअर बर्थ पर बैठा हुआ खिड़की से बाहर अंधेरे को देख रहा था, लेकिन उसका ध्यान बाहर कम और अपने सामने वाली बर्थ पर बैठी महिला पर ज्यादा था। वह महिला, जिसका नाम उसने चार्ट में कविता पढ़ा था, लगभग पैंतीस साल की रही होगी। उसने गहरे नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी, जो उसके गोरे बदन पर बिजली की तरह चमक रही थी। समीर ने गौर किया कि कविता की साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसका हुआ था, जिससे उसके भारी और सुडौल तरबूज आधे से ज्यादा साफ नजर आ रहे थे। उन तरबूजों की गोलाई इतनी सम्मोहक थी कि समीर अपनी नजरें वहां से हटा ही नहीं पा रहा था। ट्रेन के हर झटके के साथ वे तरबूज हल्के से हिलते, जिससे समीर के मन में अजीब सी हलचल पैदा हो रही थी।
कविता का शरीर किसी तराशी हुई मूर्ति जैसा था। उसकी कमर पतली थी, लेकिन उसके कूल्हे काफी चौड़े और मांसल थे। जब वह अपनी जगह बदलने के लिए थोड़ा हिलती, तो उसके पिछवाड़े की बनावट साड़ी के महीन कपड़े के नीचे से साफ झलकती थी। समीर को महसूस हो रहा था कि उसकी पैंट के अंदर उसका खीरा अब धीरे-धीरे सिर उठा रहा है। कविता ने अपनी आँखें बंद की हुई थीं, जैसे वह सोने की कोशिश कर रही हो, लेकिन उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि वह भी जाग रही है। उसके चेहरे पर एक अजीब सी तड़प और उमस भरी गर्मी के निशान थे। समीर ने देखा कि पसीने की एक नन्ही सी बूंद उसकी गर्दन से फिसलती हुई नीचे उतरी और उसके तरबूजों के बीच बनी गहरी घाटी में समा गई। यह दृश्य इतना कामुक था कि समीर का गला सूखने लगा और उसकी धड़कनें तेज हो गईं।
कुछ देर बाद, कविता ने अपनी आँखें खोलीं और सीधे समीर की आँखों में देखा। समीर थोड़ा झेंप गया, लेकिन कविता की आँखों में कोई गुस्सा नहीं था, बल्कि एक अजीब सी पुकार थी। उसने मुस्कुराते हुए धीरे से कहा, ‘क्या आपको भी नींद नहीं आ रही है?’ उसकी आवाज में एक ऐसी मादकता थी कि समीर के शरीर में सिहरन दौड़ गई। समीर ने हकबकाते हुए जवाब दिया, ‘जी, बस इस सफर का मजा ले रहा हूँ।’ कविता थोड़ा करीब खिसक कर बैठी, जिससे उसके घुटने समीर के घुटनों से हल्के से टकराए। उस पहले स्पर्श ने जैसे समीर के शरीर में बिजली का करंट दौड़ दिया हो। कविता की रेशमी साड़ी का स्पर्श समीर की खाल पर बहुत गहरा असर कर रहा था। दोनों के बीच एक अनकहा आकर्षण जन्म ले चुका था और ट्रेन का वो छोटा सा केबिन अब एक अलग ही दुनिया बनता जा रहा था।
झिझक और मन के संघर्ष के बीच, समीर ने अपना हाथ धीरे से कविता के घुटने पर रखा। कविता रुकी नहीं, बल्कि उसने अपना हाथ समीर के हाथ पर रख दिया और उसे धीरे से सहलाने लगी। उसके हाथों की गर्मी समीर को मदहोश कर रही थी। कविता ने धीमी आवाज में कहा, ‘यहाँ बहुत गर्मी है, क्या तुम्हें नहीं लगता?’ उसने अपना पल्लू पूरी तरह से गिरा दिया, जिससे उसके सफ़ेद और बड़े तरबूज अब सिर्फ एक पतले ब्लाउज में कैद थे। उन तरबूजों के ऊपर उसके मटर जैसे उभरे हुए हिस्से ब्लाउज को चीर कर बाहर आने को बेताब लग रहे थे। समीर ने अब अपनी झिझक त्याग दी और अपना हाथ कविता की कमर पर ले गया। उसकी मुलायम त्वचा का अहसास होते ही समीर ने उसे अपनी ओर खींच लिया। कविता ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि वह समीर की बाहों में समा गई और उसके कंधे पर अपना सिर रख दिया।
समीर के हाथों ने अब कविता के उन भारी तरबूजों को सहलाना शुरू कर दिया। वह उन्हें अपनी हथेलियों में भरकर धीरे-धीरे दबाने लगा। कविता के मुँह से एक दबी हुई आह निकली और उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। समीर ने अपने अंगूठे से उन नन्हे मटरों को रगड़ना शुरू किया, जिससे कविता का पूरा बदन कांपने लगा। उसकी साँसें तेज हो गई थीं और वह समीर के कानों में अपनी गर्म आहें छोड़ रही थी। समीर ने अपना चेहरा कविता की गर्दन के पास ले जाकर उसकी खुशबू को महसूस किया। वह खुशबू और कविता की गर्मी मिलकर समीर के खीरे को पूरी तरह से पत्थर जैसा सख्त बना चुकी थी। कविता ने अपना हाथ नीचे ले जाकर समीर की पैंट के ऊपर से ही उसके खीरे को पकड़ा और उसे जोर से दबाया, जिससे समीर के मुँह से सिसकारी निकल गई।
धीरे-धीरे तेजी बढ़ती गई और अब दोनों ही बेकाबू हो रहे थे। समीर ने कविता को अपनी बर्थ पर लिटा दिया और उसकी साड़ी को धीरे-धीरे उतारने लगा। जब कविता पूरी तरह से निर्वस्त्र हुई, तो समीर उसे देखता ही रह गया। उसकी खाई घने और काले बालों से ढकी हुई थी, जो उस गोरी रंगत पर बहुत ही सुंदर लग रहे थे। समीर ने नीचे झुककर कविता की उस गहरी खाई को निहारना शुरू किया। वह खाई अब पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और उससे एक भीनी सी खुशबू आ रही थी। समीर ने अपनी जीभ से उस खाई को चाटना शुरू किया, जिसे देखकर कविता ने अपने हाथ समीर के बालों में फंसा लिए और अपने कूल्हों को हवा में उठाने लगी। वह अपनी खाई में समीर की उंगलियों का अनुभव करना चाहती थी। समीर ने जब अपनी उंगली से खाई को खोदना शुरू किया, तो कविता जोर-जोर से कराहने लगी।
अब समय आ गया था उस असली खुदाई का जिसके लिए दोनों तड़प रहे थे। समीर ने अपनी पैंट उतारी और अपने विशाल और कड़क खीरे को कविता की उस नम खाई के मुहाने पर रखा। कविता ने अपने दोनों पैर समीर के कंधों पर रख दिए, जिससे उसकी खाई पूरी तरह से खुल गई। समीर ने एक जोरदार धक्का दिया और उसका खीरा आधा उस तंग खाई के अंदर समा गया। कविता के मुँह से एक चीख निकली, लेकिन वह दर्द की नहीं, बल्कि अपार आनंद की थी। समीर ने अपनी रफ़्तार बढ़ानी शुरू की और हर धक्के के साथ वह पूरा खीरा उस गहराई तक पहुँचाने लगा। पूरी खुदाई का यह सिलसिला काफी देर तक चलता रहा। ट्रेन की पटरियों की आवाज और दोनों के टकराने की आवाजें जैसे एक दूसरे में मिल गई थीं। समीर के हर धक्के के साथ कविता के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और वह बार-बार समीर को अपने और करीब खींच रही थी।
खुदाई अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी। कविता अब पागलों की तरह झूम रही थी और समीर के शरीर को अपने नाखूनों से खुरच रही थी। समीर ने अपनी गति को और तेज कर दिया, जैसे वह उस खाई के हर कोने को खोद डालना चाहता हो। अचानक कविता का शरीर अकड़ने लगा और उसने समीर को बहुत जोर से जकड़ लिया। उसकी खाई से ढेर सारा रस निकलने लगा और उसी समय समीर का भी सारा रस उस खाई की गहराइयों में छूट गया। दोनों ही पसीने से तरबतर थे और एक-दूसरे की बाहों में ढीले पड़ गए। उस चरम सुख के बाद की शांति बहुत ही सुकून भरी थी। कविता समीर के सीने पर सिर रखकर लंबी साँसें ले रही थी और समीर उसके बालों को सहला रहा था। कुछ देर बाद, दोनों ने खुद को साफ किया और अगले स्टेशन आने से पहले अपनी-अपनी जगह पर संभल कर बैठ गए, लेकिन उनके दिलों में उस रात की खुदाई की यादें हमेशा के लिए बस गई थीं।