रश्मि मौसी की चु@@ई—>गर्मी की वो दोपहर आज भी मेरे ज़हन में ताज़ा है जब मैं अपनी मौसी रश्मि के घर कुछ दिन बिताने गया था। रश्मि मौसी की उम्र करीब छत्तीस साल थी, लेकिन उनके शरीर की बनावट किसी बीस साल की जवान लड़की को भी मात दे दे। उनका रंग गोरा था और जब वो हल्के नीले रंग की शिफॉन की साड़ी पहनती थीं, तो उनके शरीर के उभार साफ नज़र आते थे। रश्मि मौसी के बड़े-बड़े और रसीले तरबूज ब्लाउज के अंदर जैसे कैद होने के लिए छटपटा रहे थे। जब वो चलती थीं, तो उनका भारी और मांसल पिछवाड़ा किसी समंदर की लहरों की तरह ऊपर-नीचे होता था, जिसे देख कर मेरे मन में अजीब सी हलचल होने लगती थी। मेरे मन में उनके प्रति एक गहरा आकर्षण बचपन से ही था, लेकिन उस दिन वो आकर्षण एक कामुक ज्वालामुखी का रूप लेने लगा था।
मौसा जी बिजनेस के सिलसिले में शहर से बाहर गए हुए थे और घर में हम दोनों के अलावा कोई नहीं था। रश्मि मौसी की काया बहुत ही मोहक थी, उनकी कमर पतली थी लेकिन उनके कूल्हे काफी चौड़े थे जो उनकी साड़ी में और भी उभर कर सामने आते थे। जब वो किचन में खाना बना रही थीं, तो पसीने की कुछ बूंदें उनकी गर्दन से फिसलकर उनके तरबूजों की गहराई में जा रही थीं। मैं हॉल में बैठा उन्हें देख रहा था और मेरा खीरा मेरी पैंट के अंदर अपनी जगह बनाने के लिए बेकरार हो रहा था। मौसी को शायद मेरी नज़रों का अहसास हो गया था, क्योंकि जब वो मुड़ीं तो उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कुराहट और थोड़ी शर्मिंदगी साफ़ दिखाई दे रही थी।
शाम ढलते-ढलते घर का माहौल और भी रूमानी होने लगा था। हम दोनों सोफे पर बैठकर टीवी देख रहे थे, तभी मौसी ने कहा कि उनकी पीठ में काफी दर्द हो रहा है। मैंने झिझकते हुए कहा कि क्या मैं मालिश कर दूँ? मौसी ने मेरी आँखों में गहराई से देखा और फिर धीरे से हाँ कह दिया। जब मैंने उनके कंधों को छूना शुरू किया, तो उनकी त्वचा रेशम जैसी मुलायम महसूस हुई। मेरे हाथों का स्पर्श पाते ही उनकी सांसें थोड़ी तेज़ हो गई थीं। मैंने धीरे-धीरे अपनी उंगलियों को उनकी पीठ के नीचे ले जाना शुरू किया, जहाँ से उनकी साड़ी थोड़ी सरक गई थी। उनके शरीर की खुशबू और वो गर्माहट मुझे पागल कर रही थी, और मुझे समझ आ गया था कि अब पीछे मुड़ना नामुमकिन है।
धीरे-धीरे मेरा हाथ उनके ब्लाउज के हुक तक पहुँच गया। मेरी धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि मुझे खुद सुनाई दे रही थीं। रश्मि मौसी ने भी कोई विरोध नहीं किया, बल्कि उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक लंबी आह भरी। मैंने जैसे ही ब्लाउज का हुक खोला, उनके भारी और गोल तरबूज आज़ाद होकर अपनी पूरी खूबसूरती के साथ मेरे सामने थे। उनके बीच की गहरी घाटी और उन पर लगे नन्हे मटर के दाने ठंड और उत्तेजना से सख्त हो गए थे। मैंने अपनी जीभ से उनके उन तरबूजों के ऊपर मौजूद मटर को सहलाना शुरू किया, तो मौसी के मुँह से सिसकारी निकल गई। वो धीरे से फुसफुसायीं, ‘समीर, ये क्या कर रहे हो, ये गलत है,’ लेकिन उनके हाथों ने मुझे और भी करीब खींच लिया था।
मैंने उनके होठों पर अपने होठ रख दिए और हम दोनों एक-दूसरे के रस का आनंद लेने लगे। उनके मुँह की मिठास ने मेरे खीरे को और भी सख्त और लंबा कर दिया था। अब हम दोनों पूरी तरह से निर्वस्त्र हो चुके थे। मौसी की खाई पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और उसमें से प्यार का रस रिस रहा था। मैंने अपनी उंगली से उनकी खाई को टटोलना शुरू किया, तो वो पूरी तरह से भीग चुकी थी। रश्मि मौसी ने मेरे खीरे को अपने हाथों में पकड़ा और उसे सहलाते हुए बोलीं, ‘तुम्हारा खीरा तो बहुत बड़ा और सख्त है समीर, क्या मेरी खाई इसे संभाल पाएगी?’ उनकी इस बात ने मेरी उत्तेजना को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया और मैंने उनके तरबूजों को हाथों से दबाते हुए उनके कानों में गहरी सांसें भरीं।
अब समय आ गया था उस असली खेल का जिसके लिए हम दोनों तरस रहे थे। मैंने मौसी को बिस्तर पर लेटाया और उनके दोनों पैरों को फैलाकर उनकी गहरी खाई के दर्शन किए। वहाँ घने काले बाल थे जो उनकी कामुकता को और बढ़ा रहे थे। मैंने अपने खीरे के अगले हिस्से को उनकी खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से दबाव डाला। जैसे ही मेरा आधा खीरा अंदर गया, मौसी ने ज़ोर से मेरी पीठ में अपने नाखून गड़ा दिए और कराहते हुए बोलीं, ‘ओह समीर, धीरे… बहुत बड़ा है ये।’ मैंने धीरे-धीरे पूरी ताकत के साथ अपने खीरे को उनकी खाई की गहराई तक उतार दिया। मौसी की आँखों से खुशी के आंसू निकल आए और वो मेरी गर्दन को चूमने लगीं।
अब खुदाई की प्रक्रिया पूरी रफ़्तार पकड़ चुकी थी। मैं सामने से खोदना (missionary) शुरू कर चुका था। हर धक्के के साथ मेरे अंडकोष उनकी जांघों से टकरा रहे थे, जिससे एक थप-थप की आवाज़ आ रही थी। रश्मि मौसी भी मेरा पूरा साथ दे रही थीं, वो अपनी कमर ऊपर उठाकर मेरे खीरे को और गहराई तक लेने की कोशिश कर रही थीं। उनके तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके मटर के दाने मेरे सीने से रगड़ खा रहे थे। हम दोनों पसीने से तर-बतर थे, लेकिन खुदाई की वो भूख खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी। मौसी बार-बार कह रही थीं, ‘और तेज़ समीर, अपनी मौसी की खाई को आज पूरी तरह से खोद दो, मुझे तड़पाओ मत।’
थोड़ी देर बाद मैंने उन्हें घुमाया और पिछवाड़े से खोदने (doggy style) की पोज़िशन में ले आया। उनके भारी पिछवाड़े को पीछे से देखना एक अद्भुत अनुभव था। मैंने पीछे से अपना खीरा फिर से उनकी खाई में उतारा और इस बार धक्के और भी ज़ोरदार थे। हर बार जब मेरा खीरा अंदर जाता, तो उनके पिछवाड़े के मांस में एक कंपन पैदा होता था। रश्मि मौसी बेड की चादर को अपने हाथों से भींच रही थीं और ज़ोर-ज़ोर से आहें भर रही थीं। ‘हाँ समीर, वहीं… बहुत गहरा जा रहा है… ओह माँ, कितना मज़ा आ रहा है!’ उनकी इन आवाज़ों ने मुझे चरम सीमा पर पहुँचा दिया था। मेरा खीरा अब पूरी तरह से फटने को तैयार था।
अंत में, हम दोनों अपने रस निकलने (orgasm) के करीब थे। मैंने अपनी रफ़्तार और तेज़ कर दी और आख़िरी कुछ शक्तिशाली धक्के लगाए। जैसे ही मेरा रस निकला, मैंने उसे मौसी की खाई की गहराई में ही छोड़ दिया। उसी पल रश्मि मौसी का भी रस निकल गया और वो कांपते हुए बिस्तर पर ढेर हो गईं। हम दोनों कई मिनटों तक एक-दूसरे से लिपटे रहे, हमारी सांसें फूल रही थीं और शरीर पसीने से चिपचिपा रहा था। रश्मि मौसी ने मेरे माथे को चूमा और कहा, ‘आज तुमने मुझे वो सुख दिया है जो शायद मुझे पहले कभी नहीं मिला।’ उस रात के बाद हमारा रिश्ता सिर्फ मौसी और भांजे का नहीं रहा, बल्कि हम एक-दूसरे के जिस्मानी रूह के साथी बन चुके थे।