Kavita Maa Ki Chu@@ai—>
दोपहर की उस तपती धूप में पूरा घर एक अजीब सी खामोशी में डूबा हुआ था, सिर्फ हॉल में चल रहे पुराने पंखे की चरमराहट सुनाई दे रही थी। मेरी सौतेली माँ कविता, जो अभी सिर्फ 32 साल की थीं, अपने कमरे में लेटी हुई थीं और उनके चेहरे पर पसीने की छोटी-छोटी बूंदें चमक रही थीं। उनके शरीर की बनावट किसी तराशी हुई मूरत जैसी थी, जिसमें उनके उभरे हुए तरबूज उनकी तंग चोली से बाहर झाँकने को बेताब लग रहे थे। मैं, आर्यन, जिसकी उम्र अभी 22 साल थी, अपनी इस जवान और खूबसूरत माँ के पास जाने के ख्याल से ही कांप रहा था, लेकिन मेरे मन के भीतर दबी हुई इच्छाएं आज मर्यादा की हर दीवार को लांघने को तैयार थीं।
कविता माँ का शरीर बहुत ही कामुक था, उनकी कमर पतली थी लेकिन उनके नीचे का हिस्सा काफी भारी और मांसल था, जिसे देखकर किसी का भी मन डोल जाए। जब वो चलती थीं, तो उनके पिछवाड़े का हिलना मेरे भीतर एक अजीब सी हलचल पैदा कर देता था और मेरा खीरा मेरी पैंट के अंदर छटपटाने लगता था। आज उनके कमरे का दरवाजा आधा खुला था और वो बिस्तर पर इस तरह लेटी थीं कि उनकी साड़ी उनके घुटनों तक सरक गई थी, जिससे उनके गोरे और चिकने पैर साफ दिखाई दे रहे थे। उनकी गहरी सांसों के साथ उनके तरबूज ऊपर-नीचे हो रहे थे, और उनके मटर साड़ी के पतले कपड़े के ऊपर से ही अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे।
मैं दबे पांव उनके कमरे में दाखिल हुआ, मेरे दिल की धड़कनें इतनी तेज थीं कि मुझे डर था कहीं वो जाग न जाएं। उनके पास जाकर खड़ा हुआ तो उनके शरीर से आने वाली मोगरे की खुशबू और पसीने की गंध ने मेरे दिमाग पर नशा सा कर दिया। मैंने धीरे से अपना हाथ उनकी खुली हुई कमर पर रखा, मेरा स्पर्श होते ही वो हल्की सी सिहरीं लेकिन उन्होंने आँखें नहीं खोलीं। मेरा मन और शरीर दोनों एक गहरे संघर्ष में थे, एक तरफ वो मेरी माँ थीं और दूसरी तरफ एक बेहद आकर्षक औरत जिसकी खुदाई करने की चाहत मुझे पागल कर रही थी। धीरे-धीरे मेरा हाथ उनकी कमर से ऊपर की ओर बढ़ा और उनके रेशमी ब्लाउज के पास पहुँच गया।
जैसे ही मैंने उनके कंधे को सहलाया, कविता माँ ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं और मुझे अपने इतने करीब देखकर उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान के साथ हैरानी के भाव आए। उन्होंने कुछ कहा नहीं, बस मुझे देखती रहीं, जैसे वो भी इसी पल का इंतजार कर रही थीं। मैंने हिम्मत जुटाकर उनके होठों पर अपना हाथ रखा और फिर धीरे से झुककर उनके माथे को चूम लिया, यह स्पर्श बहुत गहरा और भावुक था। उनकी सांसें तेज होने लगी थीं और वो धीरे से फुसफुसाई, ‘आर्यन, यह क्या कर रहे हो, मैं तुम्हारी माँ हूँ।’ मैंने उनकी आँखों में झांकते हुए कहा, ‘आप सिर्फ एक औरत हैं माँ, और मैं आपको अपनी बाहों में भरना चाहता हूँ।’
मेरी बात सुनकर उनकी आँखों में लाज और इच्छा का एक अनोखा संगम दिखा, और उन्होंने अपनी आँखें मूंद लीं, जो मेरे लिए एक मूक सहमति थी। मैंने धीरे से उनके ब्लाउज के हुक खोलने शुरू किए, मेरा हर स्पर्श उन्हें और भी ज्यादा उत्तेजित कर रहा था। जैसे ही ब्लाउज के बंधन खुले, उनके विशाल और दुधिया तरबूज आजाद होकर मेरे सामने आ गए, जिनके ऊपर के गुलाबी मटर ठंड और उत्तेजना से पूरी तरह सख्त हो चुके थे। मैंने अपने हाथ बढ़ाकर उन नरम तरबूजों को सहलाना शुरू किया, तो उनके मुंह से एक गहरी आह निकली और उन्होंने अपना सिर पीछे की ओर झुका लिया।
अब मेरा खीरा पूरी तरह से अकड़ चुका था और उसे अपनी कैद से बाहर निकलने की जल्दी थी, मैंने अपनी पैंट उतारी और मेरा लंबा और मोटा खीरा बाहर निकलकर उनके सामने तन गया। कविता माँ ने जब उसे देखा तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं, उन्होंने धीरे से अपना हाथ बढ़ाकर मेरे खीरे को छुआ, जिससे मेरे पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गई। उन्होंने धीरे-धीरे उसे सहलाया और फिर उसे अपने मुंह के करीब ले गईं। जब उन्होंने पहली बार मेरे खीरे को मुंह में लिया और उसे चूसना शुरू किया, तो मुझे ऐसा लगा जैसे मैं स्वर्ग के दरवाजे पर खड़ा हूँ। उनकी जीभ का वो गर्म अहसास मेरे खीरे पर एक नया ही रोमांच पैदा कर रहा था।
कुछ देर तक खीरा चूसने के बाद, मैंने उन्हें बिस्तर पर सीधा लिटाया और उनकी साड़ी और पेटीकोट को पूरी तरह से हटा दिया। अब उनके पैरों के बीच की गहरी और रसीली खाई मेरे सामने थी, जिसके चारों तरफ काले और रेशमी बाल एक सुरक्षा चक्र की तरह फैले हुए थे। मैंने अपना सिर झुकाया और उनकी खाई को चाटना शुरू किया, मेरा यह कृत्य उन्हें पागल कर रहा था। वो बिस्तर की चादर को अपने हाथों से जकड़ रही थीं और उनका शरीर धनुष की तरह ऊपर उठ रहा था। मैंने अपनी उंगली से उनकी खाई के अंदर के गीलेपन को महसूस किया और धीरे से उंगली से खोदना शुरू किया, जिससे उनकी कराहें और भी तेज हो गईं।
अब बर्दाश्त की हदें खत्म हो चुकी थीं, मैंने खुद को उनके ऊपर सेट किया और अपने खीरे की नोक को उनकी गीली खाई के मुहाने पर रखा। जैसे ही मैंने एक जोरदार धक्का मारा, मेरा आधा खीरा उनकी तंग खाई के अंदर समा गया, और उनके मुंह से एक दर्द भरी लेकिन सुखद चीख निकली। उन्होंने मेरे कंधों को मजबूती से पकड़ लिया और अपना पिछवाड़ा ऊपर की ओर उठाया। मैंने धीरे-धीरे खुदाई की प्रक्रिया शुरू की, हर धक्के के साथ मेरा खीरा उनकी गहराई को और भी ज्यादा नाप रहा था। कमरे में सिर्फ हमारे शरीरों के टकराने की आवाज और उनकी उत्तेजक आहें गूँज रही थीं।
हमारी खुदाई अब अपनी चरम सीमा पर पहुँच रही थी, मैंने उन्हें करवट दिलाकर पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। इस पोजीशन में उनके दोनों तरबूज नीचे की ओर लटक रहे थे और उनका पिछवाड़ा मेरे सामने पूरी तरह से खुला हुआ था। मैंने एक हाथ से उनके तरबूजों को मसला और दूसरे हाथ से उनकी कमर पकड़कर जोरदार धक्के लगाने शुरू किए। कविता माँ अब बेकाबू हो चुकी थीं, वो चिल्ला रही थीं, ‘हाँ आर्यन, और जोर से खोदो, आज अपनी माँ को पूरी तरह से भर दो।’ उनके ये शब्द मुझे और भी ज्यादा पागल कर रहे थे और मैं किसी जंगली जानवर की तरह उनकी खुदाई कर रहा था।
काफी देर तक इस गहन और भावनात्मक खुदाई के बाद, मुझे महसूस हुआ कि मेरा रस अब बाहर निकलने के लिए बेताब है। कविता माँ की खाई भी अब बहुत ज्यादा गीली और गर्म हो चुकी थी, उनकी मांसपेशियों में खिंचाव आ रहा था और वो थरथराने लगी थीं। जैसे ही उन्होंने अपना रस छोड़ा, मैंने भी एक आखिरी और सबसे गहरा धक्का मारा और अपना सारा गर्म रस उनकी खाई की गहराइयों में उड़ेल दिया। हम दोनों ही पसीने से लथपथ एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े, हमारे शरीरों के बीच की दूरी अब पूरी तरह खत्म हो चुकी थी। उस पल के बाद की शांति बहुत ही सुखद और गहरी थी, हम दोनों बस एक-दूसरे की धड़कनों को सुन रहे थे और इस नए रिश्ते की गर्माहट को महसूस कर रहे थे।