कला की पाठशाला में अनकही प्यास
दोपहर की सुनहरी धूप स्टूडियो की बड़ी खिड़कियों से छनकर आ रही थी, जहाँ कविता अपनी पेंटिंग में डूबी हुई थी। कविता के शरीर का हर मोड़ किसी तराशी हुई मूर्ति की तरह था, उसके रेशमी ब्लाउज के भीतर दबे उसके पुष्ट और रसीले तरबूज हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। उसके पतले … Read more