नेहा भाभी की चु@@ई—>मेरे बड़े भाई की शादी के बाद जब नेहा भाभी हमारे घर आईं, तो पूरे मोहल्ले में उनकी खूबसूरती के चर्चे होने लगे थे। भाभी का रंग एकदम साफ था और उनका शरीर किसी ढली हुई मूरत की तरह सुडौल था। जब वो साड़ी पहनकर घर में चलती थीं, तो उनकी पतली कमर और भारी तरबूज हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लेते थे। मैं उस समय अपनी पढ़ाई पूरी कर रहा था और घर पर ही रहता था। भाभी का स्वभाव बहुत ही मिलनसार था और वो मुझसे बहुत प्यार से बात करती थीं, लेकिन मेरी आँखों में हमेशा उनके प्रति एक अजीब सी तड़प रहती थी जो मैं चाहकर भी छुपा नहीं पाता था।
भाभी के तरबूज इतने उभरे हुए और बड़े थे कि उनके ब्लाउज के बटन हमेशा तनाव में रहते थे। जब भी वो झुककर काम करतीं, उनके तरबूजों की गहरी घाटी साफ दिखाई देती थी, जिसे देखकर मेरा खीरा मेरे कपड़ों के अंदर अंगड़ाई लेने लगता था। उनके तरबूजों के ऊपर छोटे-छोटे मटर जैसे दाने जब कपड़े के ऊपर से उभरते थे, तो मेरा मन करता था कि मैं जाकर उन्हें अभी चख लूँ। भाभी की रेशमी त्वचा और उनकी खुशबू मुझे मदहोश कर देती थी। उनकी कमर का घेरा और उनके पिछवाड़े का उभार इतना कामुक था कि मैं अक्सर रात को उनके बारे में सोचकर अपने खीरे को सहलाते हुए सोता था।
हमारे बीच एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव भी था। भाई अक्सर काम के सिलसिले में शहर से बाहर रहते थे, इसलिए घर की सारी जिम्मेदारी भाभी और मुझ पर ही थी। हम घंटों साथ बैठकर बातें करते, फिल्म देखते और हँसते-मुस्कुराते थे। उन बातों के दौरान कई बार हमारी नज़रें मिलतीं और एक बिजली सी कौंध जाती। भाभी की आँखों में भी मेरे लिए एक अलग सी चमक दिखाई देने लगी थी। वो अक्सर मुझसे अपनी छोटी-छोटी जरूरतें शेयर करतीं और मैं उन्हें पूरा करने के लिए जी-जान लगा देता। इस अपनेपन ने हमारे बीच की झिझक को धीरे-धीरे कम करना शुरू कर दिया था और आकर्षण का बीज पनपने लगा था।
एक रात शहर में बहुत तेज़ बारिश हो रही थी और बिजली भी गुल थी। भाई उस दिन भी घर पर नहीं थे। पूरे घर में सन्नाटा था, सिर्फ बारिश की बूंदों की आवाज़ गूँज रही थी। अचानक भाभी मेरे कमरे में आईं, वो काफी डरी हुई लग रही थीं। उन्होंने एक पतली सी सूती नाइटी पहनी हुई थी, जिसमें से उनके विशाल तरबूज और उनके ऊपर के मटर साफ़ झलक रहे थे। उनकी नाइटी बारिश की वजह से थोड़ी गीली हो गई थी और उनके बदन से चिपकी हुई थी। मुझे देखते ही वो घबराकर मेरे पास बैठ गईं और कहने लगीं कि उन्हें डर लग रहा है।
मैंने उनके कंधे पर हाथ रखा और उन्हें ढांढस बंधाया। उस पल जब मेरा हाथ उनकी नंगी और रेशमी बांहों से टकराया, तो मेरे पूरे शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। भाभी की सांसें तेज़ हो गई थीं और उनका सीना ऊपर-नीचे हो रहा था, जिससे उनके तरबूज मेरी आँखों के ठीक सामने नाच रहे थे। मैंने धीरे से अपना हाथ उनकी पीठ पर फेरा, जहाँ से उनकी नाइटी खुली हुई थी। मेरी उंगलियों का स्पर्श पाते ही भाभी ने एक गहरी आह भरी और अपनी आँखें मूंद लीं। झिझक अब खत्म हो रही थी और मन का संघर्ष अपनी चरम सीमा पर था।
मैंने धीरे से अपना चेहरा उनके पास ले जाकर उनके होंठों का रसीला स्वाद लेना शुरू किया। भाभी ने पहले तो थोड़ी झिझक दिखाई, लेकिन फिर उन्होंने अपनी बाहें मेरे गले में डाल दीं और मेरा साथ देने लगीं। हमारे होंठ एक-दूसरे में खो गए थे और हम एक-दूसरे की सांसों को महसूस कर रहे थे। मेरा हाथ धीरे-धीरे ऊपर बढ़ा और उनके भारी तरबूजों पर जाकर टिक गया। जैसे ही मैंने उनके तरबूज को हल्के से दबाया, उनके मुँह से एक मदहोश कर देने वाली कराह निकली। उनके मटर अब मेरे हाथों की गर्मी से पूरी तरह अकड़ चुके थे और बहुत उत्तेजक लग रहे थे।
भाभी की उत्तेजना बढ़ती जा रही थी, उन्होंने मेरे कपड़ों को धीरे-धीरे उतारना शुरू कर दिया। जब मेरा गर्म और सख्त खीरा उनके सामने आया, तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाकर मेरे खीरे को छुआ और उसे सहलाने लगीं। उनकी उंगलियों का स्पर्श पाकर मेरा खीरा और भी ज्यादा कड़क हो गया था। मैंने भी उनकी नाइटी के बटन खोले और उनके गोरे-चिट्टे तरबूजों को आज़ाद कर दिया। वो बिल्कुल सफ़ेद और मुलायम थे, जिन पर भूरे रंग के मटर सजे हुए थे। मैंने अपना मुँह उनके एक तरबूज पर जमा दिया और उस मटर को चूसने लगा।
भाभी दर्द और आनंद के मिश्रित भाव के साथ कराह रही थीं। मैंने अपना हाथ नीचे ले जाकर उनकी रेशमी खाई को टटोला। वहाँ पहले से ही रस की नदियाँ बह रही थीं। उनकी खाई के बाल बहुत ही करीने से कटे हुए थे और वो जगह बहुत ही मुलायम महसूस हो रही थी। मैंने अपनी उंगली से उनकी खाई में खुदाई करना शुरू किया, तो वो पूरी तरह से कांप उठीं। उनकी खाई इतनी तंग और गर्म थी कि मुझे महसूस हो रहा था कि अब देर करना मुश्किल होगा। भाभी ने अपनी टांगें फैला दीं और मुझे अपनी ओर खींचते हुए कहा, “राहुल, अब और इंतज़ार नहीं होता, इसे अपनी खाई में डाल लो।”
मैंने उनके दोनों पैरों को ऊपर उठाया और अपने खीरे का अगला हिस्सा उनकी रसीली खाई के मुहाने पर टिका दिया। जैसे ही मैंने हल्का सा दबाव डाला, मेरा खीरा उनकी तंग खाई के अंदर सरकने लगा। भाभी ने ज़ोर से मेरी पीठ में अपने नाखून गड़ा दिए और एक तीखी आह भरी। मैंने धीरे-धीरे सामने से खुदाई करना शुरू किया। हर धक्के के साथ मेरा खीरा उनकी खाई की गहराइयों को नाप रहा था। कमरे में सिर्फ हमारे शरीरों के टकराने की आवाज़ और भाभी की मदहोश कर देने वाली आहें गूँज रही थीं।
खुदाई की गति अब धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी। भाभी भी अपनी कमर ऊपर उठा-उठाकर मेरा पूरा साथ दे रही थीं। मैंने उनके दोनों तरबूजों को अपने हाथों में कसकर पकड़ लिया और पागलों की तरह उन्हें दबाते हुए खुदाई करने लगा। भाभी ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रही थीं, “हाँ राहुल, और ज़ोर से खोदो, आज मुझे पूरी तरह अपना बना लो!” उनकी खाई का कसाव और उनकी गर्मी मुझे पागल कर रही थी। पसीने से लथपथ हमारे शरीर एक-दूसरे से चिपक गए थे और हर धक्के के साथ एक अजीब सा सुखद अहसास हो रहा था।
काफी देर तक सामने से खुदाई करने के बाद, मैंने उन्हें पलटने के लिए कहा। भाभी घुटनों के बल बैठ गईं और उन्होंने अपना पिछवाड़ा मेरी तरफ उठा दिया। पीछे से उनके उभरे हुए पिछवाड़े को देखकर मेरी उत्तेजना सातवें आसमान पर पहुँच गई। मैंने अपना खीरा पीछे से उनकी खाई में डाल दिया और पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। यह पोजीशन बहुत ही दमदार थी, हर धक्के पर उनके तरबूज नीचे लटककर झूल रहे थे। भाभी बेतहाशा सिसकियाँ भर रही थीं और मेरा नाम पुकार रही थीं। उनके शरीर की हर मांसपेशी अब तनाव में थी और वो रस छोड़ने के करीब थीं।
हम दोनों ही अब अपनी चरम सीमा पर थे। भाभी की खाई में रस का सैलाब आने लगा था और मेरा खीरा भी अब फटने को तैयार था। मैंने आखिरी कुछ तेज़ धक्के लगाए और भाभी ने ज़ोर से चीखते हुए अपना पूरा रस छोड़ दिया। उनकी खाई की दीवारों ने मेरे खीरे को कसकर जकड़ लिया। ठीक उसी पल, मेरा भी सारा रस निकल गया और उनकी खाई के अंदर भर गया। हम दोनों निढाल होकर एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े। हमारी सांसें अभी भी तेज़ थीं और शरीर पसीने से भीगा हुआ था, लेकिन मन को एक असीम शांति और तृप्ति मिल चुकी थी।
काफी देर तक हम उसी हालत में लेटे रहे, एक-दूसरे की धड़कनों को सुनते हुए। भाभी ने मेरा माथा चूमा और मुस्कुराते हुए मेरी आँखों में देखा। उनकी आँखों में अब कोई शर्म नहीं थी, बल्कि एक गहरा संतोष और प्यार था। उन्होंने धीरे से कहा, “तुमने आज मुझे वो सुख दिया है जिसकी मुझे बरसों से तलाश थी।” उस रात के बाद हमारी हालत और रिश्ते की परिभाषा ही बदल गई थी। अब हमारे बीच सिर्फ देवर-भाभी का रिश्ता नहीं था, बल्कि एक ऐसा राज़ था जिसने हमें हमेशा के लिए एक-दूसरे के करीब ला दिया था।