मीरा जब बरसों बाद रोहन के घर आई, तो उसे देखकर रोहन की सांसें जैसे ठहर सी गईं। वह पहले से कहीं ज्यादा निखर गई थी, उसके शरीर का हर अंग एक नई कहानी कह रहा था। उसकी रेशमी साड़ी उसके जिस्म की हर ढलान और उभार को बड़ी खूबसूरती से उभार रही थी। मीरा के शरीर के ऊपरी हिस्से में मौजूद वे दो भारी और गोल तरबूज साड़ी के ब्लाउज को चीर कर बाहर आने को बेताब दिख रहे थे। रोहन की नज़रें बार-बार उन गोल तरबूजों के बीच की गहराई में जाकर अटक जाती थीं, जहाँ पसीने की एक नन्हीं सी बूंद धीरे-धीरे सरक रही थी। उसकी पतली कमर और उसके नीचे फैले चौड़े कूल्हे उसे किसी अप्सरा जैसा रूप दे रहे थे।
रोहन ने उसे अंदर बुलाया और दोनों सोफे पर बैठ गए। पुरानी यादों का सिलसिला शुरू हुआ, लेकिन बातों के बीच जो खामोशी थी, वह गहरी चाहत और तड़प से भरी हुई थी। मीरा की आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी, जैसे वह भी उस पुराने आकर्षण को महसूस कर रही हो। रोहन ने देखा कि मीरा की गर्दन कितनी सुराहीदार और गोरी थी, जिस पर उसके बालों की कुछ लटें खेल रही थीं। कमरे में छाई हल्की रोशनी ने माहौल को और भी रूमानी बना दिया था। रोहन ने धीरे से अपना हाथ मीरा की हथेली पर रखा, तो उसने अपना हाथ पीछे नहीं खींचा, बल्कि उसकी उंगलियों को कसकर थाम लिया।
“रोहन, तुम आज भी बिल्कुल नहीं बदले,” मीरा ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। रोहन ने अपनी उंगलियों की हरकत बढ़ाई और धीरे-धीरे उसके हाथ को सहलाते हुए उसकी कलाई तक ले गया। वहाँ की कोमल त्वचा को छूते ही रोहन के भीतर एक बिजली सी दौड़ गई। मीरा की साँसें अब थोड़ी भारी होने लगी थीं और उसकी छाती पर मौजूद वे तरबूज तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहे थे। रोहन ने हिम्मत जुटाई और अपना दूसरा हाथ मीरा की कमर पर रखा, जहाँ साड़ी थोड़ी सरकी हुई थी। उसकी रेशमी और ठंडी कमर का स्पर्श रोहन को मदहोश करने के लिए काफी था।
मीरा ने अपनी आँखें बंद कर लीं और धीरे से अपना सिर रोहन के कंधे पर टिका दिया। रोहन ने अपनी उंगलियों से उसकी कमर को धीरे-धीरे दबाना शुरू किया, जिससे मीरा के मुँह से एक हल्की सी टूटी हुई आवाज़ निकली। उसने रोहन को और करीब खींच लिया, जैसे वह बरसों की प्यास बुझाना चाहती हो। रोहन ने अपनी नाक उसकी गर्दन के पास ले जाकर उसकी खुशबू को गहराई से महसूस किया। वह इत्र और उसके जिस्म की महक का एक नशीला मिश्रण था। रोहन के होंठ अब मीरा की गर्दन को छूने लगे थे, जिससे उसके पूरे शरीर में एक कंपकंपी दौड़ गई और उसके अंगों में एक अजीब सी कसावट आने लगी।
जैसे-जैसे नज़दीकियाँ बढ़ीं, झिझक की दीवारें ढहने लगीं। रोहन के हाथ अब मीरा की पीठ पर रेंग रहे थे, ब्लाउज की डोरियों को महसूस करते हुए। उसने धीरे से उन डोरियों को खोला, जिससे मीरा का बदन आज़ादी महसूस करने लगा। रोहन ने साड़ी के पल्लू को धीरे से कंधे से नीचे गिरा दिया, जिससे वे भारी और सख्त तरबूज पूरी तरह सामने आ गए। उन तरबूजों के शिखर पर छोटी और गुलाबी मटर की तरह दाने उभर आए थे, जो ठंड और उत्तेजना से सख्त हो गए थे। रोहन ने अपनी उंगलियों से उन मटर जैसे अंगों को धीरे-धीरे सहलाया और दबाया, जिससे मीरा की भारी साँसें अब कराहों में बदलने लगी थीं।
मीरा की चाहत अब चरम पर थी, उसने रोहन के कुर्ते के बटन खोल दिए और उसके चौड़े सीने पर अपने हाथ फेरने लगी। उसकी उंगलियां रोहन के जिस्म की गर्मी को सोख रही थीं। रोहन ने मीरा को गोद में उठा लिया और उसे बिस्तर की ओर ले गया। बिस्तर की कोमलता पर गिरते ही मीरा ने अपनी बाहें रोहन के गले में डाल दीं। रोहन ने धीरे-धीरे उसके निचले वस्त्रों को हटाया, जिससे उसके शरीर का सबसे गुप्त हिस्सा, वह गहरी और गीली खाई सामने आ गई। वहाँ मौजूद काले रेशमी बाल उसकी सुंदरता में चार चाँद लगा रहे थे। रोहन ने अपनी उंगलियों से उस खाई को टटोला, तो पाया कि वह पूरी तरह से रस से भीग चुकी थी।
मीरा ने अब रोहन के पजामे को नीचे खिसकाया और उसके भीतर छिपे उस कठोर और गर्म खीरे को बाहर निकाला। उस खीरे की लंबाई और मोटाई देखकर मीरा की आँखें फटी रह गईं, लेकिन उसकी चाहत और भी बढ़ गई। उसने अपने कोमल हाथों से उस खीरे को पकड़ा और उसे सहलाने लगी। रोहन को ऐसा लगा जैसे वह जन्नत के करीब हो। मीरा ने धीरे से उस खीरे को अपने मुँह में ले लिया और उसे चूसने लगी। रोहन के मुँह से बेतहाशा आवाज़ें निकलने लगीं, वह अपनी उंगलियों को मीरा के बालों में फँसाकर उसे और भी गहराई से खुद को महसूस करने के लिए उकसाने लगा।
कुछ देर बाद, रोहन ने मीरा को सीधा लेटाया और उसके दोनों पैरों को ऊपर उठाकर उस गहरी खाई के मुहाने पर अपने खीरे को टिका दिया। उसने धीरे से दबाव डाला, और वह कठोर खीरा उस तंग और मखमली खाई के भीतर समाने लगा। मीरा ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और रोहन के कंधों को अपनी उंगलियों से खुरचने लगी। रोहन ने अब सामने से खोदना शुरू किया, हर धक्के के साथ वह गहराई तक जा रहा था। कमरे में मांस के मांस से टकराने की आवाज़ें और उनकी भारी साँसें गूँज रही थीं। मीरा की खाई उस खीरे को कसकर पकड़ रही थी, जैसे वह उसे कभी छोड़ना न चाहती हो।
रोहन ने अपनी गति बढ़ाई और मीरा के शरीर के साथ एक तालमेल बिठाया। अब उसने मीरा को पलट दिया और उसे घुटनों के बल बैठाकर पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। इस स्थिति में रोहन को उन भारी तरबूजों को पीछे से पकड़ने और सहलाने का पूरा मौका मिल रहा था। मीरा का पूरा शरीर हर धक्के के साथ हिल रहा था। वह बार-बार कह रही थी, “हाँ रोहन… और तेज़ी से… मुझे पूरी तरह अपना बना लो।” रोहन का खीरा अब पूरी तरह से गर्म और जोश से भरा हुआ था, वह उस खाई की गहराई में बार-बार टकरा रहा था, जिससे मीरा को असीम सुख मिल रहा था।
अंत में, वह पल आया जब दोनों के सब्र का बांध टूट गया। रोहन ने अपनी पूरी ताकत से कुछ आखिरी धक्के लगाए और उस खाई की गहराई में अपने खीरे से सारा रस छोड़ दिया। मीरा ने भी खुद को पूरी तरह से खो दिया और उसका शरीर झटके लेने लगा, जैसे उसके भीतर से एहसासों का कोई सैलाब बह गया हो। दोनों एक-दूसरे की बाहों में ढह गए, पसीने से तरबतर और पूरी तरह संतुष्ट। उस रात पुरानी यादें सिर्फ यादें नहीं रहीं, बल्कि एक नए और गहरे मिलन की शुरुआत बन गईं। वे दोनों देर तक वैसे ही लिपटे रहे, खामोशी में एक-दूसरे की धड़कनों को सुनते हुए, यह महसूस करते हुए कि रूहों का मिलन जिस्मों के जरिए कितना मुकम्मल हो सकता है।