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पुरानी सहेली की चु@@ई

पुरानी सहेली की चु@@ई—>सालों बाद समीर और श्रेया उस पुराने पार्क के सबसे एकांत कोने वाली बेंच पर बैठे थे जहाँ बचपन में वे लुका-छिपी खेला करते थे। रात का सन्नाटा गहरा था और चाँदनी पत्तों के बीच से छनकर श्रेया के चेहरे पर एक रहस्यमयी चमक बिखेर रही थी। समीर ने महसूस किया कि वक्त ने श्रेया को और भी हसीन बना दिया है, उसकी आँखों में वही पुरानी शरारत थी लेकिन अब उसमें एक गहरी प्यास भी झलक रही थी जो समीर के दिल की धड़कनें तेज कर रही थी। हवा में चमेली की खुशबू घुली हुई थी और श्रेया की सांसों की गर्माहट समीर के करीब बढ़ती जा रही थी, जिससे माहौल में एक अजीब सी उत्तेजना और पुरानी यादों का मिला-जुला असर होने लगा था।

श्रेया ने आज एक बहुत ही तंग रेशमी कुर्ती पहनी हुई थी जो उसके शरीर के हर उतार-चढ़ाव को बखूबी बयां कर रही थी। समीर की नजरें बार-बार उसके उन उभरे हुए तरबूजों पर जाकर टिक जाती थीं, जो कुर्ती के अंदर से आजाद होने की कोशिश करते दिख रहे थे। जब श्रेया गहरी सांस लेती, तो वे तरबूज और भी ज्यादा उभर आते थे और समीर का जी चाहता था कि बस एक बार उन्हें अपनी हथेलियों में भर ले। वह महसूस कर पा रहा था कि श्रेया के तरबूजों के ऊपर लगे मटर इस ठंडी हवा में सख्त हो चुके होंगे, जो कुर्ती के पतले कपड़े के ऊपर से ही अपनी मौजूदगी का एहसास दिला रहे थे। श्रेया के शरीर की बनावट अब एक परिपक्व औरत जैसी हो गई थी, जिसकी कमर पतली और पिछवाड़ा काफी भरा हुआ और गोल था, जो बेंच पर बैठने के कारण और भी ज्यादा फैल गया था।

समीर ने अपना गला साफ किया और दबी आवाज में कहा, ‘श्रेया, तुम बिल्कुल नहीं बदली, बस पहले से कहीं ज्यादा सुंदर और मोहक हो गई हो।’ श्रेया ने अपनी पलकें उठाईं और समीर की आँखों में सीधे देखते हुए एक शरारती मुस्कान दी, जिससे समीर के दिल की धड़कनें और तेज हो गईं। उसने धीरे से समीर का हाथ अपने हाथ में लिया और उसकी उंगलियों के बीच अपनी उंगलियां फँसा दीं, जिससे समीर के पूरे बदन में बिजली की एक लहर दौड़ गई। समीर महसूस कर पा रहा था कि श्रेया का हाथ पसीने से हल्का सा नम था, जो उसके मन में चल रही हलचल और झिझक को साफ दिखा रहा था। दोनों के बीच एक अनकहा भावनात्मक जुड़ाव बचपन से ही था, जो आज जवानी की दहलीज पर आकर एक नई और कामुक दिशा लेने को बेताब था।

बातों-बातों में समीर ने अपना हाथ श्रेया की कमर पर रखा और उसे अपनी ओर थोड़ा करीब खींच लिया, श्रेया ने कोई विरोध नहीं किया बल्कि अपना सिर समीर के मजबूत कंधे पर टिका दिया। समीर के हाथ की उंगलियां अब धीरे-धीरे श्रेया की पीठ पर रेंगने लगी थीं, जिससे श्रेया के शरीर में एक कंपन पैदा हुआ और उसने एक लंबी, गर्म आह भरी। समीर का खीरा अब उसकी पैंट के अंदर पूरी तरह से जाग चुका था और अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहा था। श्रेया को भी समीर की बढ़ती हुई उत्तेजना का अहसास उसके स्पर्श से होने लगा था, और उसके मन में बरसों से दबी हुई इच्छाएं अब ज्वालामुखी की तरह फटने को तैयार थीं।

समीर ने अपनी हिम्मत जुटाई और अपना चेहरा श्रेया के कान के पास ले जाकर धीरे से फुसफुसाया, ‘श्रेया, क्या तुम्हें याद है हम यहाँ छुपते थे? आज फिर से कहीं छुपने का मन है।’ श्रेया ने शर्माते हुए अपनी आँखें मूंद लीं और समीर की गर्दन में अपना चेहरा छुपा लिया, जो उसकी मूक सहमति थी। समीर उसे लेकर पार्क के उस हिस्से में गया जहाँ घनी झाड़ियां और बड़े-बड़े पेड़ थे, जहाँ कोई भी उन्हें देख नहीं सकता था। वहाँ पहुँचते ही समीर ने श्रेया को एक पुराने पेड़ के तने से सटा दिया और उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों में थाम लिया।

समीर के होंठ जब श्रेया के होंठों से टकराए, तो जैसे वक्त वहीं ठहर गया और दोनों एक-दूसरे की सांसों को पीने लगे। समीर का एक हाथ अब श्रेया के कुर्ती के नीचे जाकर उसके रेशमी बदन को सहलाने लगा था, और जब उसका हाथ श्रेया के उन रसीले तरबूजों तक पहुँचा, तो श्रेया के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली कराह निकल गई। समीर ने अपनी उंगलियों से उन सख्त मटरों को मसलना शुरू किया, जिससे श्रेया का शरीर धनुष की तरह तन गया और उसने समीर को और भी कसकर अपनी बाहों में भर लिया। श्रेया की सांसें अब तेज और गर्म हो चुकी थीं, और वह समीर के खीरे की सख्ती को अपनी जांघों के बीच महसूस कर पा रही थी।

समीर ने धीरे से श्रेया की कुर्ती को ऊपर की ओर खिसकाया और उसके गोरे, गोल तरबूजों को चाँदनी की रोशनी में आजाद कर दिया, जो अपनी पूरी भव्यता के साथ समीर के सामने थे। समीर ने झुककर एक मटर को अपने मुँह में भर लिया और उसे चूसने लगा, जबकि दूसरा हाथ नीचे जाकर श्रेया की रेशमी सलवार के अंदर रास्ता तलाशने लगा। जैसे ही समीर की उंगलियां श्रेया की गीली और गर्म खाई तक पहुँचीं, श्रेया ने अपने दांतों तले अपना निचला होंठ दबा लिया ताकि उसकी चीख बाहर न निकल जाए। उसकी खाई अब पूरी तरह से शहद छोड़ रही थी, जो समीर की उंगलियों को फिसलने में मदद कर रही थी।

समीर ने अपनी उंगली से खाई को खोदना शुरू किया, जिससे श्रेया की कमर ऊपर-नीचे होने लगी और वह समीर के बालों को अपनी उंगलियों में जकड़ने लगी। श्रेया ने हांफते हुए कहा, ‘समीर, अब और बर्दाश्त नहीं होता, मुझे अपना वो सख्त खीरा दे दो, मैं इसके लिए बरसों से तरस रही हूँ।’ समीर ने बिना देर किए अपनी पैंट उतारी और अपना फन फैलाए हुए खीरे को बाहर निकाला, जिसे देखते ही श्रेया की आँखें फटी की फटी रह गईं। श्रेया ने झुककर उस खीरे को अपने मुँह में ले लिया और उसे बड़े चाव से चूसने लगी, जैसे कोई प्यासा सदियों बाद पानी पी रहा हो।

जब समीर का सब्र का बांध टूटने लगा, तो उसने श्रेया को जमीन पर लिटाया और उसकी टांगों को अपने कंधों पर रखकर सामने से खोदना शुरू किया। जैसे ही खीरा पहली बार उस तंग और रसीली खाई के अंदर गया, दोनों के मुँह से एक साथ आह निकली। समीर ने धीरे-धीरे अपनी गति बढ़ाई और श्रेया की खाई की गहराई नापने लगा, हर धक्के के साथ श्रेया के तरबूज हवा में उछल रहे थे और उसकी चूड़ियों की खनक रात के सन्नाटे में एक मधुर संगीत पैदा कर रही थी। श्रेया बार-बार समीर को अपने और करीब खींच रही थी, मानो वह चाहती हो कि समीर पूरी तरह से उसके अंदर समा जाए।

खुदाई की प्रक्रिया अब अपनी चरम सीमा पर पहुँच रही थी, समीर अब श्रेया के पिछवाड़े को पकड़कर उसे जोर-जोर से खोद रहा था। श्रेया की सिसकियां अब तेज हो गई थीं और वह पागलों की तरह अपना सिर इधर-उधर पटक रही थी, उसे अपनी खाई के अंदर समीर के खीरे की हर रग का अहसास हो रहा था। समीर ने उसे घुमाया और पिछवाड़े से खोदने वाली पोजीशन में ले आया, जिससे उसकी गहराई और भी बढ़ गई। श्रेया ने अपने दोनों हाथ जमीन पर टिका दिए और अपने पिछवाड़े को पीछे की ओर धकेलने लगी ताकि समीर का खीरा उसकी कोख तक पहुँच सके।

अंत में, जब दोनों का शरीर पसीने से तरबतर हो चुका था और उत्तेजना अपने शिखर पर थी, समीर ने अपनी गति को तूफानी बना दिया। श्रेया की खाई के अंदर एक जबरदस्त हलचल हुई और उसने चिल्लाते हुए समीर को कसकर पकड़ लिया, उसका रस छूटने लगा था और वह पूरी तरह से कांप रही थी। उसी पल समीर ने भी अपना सारा गर्म रस श्रेया की खाई की गहराइयों में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे के ऊपर ढह गए, उनकी सांसें एक-दूसरे से मुकाबला कर रही थीं और दिल की धड़कनें धीरे-धीरे शांत हो रही थीं।

काफी देर तक वे उसी अवस्था में लेटे रहे, उस सुकून को महसूस करते हुए जो बरसों के इंतजार के बाद उन्हें मिला था। समीर ने प्यार से श्रेया के माथे को चूमा और उसके बिखरे हुए बालों को ठीक किया। श्रेया की आँखों में तृप्ति के आंसू थे और उसके चेहरे पर एक ऐसी चमक थी जो केवल पूर्ण संतुष्टि के बाद ही आती है। उन्होंने अपने कपड़े ठीक किए और उस पार्क से बाहर निकले, लेकिन अब उनके बीच का रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा था; वह एक गहरी, कामुक और अटूट डोर में बंध चुका था।

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